अनाड़ी जी, क्या आपके पास कोई फिल्म प्रोड्यूसर नहीं आया, आपकी कहानियों पर फिल्म बनाने?

सारिका वोहरा, मंडी (हि.प्र.)

प्रोड्यूसर आते थे,

खूब आते थे!

पर उस तरफ ध्यान नहीं दे पाते थे!

आपके प्रश्नों के उत्तर देते रहने

कवि सम्मेलनों में उड़ते रहने

फेसबुक, वाट्सएप पर

आत्ममुग्ध रहने और

चाय में कम दुग्ध रहने

के कारण,

फिर वे अनाड़ी को

अनाड़ी ही समझने

लगे अकारण।

अब ज़रा दूध मलाई खाएंगे,

तो नई नई कहानियां बनाएंगे।

वे जो चाहे चुन लें,

इस बात को

प्रोड्यूसर भी सुन लें।

 

अनाड़ी जी, आज के समय में आदमी अपनी समस्या से कम दूसरों की खुशी से ज्यादा दुखी है, आपकी नजर में इसका क्या कारण हो सकता है?

संजना निगम, कानपुर

सुख और दुख

जि़ंदगी नामक मम्मी के

दो भ्रामक बेटे हैं,

अहंकार और ईष्र्या नाम के

एक-दूसरे के गंदे तौलि, लपेटे हैं।

एक-दूसरे के दुख से सुखी

और सुख से दुखी हैं,

समस्याएं बहुमुखी हैं।

जब इन दोनों में परस्पर खुंदक आती है,

तो जि़ंदगी मम्मी सुलह कराती है

डांट भी देती हैए जब अति हो जाती है?

 

 

अनाड़ी जी, पहले लोग संयुक्त परिवारों में रहना पसंद करते थे, परन्तु आज के लोग एकाकी परिवार में रहना, आपकी नजर में इसका क्या कारण है?
रागिनी देवी निगम, कानपुर
 
पहले पैतृक व्यवसाय ही चलाएं
ये मजबूरी थी,
नए और आकर्षक
रोज़गारों से दूरी थी।
परिवार फैला तो
जगहें कम पडऩे लगीं,
तमन्नाएं भी लडऩे-झगडऩे लगीं।
पहले साथ खाते-पीते,
नाचते-गाते थे,
हर समय मोबाइल में
आंखें नहीं गड़ाते थे।
अब चिडिय़ा बड़ी होते ही
उड़ जाती है,
अपनी सास के घोंसले में
घर नहीं बसाती है।
फिर भी अपने ही झुण्ड में उड़ती है,
कौओं की कोलोनी की ओर
नहीं मुडती है।
साथ रहें या उन्मुक्त रहें,
ज़रूरी ये है कि दिलों से संयुक्त रहें।
 

अनाड़ी जी, राजनीति में सभी लोग एक-दूसरे को गिराकर उठना चाहते हैं, इस बारे में आपका क्या विचार है?

रमा शुक्ला, नई दिल्ली
राजनीति का अर्थ अब कुर्सी पाना है,
उसके लिए सोचते हैं
किसे उठाना किसे गिराना है।
राजनीति में ऐसा कौन है
जिसने दूसरों को ठगा नहीं है,
अब तो बाप बेटे का
और बेटा बाप का भी सगा नहीं है।
 
अनाड़ी जी, महिलाएं इतनी भावुक क्यों होती हैं कि टीवी या सिनेमा में होने वाले दुख-दर्द से भी उनके आंसू आ जाते हैं?
दीपा गर्ग, रांची
सिनेमा हो या टीवी,
शौहर हो या बीवी,
पुरुष पराई नारियों को
देखता है,
नारी पराए मर्द देखती है,
पुरुष अपना नयन-सुख
देखता है,
नारी पराए दर्द देखती है,
बात-बात पर बहाती हैं आंसू,
लेकिन मर्द होता है
इतना धांसू,
कि आंसूओं में भी
सौंदर्य चखता है,
जाने कब मौका मिल जाए
पट्ठा हर समय रूमाल रखता है।
 
अनाड़ी जी, हंसने से क्या होता है और न हंसने से क्या होता है?
रत्ना देवी, दिल्ली
हंसने से खून बढ़ता है
न हंसो तो नाखून बढ़ते हैं।
हंसने से प्रेम बढ़ता है,
न हंसो तो जुनून बढ़ते हैं।
 
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यदि आपके सवाल को अनाड़ी जी देते हैं पहला, दूसरा व तीसरा स्थान तो आप पा सकते हैं प्रोफेसर अशोक चक्रधर की हस्ताक्षरित पुस्तकें। आप अपने सवाल anadi@dpb.in पर ईमेल भी कर सकते हैं।