Tradition of Gambling: भले ही आज जमाना बदल गया हो परंतु आज भी लोग दिवाली की रात जुआ खेलते हैं। जुए की यह परम्परा कोई नई नहीं है युगों पुरानी है। कितनी पुरानी है यह प्रथा तथा कितना व कैसे बदला है इसका रूप? जानें इस लेख से।जुआ खेलने की प्रथा प्रत्येक देश में तथा हर जमाने में अलग-अलग रूपों में मौजूद रही है तथा इसमें अपना वर्तमान तथा भविष्य लुटा देने वालों की भी कमी नहीं रही।
मनोरंजन के ही एक साधन के रूप में वैदिक काल से ही ध्रूतक्रीड़ा की परंपरा रही है। उत्तर वैदिक साहित्य में हमें इसकी विस्तार से विवेचना मिलती है। खुदाई से हासिल सामग्रियां भी इस बात का प्रमाण है कि मनोरंजन के एक साधन के रूप में इसका प्रचलन आम एवं खास दोनों वर्गों में था। वैदिक साहित्य में हमें पांसों की विवेचना मिलती है। ये पांसे खासतौर पर चौकोर होते थे और इनका उपयोग ‘चौपड़’ खेलने में किया जाता था। कौटिल्य ने पांसों के लिए वाकड़ी अथवा कौड़ी शब्द का उपयोग किया।
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रामायण, महाभारत में भी है जुए का उल्लेख
महाभारत में हमें इस खेल के संदर्भ में विस्तार से चर्चा मिलती है। आज की भांति तब इसको बुरा नहीं माना जाता था अपितु जुए में पारंगत होना भी एक खास गुण समझा जाता था। शकुनि को बहुत कुशल जुआरी बताया गया है। उसे ‘कृतहस्ता’ संज्ञा से विभूषित किया गया है।
रामायण में भी ‘पण’यानी जुए में दांव पर लगाई जाने वाली वस्तु ‘अक्ष’ यानी पांसा और ‘देवन’ (जुआ खेलने की विधि) आदि शब्दों की विवेचना मिलती है। ‘चतुरंग’ यानी शतरंज खेलने के भी कुछ प्रसंग हमें रामायण में मिलते हैं। वाल्मीकि रामायण में लंका में जलते हुए दीपकों की तुलना जुआरियों से की गई हैं।
दिवाली पर जुआ खेलने की परंपरा की शुरुआत ऋग्वेद काल से पूर्व ही हो चुकी थी। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की खुदाई में अन्य चीजों के साथ कुछ ऐसी वस्तुएं भी मिली हैं जिनसे जानकारी मिलती है कि जुए का प्रचलन उस जमाने में भी था।
मानव सभ्यता के साथ किसी रूप में मनुष्य के साथ जुड़े रहने वाले इस पुरातन खेल के कुछ पहलुओं को थोड़ा और गहराई से देखें तो विदित होता है कि थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ आज भी हमारे साथ इनका जुड़ाव बना हुआ है।
कैसे हुआ जुए का जन्म?
इस खेल के जन्म के पीछे एक रोचक प्रसंग है। महाभारत में वर्णित इस प्रसंग के मुताबिक महॢष च्यवन ने एक बार घोर तपस्या की। यहां तक कि उनके शरीर पर मिट्टी का ढेर बन गया। एक दिन राजा षयति की पुत्री सुकन्या उधर से गुजर रही थी। सुकन्या ने देखा कि एक मिट्टी के ढेर में दो जुगनू इस तरह से चमक रहे हैं जैसे दो आंखें हों। उसने उत्सुकतावश ऋषि की दोनों आंखों में कांटा चुभों दिया।
कांटा चुभने के वजह से ऋषि पीड़ावश क्रोधित हो गए। ऋषि ने दंड स्वरूप राजा से उनकी पुत्री को पत्नी रूप में मांगा। अंतत: उन्हें अपनी सुंदर कन्या ऋषि को समर्पित करनी पड़ी।
इधर सुंदर कन्या को एक कृषकाय बूढ़े ऋषि के साथ देखकर दो कुमारों का मन डोलने लगा। उन्होंने सुकन्या को अपने में से किसी एक को स्वीकार करने को कहा किंतु सुकन्या तैयार न हुई। उसकी ऐसी निष्ठा देख अश्विनी कुमारों ने च्यवन ऋषि को यौवन प्रदान किया। इसके बदले में ऋषि ने उन्हें सोमरस पान का अधिकारी बना दिया। यह देख भगवान इन्द्र बहुत क्रोधित हुए। वह अपना वज्र फेंकने वाले ही थे कि ऋषि च्यवन ने मंत्र द्वारा उनके हाथ जकड़ दिए।
इस घटना के बाद च्यवन ऋषि ने घोर तप किया। तपस्या के बल पर मद नामक एक दैत्य को जन्म दिया। मद इन्द्र की ओर लपका। इन्द्र ने भयभीत हो क्षमा मांगी।
च्यवन ऋषि ने तब मद नाम के उस राक्षस को सुरा, स्त्री, शतरंज तथा जुआ में बांटकर गायब कर दिया। शतरंज के जन्म को लेकर और भी अनेक प्रसंग हैं। आज यह खेल समस्त संसार में खेला जाता है।
