मां बनना जिंदगी का सबसे सुखद पल होता है, जिसे सिर्फ अहसास किया जा सकता है लेकिन, नए मेहमान के स्वागत के लिए आपको बहुत कुछ करने की जरूरत होती है इसलिए आप व आपका साथी मिलकर निर्णय लें कि बच्चे को कहां जन्म देना है। आप निम्नलिखित में से कोई भी स्थान चुन सकती हैं। 

बर्थिंग-रूम :- बर्थिंग रूम में अस्पताल का वह कमरा, बच्चे के जन्म से लेकर, आप दोनों के छुट्टी मिलने तक आपके पास ही रहता है। जन्म के बाद शिशु को आपके पास ही झूले में रखा जाता है। ये काफी आरामदेह भी होते हैं।कुछ बर्थिंग रूम सिर्फ प्रसव-पीड़ा, प्रसव और स्वास्थ्य लाभ के लिए इस्तेमाल होते हैं, जिन्हें एल.डी.आर.कहते हैं। अगर आप और आपका शिशु एल.डी.आर.में हुए तो एक-दो घंटे बाद, दोनों को पोस्टपार्टम रूम में भेज दिया जाएगा। कई अस्पतालों में इन कमरों में शिशु के पिता व भाई-बहन भी साथ रह सकते हैं। अधिकतर बार्थिंग रूम ऐसे होते हैं, जहां दीवारों पर सुंदर वॉलपेपर, हल्की रोशनी,रॉकिंग चेयर, अच्छे पर्दे व खूबसूरत बेड होते हैं। ये कमरे किसी भी तरह से अस्पताल के कमरे नहीं लगते। हालांकि यहां गर्भावस्था के प्रसव के दौरान होने वाले हर खतरे से निपटने के उपकरण तैयार होते हैं। इन्हें अलमारियों में छिपा कर रखा जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर ही निकाला जाए। बेड को सिर वाले हिस्से से ऊपर-नीचे किया जा सकता है। उसके पैरों वाले हिस्से में भी अटेंडेंट के खड़े होने लायक जगह बन जाती है। प्रसव के बाद थोड़ा सा बदलाव आता है और आप उसी बैड पर वापिस आ जाती हैं।

कई अस्पतालों में बर्थिंग रूम के साथ शॉवर या व्हर्लपूल टब की सुविधा भी होती है, वे प्रसव पीड़ा के दौरान हाइड्रोथैरेपी दे सकते हैं। बर्थिंग सेंटर व अस्पतालों में वाटर बर्थ के लिए टब भी होते हैं। कई जगह सोफे पड़े होते हैं ताकि आपका परिवार व मित्र आदि वहां बैठ कर इंतजार कर सके। कई जगह सोफा कम बेड की सुविधा होती है ताकि आपका साथी वहां रात बिता सके। कई अस्पतालों में बर्थिंग रूम की सुविधा उन्हीं महिलाओं को मिलती है जिनकी गर्भावस्था को ज्यादा खतरा नहीं होता। यदि आप इस सूची में नहीं आतीं तो आपको पारंपरिक लेबर या डिलीवरी रूम में ही जाना होगा जहां ज्यादा अच्छी तकनीक काम में लाई जा सके। वहां सी-सैक्शन ऑपरेशन भी आराम से किया जा सकता है। वैसे हम तो यही दुआ करते हैं कि आपको पारंपरिक अस्पताल माहौल में भी वही दोस्ताना रवैया और अपनापन मिले।

 

 बर्थिंग सेंटर :- यहां आपको प्रसव संबंधी देखभाल, प्रसव, स्तनपान कक्षाएं आदि सारी सुविधाएं एक ही छत तले मिल जाती हैं। वैसे तकरीबन बर्थिंग सेंटरों में भी प्राइवेट कमरे होते हैं जो काफी आरामदेह और सुख-सुविधाओं से भरपूर होते हैं। इनमें परिवार के बाकी सदस्यों के इस्तेमाल के लिए रसोईघर भी होता है। यहां दाइयां (मिडवाइफ) होती हैं लेकिन प्रसूति विशेषज्ञ भी बुलाए जाते हैं। वे लोग आपातकालीन स्थिति में झटपट पहुंच जाते हैं। हालांकि यहां ज्यादा संवेदनशील उपकरण नहीं होते इसलिए जरूरत पड़ने पर आपको पास के किसी अस्पताल में भी भेजा जा सकता है। ऐसी जगह उन्हीं महिलाओं को जाना चाहिए,जिनकी गर्भावस्था को ज्यादा खतरा न हो।यदि आपकी गर्भावस्था में कई जटिलताएं रही हों तो इस जगह प्रसव का विचार न बनाएं।

लेबोयर बर्थ :- जब फ्रेंच प्रसूति विशेषज्ञ फ्रेडरिक लेबोयर ने हिंसा के बिना शिशु के जन्म का यह सिद्धांत दिया तो चिकित्सा समुदाय हैरानी में पड़ गया। वर्तमान में उनके कई उपाय काम में लाए जाते हैं, ताकि शिशु शांत व सहज वातावरण में जन्म ले सके।बच्चे का जन्म ऐसे कमरे में होता है,जिसकी तेज रोशनी को जरूरत पड़ने पर धीमा किया जा सके। बच्चा मां के गर्भ में अंधकार में पलता है इसलिए उसे बाहर आने पर भी वही माहौल मिले तो ज्यादा बेहतर होगा। अब नवजात को जोर-जोर से थपथपाने की भी जरूरत नहीं समझी जाती। यदि उसकी सांस अपने-आप चालू न हो तो इसके लिए कम अक्रामक तरीके अपनाए जाते हैं। कई अस्पतालों में बच्चे व मां की नाल एकदम नहीं काटी जाती, यही मां व बच्चे का आखिरी शारीरिक बंधन होता है।हालांकि उन्होंने तो बच्चे को हल्के गुनगुनेपानी से नहलाने की सिफारिश भी की थी लेकिन मां की बांहों में देने का सिद्धांत अवश्य अपनाया जाता है। हालांकि इन सिद्धांतों को कुछ-कुछ अपनाया जाता है लेकिन हल्का संगीत, मध्यम प्रकाश व बच्चे के लिए स्नान जैसी बातें आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। यदि आप अपने लिए ऐसा चाहें तो पहले डॉक्टर से पता कर लें।

घर में बच्चे का जन्म :- कई महिलाओं को सिर्फ बीमार पड़ने पर ही अस्पताल जाना पसंद है और गर्भावस्था कोई बीमारी नहीं होती। यदि आप भी उनमें से हैं तो शायद आप भी अपने शिशु को घर में जन्म देना चाहेंगी। ठीक तो रहेगा ही, आपका शिशु परिवार के मित्रों के बीच अपनी आंखें खोलेगा, आपको अपने घर का आराम और गोपनीयता मिलेगी। आपको अस्पताल के कायदे-कानूनों से नहीं उलझना पड़ेगा। नुकसान यह है कि अगर कोई परेशानी खड़ी हो गई तो आपातकाल में क्या करेंगी। फिर नवजात व आपकी जान को खतरा हो सकता है।

आपको निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए :-

  • आप उच्च रक्तचाप, मधुमेह या किसी क्रॉनिक रोग से ग्रस्त न हों, आपका पिछला प्रसव भी सामान्य रहा हो यानी आप कम-खतरे वाली श्रेणी में आती हों।
  •  आपके पास सलाह देने व नर्स या दाई की सहायता के लिए एक डॉक्टर पास होना चाहिए ताकि मुसीबत के वक्त सही राय मिल सके।
  •  आपके पास अस्पताल तक पहुंचने के लिए वाहन तैयार रहना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ते ही आपको अस्पताल पहुंचाया जा सके। 

 

पानी में शिशु का जन्म :- हालांकि चिकित्सा समुदाय ने इसे पूरी तरह नहीं अपनाया है। इस विधि में बच्चे का जन्म पानी के भीतर कराया जाता है ताकि उसे बाहर जाकर लगे कि वह अभी मां की कोख में ही है। बच्चे को जन्म के तुरंत बाद पानी से निकाल कर मां की गोद में दिया जाता है। तब तक सांस लेना शुरू नहीं हुआ होता इसलिए डूबने का भी कोई डर नहीं होता। यह तरीका घर, बर्थ सेंटर या अस्पताल में अपनाया जा सकता है। कई पति अपनी पत्नी को सहारा देने के लिए टब में साथ बैठते हैं। कम खतरे वाली गर्भावस्था हो तो मां यह तरीका अपना सकती है। बशर्ते डॉक्टर इसकी राय दें। यदि आपकी गर्भावस्था हामी के बावजूद यह तरीका न अपनाएं। वैसे आप व्हर्लपूल टब या नियमित स्नान का तरीका अपना सकती हैं। पानी से दर्द में आराम मिलता है। गुरुत्वाकर्षण के बल से भी मुक्ति मिलती है। कई अस्पतालों व बर्थ सेंटरों में भी टब उपलब्ध कराए जाते हैं।

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