हमारे यहां राष्ट्रीय ध्वज की चर्चा वैदिक काल में भी हुई है। अथर्ववेद के कुछ मंत्रों में (उदाहरणार्थ अथर्व 5.21.12 अथर्व 11.10.2 तथा अथर्व 11.10.7) राष्ट्रीय ध्वज के आकार प्रकार का स्पष्ट उल्लेख है। इन मंत्रों के अनुसार उन दिनों राष्ट्रीय ध्वज का रंग लाल होता था तथा उस पर श्वेत रंग में सूर्य का चिह्न अंकित होता था। राष्ट्रीय ध्वज का यह स्वरूप हमारी संस्कृति व प्रकृति का प्रतीक था।

लाल रंग, रक्त या हिंसा के प्रतीक के रूप में नहीं, अपितु प्रेम के प्रतीक के रूप में था। प्रेम और स्नेह का रंग भी हमारे यहां लाल माना गया है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की विचारधारा से युक्त देश की संस्कृति ने सदैव अंतराष्ट्रीय सद्भावना का परिचय दिया है तथा प्राणी मात्र के कल्याण की कामना करते हुए ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:’ की भावना व्यक्त की है। उसी आपसी प्रेम, भाईचारा और सम्पूर्ण विश्व के हित की कामना, राष्ट्रीय ध्वज के लाल रंग में समायी हुई थी।

सूर्य का तेज हमारे लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहा है और इसलिए ऋग्वेद की प्रारम्भिक ऋचाओं में भी हमें सूर्य-उपासना की बात पढ़ने को मिलती है। सूर्य, प्रकाश और शक्ति का भण्डार है। इस रूप में वह हमारे लिए प्रेरक भी है और राष्ट्रीय क्षमताओं का प्रतीक भी। प्रकाश से अभिप्राय केवल उजाले से ही नहीं, अपितु सत्य और ज्ञान की प्राप्ति से भी है। असत्य और अज्ञान के अन्धकार को मिटाकर हम सदैव सत्य और ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। परब्रह्म प्रभु से भी हमारी कामना यही रही है।

असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मा अमृतं गमय।

प्रकाश-पुंज सूर्य को अपने राष्ट्रीय ध्वज में स्थान देने के पीछे भी हमारी भावना उसी सत्य और ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करने की रही है। इसी प्रकार सूर्य की शक्ति को अपनाने का अर्थ किसी भौतिक शक्ति या अत्याचार करने की शक्ति को अपनाने से नहीं है। ऐसा करना तो किसी भी रूप में हमारी संस्कृति का अंग रहा ही नहीं। शक्ति से अभिप्राय बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति से रहा है। हम अपने वैदिक ऋषियों तथा अन्य मनीषियों के समान ही अपनी बौद्धिक क्षमताओं का विकास करके प्रतिभा-सम्पन्न बनें। इस प्रकार शक्ति-सम्पन्न सूर्य को अपने ध्वज में स्थान देकर वैदिक काल के विद्वानों ने नैतिक और आध्यात्मिक शक्तियों से सम्पन्न होने की कामना व्यक्त की।

हमारी संस्कृति नैतिक और आध्यात्मिक विजय की संस्कृति रही है। भौतिक शक्ति तथा भौतिक विजय को तो हमारे यहां सदैव उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया।

सूर्य के चिह्न को श्वेत वर्ण में अंकित करना भी महत्त्वपूर्ण है। श्वेत वर्ण शांति का प्रतीक है। शक्ति पुंज सूर्य को श्वेत वर्ण में अंकित करने का अभिप्राय यह है कि हम शक्ति और शान्ति दोनों की उपासना करते हैं। जनविरोधी कार्यों का दमन करने के लिए हम शक्ति को अपनाते है, लेकिन जन हितकारी कार्यों के लिए हम शान्ति के अग्रदूत हैं। वैदिक साहित्य में केवल आक्रमणकारियों, अपराधियों और अत्याचारियों के विरुद्ध ही युद्ध करने की बात कही गयी है, अन्यथा नहीं। साम्राज्य प्रसार के लिए तो युद्ध की बात कहीं है ही नहीं। युद्ध के बाद की व्यवस्था देते हुए यह भी कहा गया है कि हमें अपने शत्रु-राष्ट्र को पराजित करने के उपरान्त उससे मित्रवत व्यवहार करना चाहिए। युद्ध का उद्ïदेश्य केवल आत्मरक्षा है और आत्मरक्षा के उपरान्त युद्ध या अशान्ति का कोई प्रश्न ही नहीं है। अथर्ववेद में कहा गया है-

अभयं मित्रादभयमित्रादभयं पुरो य:।

अभयं नक्तमभयं दिवा न: सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु॥

(अथ. 19.15.6)

अर्थात- हमें मित्र से अभय प्राप्त हो, अमित्र से अभय प्राप्त हो, परिचित से अभय प्राप्त हो, अपरिचित से अभय प्राप्त हो, रात्रि में अभय प्राप्त हो, दिन में अभय प्राप्त हो, सारी दिशाएं हमारी मित्र हो जाएं।

युद्ध में विजय प्राप्त करने के उपरान्त हमें पराजित राष्ट्र को अपने अधीन करने की बात सोचनी भी नहीं चाहिए। अथर्ववेद का ऋर्षि, सैनिकों को आदेश देते हुए कहता है- ‘इस संग्राम को जीतकर अपने अपने स्थान में जाकर बैठ जाओ।’ (अथ. 11.9.2)

इस प्रकार वैदिक युग का राष्ट्रीय ध्वज आपसी प्रेम, भाईचारा, शान्ति और मित्रता का प्रतीक है। इसी आधार पर वैदिक साहित्य में विश्व-राज्य की भी कल्पना की गयी है और उसके लिए इसी ध्वज का समर्थन किया गया है। 

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