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ऋण-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Kavita: मानस-जन्म लिया धरा पर, वह तभी ऋणी हो जाता है।देव,पितृ गुरु,लोक,भूत ऋण हैं भिन्न रूपों में, यही शास्त्र हमें बतलाता है।। देव ऋण और पितृ ऋण ,ये मुख्य रूप कहलाते हैं।जो अपने धर्मों का अहित करे, वह विनाश के द्वार पर जाते हैं।। बहु-बेटा हो, चाहें हो बेटी,यदि वह अपना फ़र्ज़ निभाते हैं।मात-पिता […]

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