कानून

पिछले कुछ सालों में परिवार के साथ घूमने के लिए दुबई और सिंगापुर जाना हुआ। दुबई का रंगरंगीला चमाचम और सिंगापुर का हराभरा रूप देखकर मन प्रसन्न हो गया। प्रभावित होने की एक वजह और थी। वह थी इन दोनों देशों की व्यवस्था। चाहे ट्रैफिक हो, मेट्रो हो, परिवहन हो या फिर सफाई, वहां की सटीक और बेहतरीन व्यवस्था देख कर अपने देश की व्यवस्था की कमियां याद आने लगती हैं। हमारा देश हर क्षेत्र में आगे है। देश की युवा शक्ति और बुद्धिमत्ता की सभी देशों में कद्र भी है। फिर भी क्यों हर क्षेत्र में कुछ न कुछ व्यवस्थागत खामियां रह जाती हैं। क्यों हम व्यवस्था के नाम पर हर जगह पिछड़़ जाते हैं। क्यों नहीं हमारी सरकार और प्रशासन उतनी शिद्दत से देशवासियों की सुविधाओं के बारे में सोचती है। क्यों हर जगह हमारे काम संघर्षों के बाद ही हो पाते हैं।

राजधानी दिल्ली की मेट्रो में सफर करते हुए जब किसी बुज़ुर्ग को खड़े या फिर सीट के लिए इल्तिज़ा करते देखती हूं तो बहुत तकलीफ होती है। यह हमारे देश की बड़ी जनसंख्या का ही परिणाम है जो कि हम यदि मेट्रो में भी चलते हैं तो भी हमें भीड़ के बीच ही सफर करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि विदेशों में मेट्रो का सफर हमेशा बैठ कर ही पूरा होता हो, लेकिन यहां जैसी धक्का-मुक्की कहीं देखने को नहीं मिलती। दुबई हो या सिंगापुर, मैंने देखा कि लोग आराम से एक पंक्ति में खड़े होकर मेट्रो के आने का इंतजार करते हैं। सीट मिले या नहीं, उन्हें कोई हड़बड़ी नहीं होती। सड़क पर ट्रैफिक का हाल यह होता है कि यदि दूर से ही वाहन चालक को कोई व्यक्ति सड़क पार करते हुए दिख जाता है तो वह काफी पहले ही गाड़ी रोक देता है ताकि वह आसानी से सड़क पार कर सके। दूसरी ओर जिस व्यक्ति को सड़क पार करनी होती है, वह सड़क पर लगे खंभों का स्विच दबा कर आराम से लाल बत्ती होने का इंतज़ार करता है। कुछ ही देर में बत्ती लाल हो जाती है और वह आराम से सड़क पार कर लेता है।

सिंगापुर में सड़क परिवहन व्यवस्था बेहद सुविधाजनक है। वहां मॉल्स के निचले तल में ही बस टर्मिनस और मेट्रो स्टेशन बने होते हैं। जहां एयरकंडीशन होने के कारण कांच के दरवाजे लगे होते हैं। मॉल के अंदर अलग-अलग बस टर्मिनस पर बसों के नम्बर लिखे होते हैं। बाहर जिस रूट और नम्बर की बस आती है, उसी रूट वाली पंक्ति का दरवाजा खुल जाता है और लोग आराम से बस में चढ़ जाते हैं, फिर दरवाजा अपने आप बंद हो जाता है। सिंगापुर की बस में कोई कंडक्टर नहीं होता। लोग स्वयं ही जि़म्मेदार होते हैं। बसों में भी सिंगापुर मेट्रो यानी एमआरटी का कार्ड ही चलता है और यहां तक कि टैक्सी और अनेक रेस्तरां में भी यही कार्ड काम करता है। ज़रूरत है तो बस इसे रिचार्ज करवाने की। बस में इसी कार्ड को एंट्री पर लगे कार्ड रीडर पर दिखाना होता है और बस, जितना टिकट होता है, उतने पैसे उस कार्ड से कट जाते हैं।

एक और जो बात मुझे बहुत अच्छी लगी वह थी, दुबई के जुमैरा बीच पर समुद्र के बीच से किनारे तक आ रही मोटी-मोटी रस्सियां जो किनारे पर आकर लोहे के एक मोटे खंभे से बंधी हुई थीं। इन्हें पकड़कर बच्चे समुद्र में पानी से खूब अठखेलियां कर रहे थे। यह रस्सी किसी भी मां के लिए बड़ी राहत की बात थी।

इसके बाद आती है कानून और पुलिस व्यवस्था की बात। इन दोनों ही देशों में पुलिस के नाम पर हमें कभी कोई वैन या वर्दी में कोई पुलिसवाला नज़र नहीं आया। तथ्य यह है कि दोनों ही देशों में पुलिस सड़कों पर नहीं घूमती। पुलिस शहर में हर जगह लगे सीसीटीवी कैमरा पर तीखी नज़र रखती है। दुबई में तो स्वर्ण आभूषणों का एक अलग ही बाज़ार है जहां के शोरूम सोने से पटे पड़े हैं। वहां एक-एक शोरूम के शोकेस में आपको इतना सोना दिखेगा जितना आपने अपने जीवन में भी नहीं देखा होगा। लेकिन सुरक्षा के नाम पर उन शोरूम में कोई गार्ड तक नहीं दिखाई देता है। इसकी वजह यही है कि वहां सभी को पता होता है कि छोटा सा भी अपराध किया तो खैर नहीं है। यही खौफ इन देशों में अपराधों को पर लगाम लगाता है जबकि दूसरी ओर हमारे देश में चाहे चोरी की जाए, लूट की जाए या फिर डाका डाला जाए, अपराधी बेखौफ घूमते हैं। यहां तो प्रतिबंध के बावजूद बलात्कारी के इंटरव्यू वाली डॉक्यूमेंट्री का बेरोकटोक प्रसारण किया जाता है। यह देखकर दूसरे ऐसे अपराधियों को खौफ तो क्या होगा, बल्कि अपराध करने के लिए बल ही मिलता है।