तिनका -तिनका करके चिड़िया जैसे अपना घर बनती है,
हम भी उन्ही तिनकों की तरह है ।
हम भी कुछ ऐसे ही चले आए थे यहां,
जैसे हवा के झोखों के साथ शाख से टूटा कोई एक पत्ता ,
या समंदर के तेज़ लहर में बहकर आया कोई एक पत्थर।
उस पत्थर के लिए वही किनारा उसकी उम्मीद का घरोंदा था.
और उस टूटे पत्ते के लिए वही सड़क का कोना उसका आसरा।

उस पत्ते के कोने और उस पत्थर के किनारे के बीच,
कही कोई डोर जुड़ गई थी,जैसे तिनकों से बना एक चिड़िया का बसेरा।
यू देखो तो कोई खूबसूरती नहीं इन सब में,
न चिड़िया के बसेरे में ,न पत्ते के कोने में और न पत्थर के किनारे में,
लेकिन मन की आंखो से देखो तो जानोगे कि ,
वही पत्ताचिड़िया के बसेरे का हिस्सा बना और
वही पत्थर समंदर किनारे चिड़िया को बिठाकर पानी पिलाने के काम आया।

चिड़िया बड़ी खुश थी, कभी सड़क के उस कोने को शुक्रिया कहती,
जिसने उसे वो पत्ता दिया बसेरा बनाने को और
कभी उस समंदर के किनारे को, जिसने उसे उस पत्थर का साथ दिया।
पर जिंदगी रुक नहीं सकती ,वक्त की सुई थम नहीं सकती,
जो चाहे वो मंजिल मिल नहीं सकती,
मौसम को तो फिर बदलना ही था, हवा का रुख फिर से कडा होना ही था,
बहार के बाद पतझड़ ने तो आना ही था,
ये सब चिड़िया भी जानती थी ……

पर शायद अपने बसेरे के मोह में बंध गई थी,
उन्मुक्त गगन मे अकेले उड़ना भूल गई थी,
पर फिर से हवा के झोखें आए और बसेरा टूट गया
मानो चिड़िया का छोटा सा सपना टूट गया ।
फिर उड़ने की अब वही कोशिश ,फिर नया बसेरा
फिर नई जगह ,फिर एक नए मौसम में
फिर एक नए छोटे से सपने के पास ,
उमीदों से भरी एक नई उड़ान के साथ ।