इतिहास और पुराण को अभी तक आपने किताबों में पढ़ा होगा लेकिन इसे अपनी आंखों से देखने का मौका मिले तो क्या करेंगी. दिल खुश हो जाएगा न…बस यही वाला अहसास आपको बिठूर पहुंचकर होगा. इस जगह की अपनी अलग पौराणिक अहमियत भी है और 1857 की क्रांति का भी यहां से गहरा नाता है. माता सीता का भी इस जगह से रिश्ता है. कुल मिलाकर ये जगह आपको कई तरह से अनोखी लग सकती है. फ़िलहाल तो नहीं लेकिन कुछ समय बाद जब दुनिया नार्मल तरीके से चलने लगे तब आप इस जगह को घूमने जरूर आएं. 
कैसे आएं-
बिठूर से कानपुर करीब 30 किलोमीटर दूर है. कानपुर से यहां करीब 45 मिनट में पहुंचा जा सकता है. कानपुर सेन्ट्रल और एयरपोर्ट दोनों ही देश के बड़े शहरों से जुड़े हुए हैं. इसलिए बिठूर आने के लिए कानपुर आना और फिर यात्रा पूरी करना सही रहेगा. 
कहां घूमें-
यहां पर बहुत सारे मंदिर और तीर्थ हैं. जहां लोग एक बार तो आना ही चाहते हैं लेकिन ये जगह क्योंकि गंगा के किनारे हैं इसलिए यहां के सुंदर घाट जैसे ब्रह्मावर्त घाट लोगों को बहुत भाता है. इसके साथ वाल्मीकि आश्रम भी लोग जरूर देखने जाते हैं. 
कहां ठहरें-
बिठूर में ठहरने के लिए अच्छे विकल्प नहीं हैं. इसलिए आपको ठहरने के लिए कानपुर के होटल ही चुनने होंगे. 
भगवान ब्रह्मा का निवास-
ब्रह्म देव और बिठूर का रिश्ता भी है. पौराणिक कथाओं की मानें तो ये जगह ब्रह्म देव का निवास स्थान है. भगवान ब्रह्म ने खुद इस जगह को अपने निवास के तौर पर चुनकर यज्ञ भी किया था. 
ब्रह्मवर्त भी है नाम-
बिठूर का नाम ब्रह्मवर्त भी रहा है. माना जाता है कि ब्रह्मांड के नाश और आकाशगंगा के दोबारा बनने के बाद ब्रह्मा जी ने बिठूर को अपना निवास बना लिया. फिर उन्होंने यहां यज्ञ भी किया. 
माता सीता का घर-
बिठूर माता सीता का घर रहा है. ऐसा उस दौरान हुआ जब राम जी ने उनका साथ छोड़ दिया था. वो यहीं वाल्मीकि आश्रम में रहीं थीं. 
राम जी से लव-कुश का मिलन-
खास बात ये भी है कि माता सीता ने लव कुश को यहीं पर जन्म दिया था. बाद में वो अपने पिता श्रीराम से यहीं पर मिले था. 
बिठूर का नाम और पेशवा-
19 वीं शताब्दी में आखिरी पेशवा राजा यहां से निर्वासित हुए और इस जगह का नाम ब्रह्मावर्त से बिठोबा नगर रखा गया. समय के साथ इस जगह का नाम बिठूर हो गया.  
1857 का दौर और आजादी की लड़ाई-
आजादी की पहली लड़ाई के समय 1857 में ब्रिटिश इंडिया कंपनी के विरुद्ध लड़ाई का केंद्र यही जगह बनी. हालांकि इसी साल 1857 में जेनरल हेवलॉक ने इस जगह पर कब्जा कर लिया. 

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