Seva Marg by Munshi Premchand
Seva Marg by Munshi Premchand

देवी – उसका एक ही मार्ग है। पर है यह बहुत कठिन। भला, तुम उस पर चल सकोगी? तारा वह कितना ही कठिन हो, मैं उस मार्ग का अवलम्बन अवश्य करूंगी।

देवी – अच्छा तो सुनो, वह सेवा-मार्ग है। सेवा करो, प्रेम सेवा ही से मिल सकता है। तारा ने अपने बहुमूल्य आभूषणों और रंगीन वस्त्रों को उतार दिया। दासियों से विदा हुई। राजभवन को त्याग दिया, अकेले, नंगे पैर साधु की कुटी में चली और सेवा-मार्ग का अवलम्बन किया।

वह कुछ रात रहे उठती। कुटी में झाडू देती। साधु के लिए गंगा से जल लाती। जंगलों से पुष्प चुनती। साधु नींद में होते तो वह उन्हें पंखा झलती। जंगली फल तोड़ लाती और केले के पत्तल बनाकर साधु के सम्मुख रखती। साधु नदी में स्नान करने जाया करते थे। तारा रास्ते के कंकड़ चुनती। उसने कुटी के चारों ओर पुष्प लगाए। गंगा से पानी लाकर सींचती। उन्हें हरा-भरा देखकर प्रसन्न होती। उसने मदार की रूई बटोरी, साधु के लिए नर्म गद्दे तैयार किए। अब और कोई कामना न थी। सेवा स्वयं अपना पुरस्कार और फल थी।

तारा को कई-कई दिन उपवास करना पड़ता था। हाथों में गट्ठे पड़ गये। पैर कांटों से छलनी हो गये। धूप से कोमल गाल मुरझा गया पर उसके हृदय में अब स्वार्थ और गर्व का शासन न था। वहां अब प्रेम का राज था। वहां अब उस सेवा की लगन थी – जिससे कलुषता की जगह आनन्द का स्रोत बहता है और कांटे पुष्प बन जाते हैं, जहां अश्रु-धारा की जगह नेत्रों से अमृत जल की वर्षा होती और दुःख विलाप की जगह आनन्द के राग निकलते हैं। जहां के पत्थर रुई से ज्यादा कोमल हैं और शीतल वायु से भी मनोहर। तारा भूल गयी कि मैं सौंदर्य में अद्वितीय हूं। धन-विलासिनी तारा अब केवल प्रेम की दासी थी।

साधु को वन के खगों और मृगों से प्रेम था। वे कुटी के पास एकत्रित हो जाते। तारा उन्हें पानी पिलाती, दाने चुगाती, गोद में लेकर उनका दुलार करती। विषधर सांप और भयानक जन्तु उसके प्रेम के प्रभाव से उसके सेवक हो गए।

बहुधा रोगी मनुष्य साधु के पास आशीर्वाद लेने आते थे। तारा रोगियों की सेवा-सुश्रूषा करती, जंगल से जड़ी बूटियां ढूंढ़कर लाती, उनके लिए औषधि बनाती, उनके घाव धोती, घावों पर मरहम रखती, रात भर बैठी उन्हें पंखा झेलती। साधु के आशीर्वाद को उसकी सेवा प्रभावयुक्त बना देती थी।

इस प्रकार कितने ही वर्ष बीत गए। गर्मी के दिन थे, पृथ्वी तवे की तरह जल रही थी। हरे-भरे वृक्ष सूखे जाते थे। गंगा गर्मी से सिमट गयी। तारा को पानी लेने के लिए बहुत रेत में चलना पड़ता। उसका कोमल अंग चूर-चूर हो जाता। जलती हुई रेत में तलवे भुन जाते। इसी दशा में एक दिन वह हताश होकर एक वृक्ष के नीचे क्षण भर दम लेने के लिए बैठ गयी। उसके नेत्र बन्द हो गये। उसने देखा, देवी मेरी सम्मुख खड़ी, कृपादृष्टि से मुझे देख रही हैं। तारा ने दौड़कर उनके पदों को चूमा।

देवी ने पूछ – तारा, तेरी अभिलाषा पूरी हुई?

तारा – हां माता, मेरी अभिलाषा पूरी हुई?

देवी – तुझे प्रेम मिल गया?

तारा नहीं माता, मुझे उससे भी उत्तम पदार्थ मिल गया। मुझे प्रेम के हीरे के बदले सेवा का पारस मिल गया। मुझे ज्ञात हुआ कि प्रेम सेवा का चाकर है। सेवा के सामने सिर झुकाकर अब मैं प्रेम-भिक्षा नहीं चाहती। अब मुझे किसी दूसरे सुख की अभिलाषा नहीं। सेवा ने मुझे प्रेम, आदर, सुख सबसे निवृत्त कर दिया।

देवी इस बार मुस्कुराईं नहीं। उसने तारा को हृदय से लगाया और दृष्टि से ओझल हो गयी।

संध्या का समय था। आकाश में तारे ऐसे चमकते थे जैसे कमल पर पानी की बूंदें। वायु में चित्ताकर्षक शीतलता आ गयी थी। तारा एक वृक्ष के नीचे खड़ी चिड़ियों को दाना चुगाती थी कि यकायक साधु ने आकर उसके चरणों पर सिर झुकाया और बोला – तारा, तुमने मुझे जीत लिया। तुम्हारा ऐश्वर्य, धन और सौंदर्य जो कुछ न कर सका, वह तुम्हारी सेवा ने कर दिखाया। तुमने मुझे अपने प्रेम में आसक्त कर लिया।अब मैं तुम्हारा दास हूं। बोलो, तुम मुझसे क्या चाहती हो? तुम्हारे संकेत पर अब मैं अपना योग और वैराग्य सब कुछ न्यौछावर कर देने के लिए प्रस्तुत हूं।

तारा – स्वामीजी, मुझे अब कोई इच्छा नहीं। मैं केवल सेवा की आज्ञा चाहती हूं। साधु – मैं दिखा दूंगा कि योग साधकर भी मनुष्य का हृदय निर्जीव नहीं होता। मैं भंवरे के सदृश तुम्हारे सौंदर्य पर मंडराऊंगा। पपीहे की तरह तुम्हारे प्रेम की रट लगाऊंगा। हम दोनों प्रेम की नौका पर ऐश्वर्य और वैभव-नदी की सैर करेंगे, प्रेम-कुंजी में बैठकर प्रेम करेंगे और आनन के मनोहर राग गाएंगे।

तारा ने कहा – स्वामीजी, सेवा-मार्ग पर चलकर मैं अब अभिलाषाओं से पूरी हो गयी। अब हृदय में और कोई इच्छा शेष नहीं।

साधु ने इन शब्दों को सुना, तारा के चरणों पर माथा नवाया और गंगा की ओर चल दिया।