इस फ़िल्म को करने की क्या वजह थी ?

किसी भी ऐक्टर के लिए कोई भी फ़िल्म करने की तीन या चार वजह होती है । फ़िल्म की स्टोरी अच्छी हो , कंटेन्ट अच्छा हो, तो दर्शक उसे ज़रूर पसंद करेंगे । डायरेकटर बढ़िया हो जैसे विशाल ने कई बड़ी मूवीज़ किए हैं, साथ ही फिल्म के निर्माता जो कि टी सिरीज़ है।ऐसे निर्माता क़िस्मत वालों को ही मिलते हैं । कुल मिलाकर मुझे इस फ़िल्म में सब कुछ मिल रहा था । फ़िल्म में ऐक्शन, ड्रामा रोमान्स सब है, साथ ही म्यूज़िक बहुत दमदार है इसलिए मैंने ये फ़िल्म करने के लिए हां कहा ।

आपका अब तक का टेलिविज़न से फ़िल्मों का सफ़र कैसा रहा ?

अगर मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो ख़ुद पर आश्चर्य होता है । मैं नॉन फ़िल्मी बैक्ग्राउंड का था और मुंबई में एक ड्रीम लेकर आया था कि ऐक्टर बनना है। अच्छा लगता है कि आज अपने हार्ड वर्क और अपना ख़ून पसीना लगा के यहां तक पहुंचा हूं । बहुत कम समय में मुझे वो सब मिल गया जिसके लिए लोग बरसो मेहनत करते है । टेलिविज़न से ही मुझे पहचान मिली । कमाल का सफ़र रहा है ,शायद आज से 15 साल बाद, मैं अपनी आत्मकथा लिखने लायक हो जाऊं, तो लोगों को मेरे संघर्ष के बारे में पता चलेगा ।

आपके इस संघर्ष में आपकी वाइफ़ देबीना का कितना सहयोग रहा ?

मेरे स्ट्रगल में देबिना का पूरा पूरा 100% साथ रहा है। इस इंडस्ट्री में हर ऐक्टर की लाइफ़ में अप एंड डाउंज़ आते है लेकिन अगर आपके पास फ़ैमिली हो तो आप मायूस नहीं होते। ग़लत रास्ते पर नहीं जाते वरना लोगों को शराब और ड्रग्स की आदत पड़ जाती है। अच्छी वाइफ़ के होने से स्ट्रगल आसान हो जाता है । वैसे अगर आप देखे तो इंडस्ट्री में अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ खान, गोविन्दा, अक्षय कुमार कुछ एसे इग्ज़ैम्पल है जो मैरीड थे और अपनी सक्सेस के लिए अपनी फ़ैमिली को क्रेडिट देते है।

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आप अपने आप में कितना बदलाव महसूस करते है ?

लोग कहते है कि गुरमीत में ज़मीन आसमान का चेंज आया है । मुझे लगता है कि ज़मीन आसमान नहीं, बल्कि ज़मीन और पाताल का चेंज आ गया है । मेरी बातचीत, ऐटिट्यूड, कॉन्फ़िडेन्स, सोच समझ में मचुरिटी आ गई है लेकिन मैं पर्सनल लेवल पर अभी भी वही गुरमीत हूं और मुझे अपने स्वभाव को बदलने की कोई इच्छा नहीं है । हां, मैं अपने आप को अपग्रेड करता रहता हूं। अभी भी डान्स, ऐक्शन और ऐक्टिंग क्लास में जाता हूं, फ़िट्नेस के लिए महनेत करता हूं। मैं हर वो नई चीज़ सीखने के लिए तैयार हूँ जो मुझे अपग्रेड करे । दरअसल मुझे अपने आप से बहुत एक्स्पेक्टेशंज़ है । बहुत उम्मीदें है और यही वजह है कि मैं बदलाव में विश्वास करता हूँ ।

 

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आपकी नज़रों में सिलेब्रिटी होने के क्या फ़ायदे या नुक़सान है ?

सिलेब्रिटी होने का सबसे बड़ा नुक़सान है कि आपका कुछ भी पर्सनल नहीं होता । कभी-कभी तो ये भी लगता है कि घर के अन्दर भी प्रैवेसी नहीं रह जाती । कभी मॉल में घूमने का मन हो, तो नहीं कर सकते । फ़ैमिली के साथ डिनर पर जाओ, तो भी फ़ैंज़ आ जाते है । कभी-कभी दोस्त और फ़ैमिली मेम्बर्ज़ नाराज़ हो जाते है लेकिन मुझे इस सब से कोई परेशानी नहीं होती। अपने चाहने वाले से मिलना, उनके साथ फ़ोटो खिंचाना मुझे बहुत अच्छा लगता है, आज अपने फैंस की वजह से ही मैं यहां हूं और मेरा तो ड्रीम ही यही था कि हीरो बनूं ,रास्ते में लोग मुझे पहचाने । आज जब फैंस का प्यार मिल रहा है तो उसे मैं इग्नोर कैसे कर सकता हूं ।

अपने मी टाइम में क्या करते है ?

मी टाइम मिलते ही मैं एकदम लेज़ी हो जाता हूं, आराम से एक जगह बैठकर कॉफ़ी पीता हूं, बुक पदता हूं और अपना सबसे फ़वरेट काम, फ़ेसबुक अप्डेट करता हू, अपने सारे वॉट्सअप और मेसजेज़ का रिप्लाई करता हूँ । सोशल नेट वर्क के द्वारा अपने फ़ैंज़ से जुड़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है ।

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किसी को अपना आयडील मानते है ?

मेरा बचपन से सिर्फ़ एक सपना था कि मैं हीरो बनू । मैं अपने आप को हीरो ही समझता था । अमिताभ बच्चन की तरह ऐक्टिंग करता था, गोविन्दा की तरह डान्स करता था, सलमान खान की तरह बॉडी बनाना चाहता था, अक्षय कुमार की तरह ऐक्शन करना चाहता था और शाहरुख़ खान की तरह रोमान्स करना चाहता था। एक बार तो रोमान्स की ऐक्टिंग करने के चक्कर में पिट भी गया था ।

अफ़वाहों का फ़ैमिली पर कितना असर पड़ता है ?

देखिए, मैं और देबिना तो इस इंडस्ट्री में काफ़ी समय से काम कर रहे है इसलिए अफ़वाहों पर ध्यान नहीं देते। हम दोनों  पता नहीं क्यूं सॉफ्ट टार्गट बन जाते है और इसी बहाने न्यूज़ में बने रहते है ।वैसे मुंबई में तो किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, यहां तो पड़ोसी कौन है, लोग यह भी नहीं जानते। लेकिन छोटे शहरों में अफ़वाहों पर बहुत ध्यान दिया जाता है ,अड़ोसी पड़ोसी सब पूछने लगते है और फ़ैमिली डिस्टर्ब हो जाती है ।

इंडस्ट्री में काम की तलाश में आने वाले युवाओं को क्या मेसेज देंगे ?

मुंबई शहर में डेली लोग अपनी क़िस्मत आज़माने आते है । यहाँ सरवाइब करना बहुत मुश्किल है ,क़दम क़दम पर ख़र्चे हैं, रहने की समस्या , खाने की समस्या ,परिवार के बिना रहना आसान नहीं है । लेकिन हमेशा अपने फ़ेलियेर से कुछ सीखना चाहिए ,कुछ बुरा हो तो वो भी किसी अच्छे के लिए ही हुआ होगा । मैंने एक बुक पढ़ी है “लक फ़ैक्टर” जिसके अनुसार लकी पीपल भी वही होते है जो फ़ेलियेर को भी लकी समझे । यहां ईमानदारी से महनेत करने पर फल ज़रूर मिलता है ।

इस फिल्म में गुरमीत के साथ सना खान स्क्रीन शेयर करेंगी।  

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