Ret Samadhi: सिनेमाहॉल के काउंटर में बिक्री होती साउथ इंडियन मूवी की टिकटों के आंकड़ों ने कई बॉलीवुड कलाकारों की नींद उड़ा दी है। इस कारण ही तो अजय देवगन जैसे संजीदा एक्टर ने भी साउथ फिल्मों को क्षेत्रीय फिल्म बता और हिंदी के मार्केट की वैल्यू की बात कर अपनी असुरक्षा का परिचय दे दिया। लेकिन क्या ये गौर करने वाली बात नहीं है कि हाल ही में हिंदी फिल्मों में कुछ भी नया देखने को नहीं मिल रहा है। सारी फिल्में किसी ना किसी हॉलीवुड फिल्मों की रीमेक होती हैं। अब तो बात यहां तक आ गई है कि हिंदी फिल्में साउथ इंडियन फिल्मों की भी रीमेक बनाने लगी है। क्या बॉलीवुड के पास कुछ भी नया नहीं बचा?
या फिर यह समस्या हिंदी परिपाटी की सारी जमीं के साथ ही है???
चाहे क्राफ्ट की बात हो या फिल्मों की, डिज़ाइन की बात हो या लेखनी की… हिंदी में शायद ही कुछ नया देखने को अब मिलता है। और जो नया होता है वह पुरस्कृत जरूर होता है। तभी तो गीतांजलि की ‘रेत समाधि’ की हर जगह बात हो रही है।
बुकर प्राइज के लॉन्गलिस्ट में शामिल ‘रेत समाधि’

गीतांजलि श्री हिंदी भाषा की एक वरिष्ठ लेखिका हैं जो काफी समय से लिखते आ रही हैं। लेकिन इनका नाम नए लेखकों के बीच या फेसबुक राइटर के बीच कभी सुनने को नहीं मिला। क्यों??
क्योंकि हमारे देश में संजिदा कामों और रचनाओं की बात अंत में होती है और वह भी तब जब कोई और देश उन्हें पुरस्कृत करता है। यही गीतांजलि श्री के साथ भी है। नहीं तो ऐसा नहीं है कि ‘रेत समाधि’ इनकी पहली रचना है। लेकिन यह अब पहली ऐसी रचना जरूर बन गई है जिसने हिंदी भाषा के साथ पूरे एशियाई भाषाओं को भी एक नई राह दिखा दी है। अन्यथा अब तक तो केवल बुकर पुरस्कार की घोषणा होती थी और हम विजेता रचनाओं के क्षेत्रीय संस्करण का आने का इंतजार करते थे। लेकिन अब गीतांजलि श्री के कारण ऐसा पहली बार हुआ है कि बुकर प्राइज के लॉन्गलिस्ट में पहली बार किसी हिंदी भाषा की रचना शामिल हुई है और उसे पढ़ने के लिए उसके ट्रांसलेशन की जरूरत नहीं है। बल्कि उसकी मूल रचना को ही पढ़ सकेंगे। यह हिंदी भाषा के लिए एक अभूतपूर्व उपल्बिध है।
क्या है ‘रेत समाधि’

उपन्यास ‘रेत समाधि’ इंटरनेशनल बुकर प्राइज की लॉन्ग लिस्ट में अपना नाम दर्ज कराने वाला पहला हिंदी उपन्यास है। इसके लॉन्गलिस्ट में शामिल होते ही पूरी दुनिया का ध्यान फिर से हिंदी साहित्य की तरफ आ गया है। इससे पहले हिंदी भाषा की जब भी बात होती थी तो दुनिया में रविंद्र नाथ टैगोर के गीतांजलि को लोग याद करते थे। लेकिन अब उपन्यास ‘रेत समाधि’ की भी बात हो रही है। अब ना केवल हिंदी भाषा की तरफ ही, बल्कि एशियाई भाषा की तरफ भी पूरी दुनिया का ध्यान गया है और अन्य भाषाओं की भी उम्दा रचनाओं को खोजा जा रहा है। यह एक अभूतपूर्व परिघटना है, जिसने वैश्विक स्तर पर हिंदी और अन्य दक्षिण एशियाई भाषाओं के लिए एक नई राह दिखाई है। ये सारी बातें राजकमल प्रकाशन द्वारा आयोजित हाल ही में आयोजित किए गए ‘रेत समाधि : कृति उत्सव’ में निकल कर आईं जिसमें नामी-गिरामी लेखक जैसे अशोक वाजपेयी, हरीश त्रिवेदी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, वीरेन्द्र यादव और वंदना राग जैसे लोग शामिल हुए।
आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि बुकर पुरस्कार ने अपनी सूची में किसी कृति को शामिल करने के लिए कई सरहदें बना रखी थीं। इन सरहदों को गीतांजलि श्री न केवल तोड़ा है बल्कि उन सरहदों को पार भी किया है। इस उपलब्धि ने पूरी दुनिया में हिंदी और अन्य दक्षिणी एशियाई भाषाओं को एक नई राह दिखाई है।

क्या है बुकर पुरस्कार?
बुकर पुरस्कार, साहित्य का सर्वोच्च सम्मान है और यह पूर्ण रुप से अंग्रेजी भाषा में एवं यूनाइटेड किंगडम में प्रकाशित उपन्यास को दिया जाता है। बुकर पुरस्कार की शुरुआत 1969 में हुई और यह नोबल पुरस्कार के बाद साहित्य में दिया जाने वाला सबसे बड़ा पुरस्कार माना जाता है। पुरस्कार किसी भी देश के लेखक द्वारा लिखित उपन्यास को दिया जा सकता है। जीतने वाले को 50,000 पाउंड की राशि दी जाती है और इस राशि को लेखक और अनुवादक के बीच बराबर-बराबर बांटा जाता है।
दुनिया की अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य को अंग्रेजी जगत में सम्मान दिलाने और दुनिया में पहचान दिलाने के लिए 2004 से बुकर पुरस्कार समिति ने इंटरनेशनल बुकर प्राइज की शुरुआत की थी। तब से अब तक किसी भी हिंदी भाषा या किसी भी एशियाई भाषा को यह पुरस्कार अब तक नहीं मिला है।
‘मैन बुकर पुरस्कार’

बुकर पुरस्कार का प्रयोजन एवं नियमन संबंधी अधिकार मान(MAN)ग्रुप के पास चले जाने के कारण 2002 से यह ‘मैन बुकर पुरस्कार’हो गया है।
‘मैन बुकर पुरस्कार’ प्राप्त करने वाले 5 भारतीय मूल के लेखक-
1971- वी एस नायपॉल (इन ए फ्री स्टेट)
1981- सलमान रुश्दी (मिडनाइट डिल्ड्रेन)
1997- अरुंधति राय (द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स)
2006- किरण देसाई (द इनहेरीटेंस ऑफ लॉस)
2008- अरविंद अडिगा (द व्हाइट टाइगर)
ऊपर दिए गए लिस्ट के अनुसार अब तक भारतीय मूल के 5 व्यक्तियों को बुकर पुरस्कार मिल चुका है। हमलोग अब तक इसी बात से खुश हो लिया करते थे और यह बात मन मसोसकर मान लेते थे कि ये पुरस्कार तो इंग्लिश के लेखकों को ही मिलता है, तो कोई बात नहीं अगर हिंदी भाषा में नहीं मिल रहा था। लेकिन गीतांजलि श्री की रचना ‘रेत समाधि’ ने इस कसक को दूर करने का काम किया है। 2004 से इंटरनेशनल बुकर प्राइज की शुरुआत के बाद से ‘रेत समाधि’ हिंदी की पहली ऐसी कृति बन गई है जिसे इसके अंतिम 6 उपन्यासों की लॉन्गलिस्ट में शामिल किया गया है।
राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित
‘रेत समाधि’ राजकमल प्रकाशन से 2018 में प्रकाशित हुई। जिसके अंग्रेजी अनुवाद को पिछले दिनों इंटरनेशनल बुकर प्राइज की लॉन्ग लिस्ट में शामिल किया गया था। इस पुरस्कार की घोषणा अक्टूबर 2022 में की जाएगी। इसका अंग्रेजी अनुवाद डेजी रॉकवेल द्वारा ‘Tomb of Sand’ के नाम से किया गया है। अगर गीतांजलि श्री यह पुरस्कार जीतती हैं तो यह पुरस्कार जीतने वाली वह हिंदी की पहली लेखिका बन जाएंगी और उन्हें 50,000 पाउंड की राशि पुरस्कार में मिलेगी जिसे वे अनुवादक के साथ बांटेंगी।
गीतांजलि श्री के पुरस्कार जीतने से यह भारत व एशिया दोनों के लिए एक अभूतपूर्व घटना होगी और इससे अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को एक नई राह मिल जाएगी।
