बचपन की उम्र का ही कमाल है कि इंसान चांदसितारों को भी खिलौना समझकर पाने और छूने के लिए मचल उठता है, वर्ना तो बाकी जि़ंदगी वह इन चांद-सितारों में अपनी किस्मत की ग्रह-दशा देखने में ही निकाल देता है। हममें से शायद ही कोई ऐसा हो, जिसके बचपन में एक खिलौना उसके हमजोली के तौर पर शामिल न रहा हो। कभी हममें से किसी ने गुड़ियों के घर बनाए-सजाए होंगे या उस गुड़िया की शादी रचाई होगी। किसी ने डॉक्टर के सेट से नन्हा सा डॉक्टर बनकर बचपन में ही सभी को कहना शुरू कर दिया होगा कि हम तो बड़े होकर डॉक्टर ही बनेंगे। कभी आंखों पर चश्मा चढ़ाए, हाथों में छड़ी थामे, सामने छोटे से ब्लैकबोर्ड पर अपने स्कूल में पढ़ाई बातों को दोहराते, उनकी नकल करते हमने जि़ंदगी के कई सबक सीखे-याद किए होंगे। यूं ही कभी उंगलियों में लिपटे पतंग के धागों से हमने आसमान तक को हाथों में समेट लेने का हौसला पाया होगा। बचपन का कोई टैडी बेयर या कोई और खिलौना आज भी बहुत से लोगों के दिलों के साथ घरों में भी जगह बनाए मिल जाएगा, इसीलिए ये मानना ही पड़ेगा कि एक बच्चे के लिए खिलौना, सिर्फ़ एक खिलौना भर ही नहीं होता। उस बेजान सी चीज़ में एक बचपन की बढ़त, कई सीखें, कई सबक, कई सपने, कई साझापन, कई यादें और कई एहसास सांस लेते हैं।

साझापन होता है शुरू खिलौनों से

एक बच्चे की परवरिश में खिलौनों का रोल इतना अहम होता है कि इन्हीं के रूप में वह अपना पहला दोस्त, पहला हमजोली पाता है, जिससे वह अपनी बातें कहना, अपनी चीज़ें बांटना सीखता है। ये कहना, ये बांटना, ये सीखना उसकी तमाम उम्र की बहुत सारी चीज़ें तय कर देता है, क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और पूरा समाज इस कहने, बांटने, सीखने पर ही टिका है। जब वह बच्चा अपने खिलौने से अपनी सुनी-सीखी बातें दोहराता है, अपने राज़ बताता है, कहानियां या लोरी सुनाता है, घर बनाना सीखता है या और भी जो भी करता है, उस हर बात का किसी न किसी रूप में प्रभाव उसके मन पर पड़ता ही है, जो उम्र भर के लिए उसके अवचेतन मन में बैठ भी जाता है।

बच्चे अपने खिलौनों को सबसे पहले अपनी निजी संपत्ति समझते हैं। इन खिलौनों को दूसरों के साथ बांटकर खेलने के लिए उन पर कभी भी दबाव नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि इससे उनके मन में जलन, गुस्सा, प्रतिशोध और स्वार्थ जैसी चीज़ों के बीज पड़ने लगते हैं। चीज़ों को मिल-बांटकर इस्तेमाल करने की शिक्षा अगर आप उस बच्चे पर दबाव बनाकर देने की कोशिश करेंगी तो कभी कामयाब नहीं होंगी। इसके लिए ज़रूरी है कि पहले उसे शेयरिंग का महत्त्व य समझाएं। उसे बताएं कि बांटने से चीज़ें घटती नहीं हैं, बल्कि बढ़ती ही हैं, क्योंकि जब वह अपने खिलौने दूसरे बच्चों के साथ बांटकर खेलेगा तो दूसरे बच्चे भी उसे अपने खिलौनों के साथ खेलने देंगे और इस तरह से वह दो तरह के खेल खेल सकेगा। इसी तरह बच्चे ये समझने लगेंगे कि बांटने से चीजें कैसे लौटकर हम तक आती हैं। बांटने से कैसे चीज़ें घटती नहीं, बल्कि बढ़ जाती हैं।

दायरे भी बनाता है खिलौनों का फर्क

पैदा तो हर इंसान एक बच्चे के रूप में ही होता है, लेकिन बड़े होने पर एक लड़के के रूप में उसमें अहम की भावना ज़्यादा होगी या एक लड़की के रूप में डर की भावनाएं, ये भी बचपन में मिलने वाले खिलौने ही तय कर देते हैं। एक बच्ची को खिलौने के रूप में सिर्फ़ कोई गुड़िया या किचेन सेट देकर ये मान लिया जाता है कि खेल-खेल में हुआ ये अभ्यास उसे आगे चलकर काम आएगा। गुड़िया या किचेन सेट जैसे खिलौने लड़कों को दिए जाने का चलन लगभग न के ही बराबर है। दूसरी तरफ, एक लड़के को एयरो प्लेन, डॉक्टर्स किट या पतंग थमाकर हम ये फर्क भी इसी उम्र में बना डालते हैं कि लड़कों के लिए तो पूरा आसमान है, लेकिन लड़कियों की दुनिया के दायरे बहुत सिमटे हुए हैं। ऐसे में फिर और कोशिशें चाहे जितनी हो जाएं एक लड़के और लड़की के बीच के फर्क को खत्म करके उन्हें समाज में बराबरी का दर्जा देने की, लेकिन हमेशा ये कोशिशें अधूरी इसी वजह से रह जाती हैं, क्योंकि ये फर्क तो हमने खिलौनों के ज़रिये उनके बचपन की कच्ची मिट्टी में ही गूंद दिया होता है। इसी तरह से इस बात पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि खिलौने की अहमियत उससे जुड़े एहसास होते हैं, उसकी मार्केट कॉस्ट नहीं। अपने बच्चों को महंगा खिलौना दिलाकर भी हम सामाजिक स्तर का एक बीज अंजाने ही उसके अवचेतन मन में रौंप देते हैं।

उसे बार्बी डॉल तो अच्छी लगती है, लेकिन दूसरी डॉल में उसकी दिलचस्पी $खत्म हो जाती है। समाज में जो अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई है, उसकी शुरुआत भी एक बच्चे के जीवन में खिलौनों के ज़रिये बचपन में ही हो जाती है और इसके इतने दूर तक के परिणाम पर किसी का ध्यान भी नहीं ही जाता। फिर आगे चलकर चाहे हम अपने बच्चे को कितना ही समझा लें कि दुनिया में सब इंसान बराबर होते हैं, वह कभी इस बात पर यकीन नहीं करेगा, क्योंकि ये फर्क तो उसके खिलौने की कीमत बचपन में ही बता चुकी है। बच्चों के लिए महंगे खिलौनों को कभी भूलकर भी अपना स्टेटस सिंबल नहीं बनाना चाहिए, चाहे इसके लिए आप कितना भी सक्षम और समर्थ क्यों न हों। महंगे खिलौने हमारे लिए भले ही स्टेटस सिंबल हो सकते हैं, लेकिन बच्चों की नज़र से देखें तो वे बारिश के पानी में कागज़ की नाव चलाकर भी बादशाहत महसूस करते हैं। साथ ही ये भी याद रखिए कि बच्चे खिलौनों से खेलते कम, उन्हें तोड़ते ज़्यादा हैं। अगर आपके दिलाए महंगे खिलौनों को भी वह थोड़ी देर खेलकर तोड़ देता है तो शायद आपको दुख न हो, लेकिन पैसे का महत्त्व समझने में उसे काफी समय लग जाएगा। अपने बच्चे को जो भी खिलौना दिलाएं, उसकी साज-संभाल और देख-रेख के बारे में भी प्यार से उसे बताना-सिखाना न भूलें।

खिलौने को खिलौना ही रहने दें

एक और गलती अक्सर हम अपने बच्चों के लिए खिलौने करते हुए आमतौर पर करते हैं, वह ये है कि उसे जल्दी-जल्दी सब-कुछ सिखाने के चक्कर में हम या तो ऐसे खिलौने ले देते हैं, जो उसकी उम्र से बड़े होते हैं या फिर खिलौना ज़्यादा दिन टिक जाए, ये सोचकर ऐसे सॉफ्ट टॉय दिला देते हैं, जो उसकी उम्र से छोटे होते हैं। ये दोनों ही स्थितियां ठीक नहीं हैं। बच्चों को उनकी सही उम्र जीने दीजिए। बचपन गुज़र जाने के बाद लौटता नहीं है। अपने बच्चे के बचपन को इतना भी मत सिखाइए कि वह बचपना करना ही भूल जाए। ठीक है कि बच्चे खिलौने से भी बहुत- कुछ सीखते हैं, लेकिन उनके हर खिलौने को एक बने-बनाए सबक का रूप मत दीजिए। कुछ खिलौने ऐसे भी चुनिए, जिससे बच्चे की कल्पनाशीलता को बढ़ावा मिले।

बच्चों के लिए खिलौने लेते समय उनके मनोविज्ञान को ज़रूर ध्यान में रखिए, तब ये समझना आसान हो जाएगा कि बच्चों के खिलौना चुनना कोई खेल नहीं है। एक बच्ची को खिलौने के रूप में सिर्फ़ कोई गुड़िया या किचेन सेट देकर ये मान लिया जाता है कि खेल-खेल में हुआ ये अभ्यास उसे आगे चलकर काम आएगा। गुड़िया या किचेन सेट जैसे खिलौने लड़कों को दिए जाने का चलन लगभग न के ही बराबर है।

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