khoon saphed by munshi premchand
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चैत का महीना था लेकिन वे खलिहान, जहां अनाज की ढेरियां लगी रहती थी, पशुओं के शरण-स्थल बने हुए थे, जहां घरों से फाग और बसंत का अलाप सुनायी पड़ता, वहां आज भाग्य का रोना था। सारा चौमासा बीत गया, पानी की एक बूंद न गिरी। जेठ में एक बार मूसलाधार वृष्टि हुई थी, किसान फूले न समाये, खरीफ की फसल बो दी, लेकिन इंद्रदेव ने अपना सर्वस्व शायद एक ही बार में लुटा दिया था। पौधे उगे, बड़े और फिर सूख गये। गोचर भूमि में घास न जमी। बादल आते, घटाएं उमड़ती, ऐसा मालूम होता कि जल-थल एक हो जायेगा, परन्तु वे आशा की नहीं, दुःख की घटाएं थी। किसानों ने बहुतेरे जप-तप किये, ईंट और पत्थर देवी-देवताओं के नाम से जप पुजाये, बलिदान किये, पानी की अभिलाषा में रक्त के पनाले बह गये, लेकिन इंद्रदेव किसी तरह न पसीजते। न खेतों में पौधे थे, न गोचरों में घास, न तालाबों में पानी, बड़ी मुसीबत का सामना था। जिधर देखिए, धूल उड़ रही थी। दरिद्रता और क्षुधा-पीड़ा के दारुण दृश्य दिखाई देते थे। लोगों ने पहले तो गहने और बरतन गिरवी रखे, और अन्त में बेच डाले। फिर जानवरों की बारी आयी और जब जीविका का अन्य कोई सहारा न रहा तब जन्म-भूमि पर जान देने वाले किसान बाल-बच्चों को लेकर मजदूरी करने निकल पड़े। अकाल-पीड़ितों को सहायता के लिए कहीं-कहीं सरकार की सहायता से काम मिल गया था। बहुतेरे वहीं जाकर जमे। जहां जिसको सुभीता हुआ, वह उधर ही जा निकला।

संध्या का समय था। जादोराय थका-मांदा आकर बैठ गया और स्त्री से उदास होकर बोला दरखास्त नामंजूर हो गयी। यह कहते-कहते वह आंगन में जमीन पर लेट गया। उसका मुख पीला पड़ रहा था और आंतें सिकुड़ी जा रही थी। आज दो दिन से उसने दाने की सूरत नहीं देखी। घर में जो कुछ विभूति थी – गहने, कपड़े, बरतन, भांडे, सब पेट में समा गये। गांव का साहूकार भी पतिव्रता स्त्रियों की भांति आंखें चुराने लगा। केवल तकाबी का सहारा था, उसी के लिए दरखास्त दी थी, लेकिन आज वह भी नामंजूर हो गयी, आशा का झिलमिलाता हुआ दीपक बुझ गया।

देवकी ने पति को करुण दृष्टि से देखा। उसकी आंखों में आंसू उमड़ आए। पति दिन भर का थका-मांदा घर आया है। उसे क्या खिलाये लज्जा के मारे वह हाथ-पैर धोने के लिए पानी भी न लायी। जब हाथ-पैर धो कर आशा-भरी चितवन से वह उसकी ओर देखेगा तब वह उसे क्या खाने को देगी? उसने आज कई दिन से दाने की सूरत नहीं देखी थी। लेकिन इस समय उसे जो दुःख हुआ, वह क्षुधातुर के कष्ट से कई गुना अधिक था। स्त्री घर की लक्ष्मी है। घर के प्राणियों को खिलाता-पिलाना वह अपना कर्तव्य समझती है और चाहे यह उसका अन्याय ही क्यों न हो, लेकिन अपनी दीन-हीन दशा पर जो मानसिक वेदना उसे होती है, वह पुरुषों को नहीं हो सकती।

हठात् उसका बच्चा साधो नींद से चौंका और मिठाई के लालच में आकर वह बाप से लिपट गया। इस बच्चे ने आज प्रातःकाल चने की रोटी का एक टुकड़ा खाया था, और तब से कई बार उठा और कई बार रोते-रोते सो गया। चार वर्ष का नादान बच्चा, उसे वर्षा और मिठाइयों में कोई संबंध नहीं दिखाई देता था। जादोराय ने उसे गोद में उठा लिया, उसकी ओर दुःखभरी दृष्टि से देखा। गर्दन झुक गयी और हृदय-पीड़ा आंखों में न समा सकी।

दूसरे दिन यह परिवार भी घर से बाहर निकला। जिस तरह पुरुषों के चित्त से अभिमान और स्त्री की आंखों से लज्जा नहीं निकलती, उसी तरह अपनी मेहनत से रोटी कमाने वाला किसान भी मजदूरी की खोज में घर से बाहर नहीं विकलता। लेकिन हां पापी पेट! तू सब कुछ कर सकता है! मान और अभिमान, ग्लानि और लज्जा, ये सब चमकते हुए तारे तेरी काली घटाओं में छिप जाते हैं।

प्रभात का समय था। वे दोनों विपत्ति के सताये घर से निकले। जादोराय ने लड़के को पीठ पर लिया। देवी ने फटे-पुराने कपड़ों की वह गठरी सिर पर रखी, जिस पर विपत्ति को भी तरस आता। दोनों की आंखें आंसुओं से भरी थी। देवकी रोती थी। जादोराय चुपचाप था। गांव के दो-चार आदमियों से रास्ते में भेंट भी हुई, किन्तु किसी ने इतना भी न पूछा कि कहां जाते हो? किसी के हृदय में सहानुभूति का वास न था।

जब ये लोग लाल गंज पहुंचे, उस समय सूर्य ठीक सिर पर था। देखा, मीलों तक आदमी-ही-आदमी दिखाई देते थे। लेकिन हर चेहरे पर दीनता और दुःख के चिह्न झलक रहे थे।

बैसाख की जलती हुई धूप थी। आग के झोंके जोर-जोर से हरहराते हुए चल रहे थे। ऐसे समय में हड्डियों के अगणित ढांचे जिनके शरीर पर किसी प्रकार का कपड़ा न था, मिट्टी खोदने में लगे हुए थे। मानों वह मरघट भूमि थी, जहां मुर्दे अपने हाथों अपनी कब्र खोद रहे थे। बूढ़े और जवान, मर्द और बच्चे, सब-के-सब ऐसे निराश और विवश होकर काम में लगे हुए थे मानो मृत्यु और भूख उनके सामने बैठी घूर रही है। इस आफत में न कोई किसी का मित्र था न हित। दया, सहृदयता और प्रेम – ये सब मानवीय भाव हैं, जिनका कर्ता मनुष्य है। प्रकृति ने हमको केवल एक भाव प्रदान किया है और वह स्वार्थ है। मानवीय भाव बहुधा कपटी मित्रों की भांति हमारा साथ छोड़ देते हैं, पर ईश्वरप्रदत्त गुण कभी हमारा गला नहीं छोड़ता।

आठ दिन बीत गये थे। संध्या समय काम समाप्त हो चुका था। डेरे से कुछ दूर आम का एक बाग था। वहीं एक पेड़ के नीचे जादोराय और देवकी बैठे हुए थे। दोनों ऐसे कृश हो रहे थे कि उनकी सूरत नहीं पहचानी जाती थी। अब वह स्वाधीन कृषक नहीं रहे। समय के हेरफेर से आज दोनों मजदूर बने बैठे हैं।

जादोराय वे बच्चे को जमीन पर सुला दिया। उसे कई दिन से बुखार आ रहा है। कमल-सा चेहरा मुरझा गया। देवकी ने धीरे से हिलाकर कहा – बेटा आंखें खोलो, देखो सांझ हो गयी। साधो ने आंखें खोल दी, बुखार उतर गया था। बोला – क्या हम घर आ गए मां? घर की याद आ गयी। देवकी की आंखें डबडबा आयी। उसने कहा – नहीं बेटा! तुम अच्छे हो जाओगे, तो घर चलें। उधर देखो, कैसा अच्छा बाग है।

साधो मां के हाथों के सहारे उठ, और बोला – मां! मुझे बड़ी भूख लगी है, लेकिन तुम्हारे पास तो कुछ नहीं है। मुझे क्या खाने को दोगी?

देवकी के हृदय में चोट लगी, पर धीरज धर के बोली – नहीं बेटा, तुम्हारे खाने को मेरे पास सब कुछ है। तुम्हारे दादा पानी लाते हैं तो मैं नरम नरम रोटियां अभी बनाए देती हूं।

साधो ने मां की गोद में सिर रख लिया और बोला – मां! मैं न होता तो तुम्हें इतना दुःख तो न होता। यह कहकर वह फूट-फूट कर रोने लगा। यह वही बेसमझ बच्चा है, जो दो सप्ताह पहले मिठाइयों के लिए दुनिया सिर पर उठा लेता था। दुःख और चिन्ता ने कैसा अनर्थ कर दिया है। यह विपत्ति का फल है। कितना दुःखपूर्ण, कितना करुणाजनक व्यापार है।

इसी बीच में कई आदमी लालटेन लिए हुए वहां आये। फिर गाड़ियां आयीं। उन पर डेरे और खेमे लदे हुए थे। दम-के-दम में वहां खेमे गड़ गए। सारे बाग में चहल-पहल नजर आने लगी। देवकी रोटियां सेंक रही थी, साधो धीरे-धीरे उठा और आश्चर्य से देखता हुआ एक डेरे के नजदीक जा कर खड़ा हो गया।

पादरी मोहनदास खेमे से बाहर निकले तो साधो उन्हें खड़ा दिखाई दिया। उसकी सूरत पर उन्हें तरस आ गया। प्रेम की नदी उमड़ आयी। बच्चे को गोद में लेकर खेमे में एक गद्देदार कोच पर बैठा दिया और तब उसे बिस्कुट और केले खाने को दिए। लड़के ने अपनी जिन्दगी में इन स्वादिष्ट चीजें को कभी न देखा था। बुखार की बेचैन करने वाली भूख अलग मार रही थी। उसने खूब मन भर खाया और तब कृतज्ञ नेत्रों से देखते हुए पादरी साहब के पास जाकर बोला – तुम हमको रोज चीजें खिलाओगे।

पादरी साहब इस भोलेपन पर मुस्करा बोले – मेरे पास इससे भी अच्छी-अच्छी चीजें है। इस पर साधोराय ने कहा – अब मैं रोज तुम्हारे पास आऊंगा। मां के पास ऐसी अच्छी चीजें कहां? वह तो मुझे चने की रोटियां खिलाती है।

उधर देवकी ने रोटियां बनायी और साधो को पुकारने लगी। साधो ने मां के पास जाकर कहा – मुझे साहब ने अच्छी-अच्छी चीजें खाने को दी हैं। साहब बड़े अच्छे हैं।

देवकी ने कहा – मैंने तुम्हारे लिए नरम-नरम रोटियां बनायी हैं। आओ तुम्हें खिलाऊं। साधो बोला – अब मैं न खाऊंगा। साहब कहते थे कि मैं तुम्हें रोज अच्छी-अच्छी चीजें खिलाऊंगा। मैं अब उनके साथ रहा करूंगा। मां ने समझा कि लड़का हंसी कर रहा है। उसे छाती से लगाकर बोली – क्यों बेटा, हमको भूल जाओगे? देखो मैं तुम्हें कितना प्यार करती हूं।

साधो तुतलाकर बोला – तुम तो मुझे रोज चने की रोटियां दिया करती हो। तुम्हारे पास तो कुछ नहीं है। साहब मुझे केले और आम खिलायेंगे, यह कहकर वह फिर खेमे की और भागा और रात को वहीं सो रहा।

पादरी मोहनदास का पड़ाव वहां तीन दिन रहा। साधो दिल भर उन्हीं के पास रहता। साहब ने उसे मीठी दवाइयां दी। उसका बुखार जाता रहा। वह भोले-भाले किसान यह देखकर साहब को आशीर्वाद देने लगें। लड़का भला-चंगा हो गया और आराम से है। साहब को परमात्मा सुखी रखे। उन्होंने बच्चे की जान रख ली।

चौथे दिन रात को ही वहां से पादरी साहब ने कूच किया। सुबह को जब देवकी उठी तो साधो का वहां पता न था। उसने समझा, कहीं टपके ढूंढ़ता होगा, किन्तु थोड़ी देर देखकर उसने जादोराय से कहा – लल्लू यहां नहीं है। उसने भी यही कहा – यही कहीं टपके ढूंढ़ता होगा।

लेकिन जब सूरज निकल आया और काम पर चलने का वक्त हुआ तब जादोराय को कुछ संशय हुआ। उसने कहा – तुम यही बैठी रहना, मैं अभी उसे लिए आता हूं।

जादोराय ने आस-पास के सब बागों को छान डाला और अन्त में जब दस बज गए तो निराश लौट आया। साधो न मिला, यह देखकर देवकी दहाड़ मारकर रोने लगी।

फिर दोनों अपने लाल की तलाश में निकले। अनेक विचार चित्त में आने-जाने लगे। देवकी को पूरा विश्वास था कि साहब ने उस पर कोई मंत्र डालकर वश में कर लिया। लेकिन जादो को इस कल्पना के मान लेने में कुछ संदेह था। बच्चा इतनी दूर अनजान रास्ते पर अकेले नहीं आ सकता। फिर दोनों गाड़ी के पहियों और घोड़े की टापों के निशान देखते चले जाते थे। यहां तक कि वे एक सड़क पर आ पहुंचे। वहां गाड़ी के बहुत से निशान थे। उस विशेष लीक की पहचान न हो सकती थी। घोड़े के टाप भी एक झाड़ी की तरफ जाकर गायब हो गए। आशा का सहारा छूट गया। दोपहर हो गयी थी। दोनों धूप के मारे बेचैन और निराशा से पागल हो रहे थे। वहीं एक वृक्ष की छाया में बैठ गए। देवकी विलाप करने लगी। जादोराय ने उसे समझाना शुरू किया।

जब जरा धूप की तेजी कम हुई तो दोनों फिर आगे चले। किन्तु अब आशा की जगह निराशा साथ थी। घोड़े के टापों के साथ उम्मीद का धुंधला निशान गायब हो गया था। शाम हो गयी। इधर-उधर गायों-बैलों के झुंड निर्जीव से पड़े दिखाई देते थे। यह दोनों दुखिया हिम्मत हारकर एक पेड़ के नीचे टिक रहे। उसी वृक्ष पर मैना एक जोड़ा बसेरा लिए था। उनका नन्हा-सा शावक आज ही एक शिकारी के चंगुल में फंस गया था। दोनों दिन भर उसे खोजते फिरे। इस समय निराश होकर बैठ रहे । देवकी और जादो को अभी तक आशा की झलक दिखाई देती थी, इसलिए वे बेचैन थे।

तीन दिन तक ये दोनों अपने खोये हुए लाल की तलाश करते रहे। दाने से भेंट नहीं, प्यास से बेचैन होते तो दो-चार घूंट पानी गले के नीचे उतार लेते।

आशा की जगह निराशा का सहारा था। दुःख और करुणा के सिवाय और कोई वस्तु नहीं। किसी बच्चे के पैरों के निशान देखते तो उनके दिलों में आशा तथा भय की लहरे उठने लगती थी।

लेकिन प्रत्येक पग उन्हें अभीष्ट स्थान से दूर लिए जाता था।