नारी अनाड़ी 

मूर्ख दिवस के दिन किसी का जन्मदिन हो तो उसे बधाई देने का क्या तरीका होगा, कृपया बताएं?

शालिनी कालड़ा करनाल (हरियाणा)

मूर्ख दिवस यानी एक अप्रैल की तिथि तो गई, अब तो आ गया महीना मई।ग्यारह महीने पहले क्यों बताएं बधाई देने का तरीका,अगले वर्ष मार्च में पूछना यही होगा सही सलीका।

आपके सुंदर हस्ताक्षर पर न्यौछावर हूं अनाड़ीजी श्रीमान! कृपया बतलाएंगे कि इतने सुंदर हस्ताक्षर के पीछे है कौनसा ज्ञान?
किरण लाल बहादुर श्रीवास्तव
मंदसौर (म.प्र.)

धन्यवाद कि हस्ताक्षर सुंदर दिखा, मैंने तो बस अशोक चक्रधर लिखा। देखिए प्रारंभिक दो गोलाइयों से हस्ताक्षर का प्रस्थान है, फिर बिना कलम उठाए रेखा का उत्थान है। ऊपर उठकर और यूटर्न लेकर वह ‘अ बनाते हुए रेखा नीचे तक आती है, और खत्म हो जाती है।‘श में जाती हुई जो ओ की मात्रा है,वह ब्रह्मांड को भेदती हुई मेरी अंतर्यात्रा है।‘क जैसे उस यात्रा का आधार है। आगामी ‘च एक चमत्कार है, आकार के बावजूद निराकार है,‘क्र का ‘र धारा के विपरीत हैआगामी ‘ध के बाद का ‘र भविष्य से मेरी प्रीत है। यह हस्ताक्षर ही है मेरे जीवन की गाड़ी, जिस पर सवारी करता है अनाड़ी।

अनाड़ीजी, ऐसा क्यों है कि गांव की लड़कियां शहरों में आकर ढल जाती हैं, मगर शहर की लड़कियों को गांव में परेशानी होती है?
रुचि साह
जिला कोरबा (छत्तीसगढ़)

गांव की लड़कियांशहर के स्वछंदतावादी माहौल में प्रसन्नतापूर्वक ढल जाती हैं, लेकिन शहर की उन्मुक्त कन्याओं को गांव की कुछ बातें खल जाती हैं।वे गांव जाते ही एक संकट से जूझती हैं, गांव की सारी औरतें उनसे सारी बातें पूछती हैं।उनकी दखलंदाज़ी पैदा करती है निराशा, दूसरी परेशानी है गांव की भाषा। तीसरी परेशानी यह कि औरतों के बीच तो वे गा सकती हैं नाच सकती हैं झूम सकती हैं, पर गांव में साजन के साथ गलबहियां डालकर नहीं घूम सकती हैं।

अनाड़ीजी, आरक्षण के बारे में आपकी क्या राय है? आरक्षण उचित है या अनुचित?
रेखा सिंघल
हरिद्वार (उत्तराखंड) 

जातिए धर्म, संप्रदाय के आधार पर नहीं, नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं! आरक्षण नहीं मिलना चाहिए सम्पन्न और स्वयंपोषित को,
आरक्षण दीजिए गरीब, वंचित और शोषित को।

आपके जवाब से नाराज़ क्यों न मैं भी आपकी पुरस्कार में जीती पुस्तकें लौटा दूं। पर बताइए कि आप लौटाई गई पुस्तकों का क्या करेंगे?
अनीता
गांधीनगर, जम्मू
अनिता जी, आपके तो बड़े तीखे अंदाज़ हैं, पहले आपको बताना होगा कि किस जवाब से नाराज़ हैं। मैं आपसे रार नहीं ठानूंगा, गलती होगी तो फौरन मानूंगा।
फिर भी यदि पुस्तकें सही सलामत लौटाएंगी, तो अन्य पाठिकाओं के
काम में आएंगी।

कोयल की कूक मीठी लगती है और कौवे की कांव-कांव सुनकर कान बंद करने का मन करता है, आखिर क्यों?
रागिनी देवी निगम
जिला कानपुर (उ.प्र.)
कोयल की कूक, उठाती है हिए में हूक। और कागा की कांव, छील देती है कानों के पांव। वैसे जो स्वयं रागिनी हो उसे अनाड़ी क्या बताएगा, हां, जिन्हें स्वर का ज्ञान नहीं है उन्हें अंतर समझ में नहीं आएगा।

यदि आपके सवाल को अनाड़ी जी देते हैं पहला, दूसरा व तीसरा स्थान तो आप पा सकते हैं प्रोफेसर अशोक चक्रधर की हस्ताक्षरित पुस्तकें। आप अपने सवाल anadi@dpb.in पर ईमेल भी कर सकते हैं।

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