बिहार में चमकी बुखार या एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम का कहर एक बार फिर बरपा है।  मुजफ्फरपुर सहित कई जिलों में इस वर्ष गर्मी के मौसम में एईएस का कहर प्रारंभ हो गया था जिसकी चपेट में आकर 150 से अधिक बच्चों ने अपनी जान गंवाई।  

क्या होता है एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम AES)?

एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम शरीर के तंत्रिका तंत्र यानी मुख्य नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है और वह भी खासतौर पर बच्चों में। हमारे मस्तिष्क में लाखों कोशिकाएं और तंत्रिकाएं होती हैं, जिनके सहारे शरीर के अंग काम करते हैं। जब इन कोशिकाओं में सूजन आ जाती है, तो इसे ही एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम कहते हैं। ये एक संक्रामक बीमारी है।

इस बीमारी के वायरस जब शरीर में पहुंचते हैं और खून में शामिल होते हैं, तो इनका प्रजनन शुरू हो जाता है और धीरे-धीरे ये अपनी संख्या बढ़ाते जाते हैं। खून के साथ बहकर ये वायरस मस्तिष्क तक पहुंच जाते हैं।

बुखार के लक्षण

तेज बुखार, सिरदर्द, गर्दन में जकड़न, कमजोरी, उल्टी होना, हमेशा सुस्त रहना, भूख कम लगना, पूरे शरीर में दर्द होना। इस बीमारी के लक्षण दिखते ही अपने नजदीकी स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र पर जाकर डॉक्‍टर को दिखाएं। अगर इन लक्षणों को नजरअंदाज किया जा रहा है तो आगे चलकर ये गंभीर रूप ले सकते हैं। 

बुखार के कारण

चमकी बुखार से पीड़ित बहुत बच्चों में ग्लूकोज की कमी पाई गई है। खाली पेट कच्ची लीची खाने से भी शुगर की कमी पाई गई। कच्ची लीची में हाइपोग्लाइसीन-ए केमिकल होता है। बीज में एमसीपीजी नामक विषैला केमिकल होता है।

बच्चे खाली पेट इसे खाते हैं तो इन दोनों के कारण उल्टी, बुखार, खून में चीनी की कमी एवं चमकी के लक्षण देखे गए हैं। हालांकि, अब भी पूरी तरह से यह साबित नहीं हो पाया है कि लीची ही एईएस का मुख्य कारण है।

कैसे फैलता है?

इंसेफेलाइटिस एक संक्रामक बीमारी है, जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैल सकती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि व्यक्ति के इस बीमारी के संक्रमित हो जाने के बाद उसके मल-मूत्र, थूक, छींक आदि (शरीर से निकलने वाले तरल पदार्थ) के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति में भी इंसेफेलाइटिस के वायरस पहुंच सकते हैं।

चमकी बुखार होने पर क्‍या करें?

तेज बुखार होने पर पूरे शरीर को ताजे पानी से पोछें एवं पंखा से हवा करें ताकि बुखार कम हो सके। बच्‍चे के शरीर से कपड़ें हटा लें एवं गर्दन सीधा रखें। पेरासिटामोल की गोली व अन्‍य सीरप डॉक्‍टर की सलाह के बाद ही दें। अगर मुंह से लार या झाग निकल रहा है तो उसे साफ कपड़े से पोछें, जिससे सांस लेने में कोई दिक्‍कत न हो। बच्‍चों को लगातार ओआरएस का घोल पिलाते रहें। तेज रोशनी से बचाने के लिए मरीज की आंखों को पट्टी से ढंके। बेहोशी व मिर्गी आने की अवस्‍था में मरीज को हवादार स्‍थान पर लिटाएं। अगर दिन में बच्‍चे ने लीची खाया है तो उसे रात में भर पेट भोजन कराएं। चमकी आने की दशा में मरीज को बाएं या दाएं करवट लिटाएं।

चमकी बुखार होने पर क्‍या न करें?

बच्‍चे को खाली पेट लीची न खिलायें, अधपके अथवा कच्‍चे लीची को खाने से बचें। बच्‍चे को कंबल अथवा गर्म कपड़ों में न लपेटें, बच्‍चे की नाक न बंद करें। बच्‍चे की गर्दन झुकाकर न रखें। मरीज के बिस्‍तर पर न बैठे साथ ही ध्‍यान रखें की मरीज के पास शोरगुल न हो। 

सामान्य उपचार व सावधानियां

  • अगर आपके बच्चे में चमकी बीमारी के लक्षण दिखें तो सबसे पहले बच्चे को धूप में जाने से बचाएं।
  • बच्‍चों को दिन में दो बार स्‍नान कराएं।
  • गर्मी के दिनों में बच्‍चों को ओआरएस अथवा नींबू-पानी-चीनी का घोल पिलाएं। द्य रात में बच्‍चों को भरपेट खाना खिलाकर ही सुलाएं।
  • चमकी बुखार से पीड़ित इंसान के शरीर में पानी की कमी न होने दें। बच्चों को सिर्फ स्वस्थ आहार ही दें। रात को खाना खाने के बाद हल्का फुल्का मीठा जरूर दें।
  • खाना पौष्टिक और ठोस होना चाहिए।
  • पर्याप्त पानी पीना बहुत जरूरी है। गर्मी और उमस के मौसम में प्यासे न रहें। डिहाइड्रेशन के कारण भी ब्लड शुगर तेजी से घटता है।
  • फलों और सब्जियों को अच्छी तरह धोएं बिना बिल्कुल न खाएं।
  • बुखार आने पर खुद से दवा खाने के बजाय, तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
  • अगर आपके आसपास इंसेऌफेलाइटिस के मामले बढ़े हैं, तो मुंह पर मास्क लगाकर ही घर से बाहर निकलें।

बच्चे ही क्यों होते हैं शिकार?

इस मामले में ज्यादातर बच्चे ही दिमागी बीमारी के शिकार होते हैं। चूंकि बच्चों के शरीर की इम्युनिटी कम होती है, वो शरीर के ऊपर पड़ रही धूप को नहीं झेल पाते हैं। यहां तक कि शरीर में पानी की कमी होने पर बच्चे जल्दी हाइपोग्लाइसीमिया के शिकार हो जाते हैं। कई मामलों में बच्चों के शरीर में सोडियम की भी कमी हो जाती है। हालांकि कई डॉक्टर इस थ्योरी से इनकार भी करते हैं।

बच्चों की इन सिलसिलेवार मौतों ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। न अस्पताल है, न डॉक्टर। नेताओं के वादे आज भी अपने पूरे होने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि बिहार में यह पहला मामला है। पूर्व में जाकर देखें तो प्रतिवर्ष कई मासूमों ने इसकी चपेट में आकर अपनी जान गंवाई है। इसके बाद भी कुछ नहीं बदला। स्थिति हमारे सामने है। एक तरफ जहां इस बीमारी में मृत्युदर सबसे ज्यादा 35 प्रतिशत है, वहीं दूसरी ओर हर साल इस बीमारी से होने वाली सैकड़ों मौत को रोकने में अभी तक डॉक्टर भी कोई कारगर इलाज नहीं ढूंढ़ सके हैं। संभवत: सावधानी ही इससे बचने का उपाय है।

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