Overview: माधुरी दीक्षित को काली छतरी के नीचे जंगलों में होना पड़ता था तैयार
हाल ही में एक बातचीत के दौरान माधुरी ने उन दिनों का जिक्र किया जब ग्लैमर के पीछे कड़ी मेहनत और संघर्ष की एक लंबी दास्तान हुआ करती थी।
Madhuri Dixit Shooting Experience: सिनेमा की चकाचौंध भरी दुनिया आज जितनी सुविधाजनक और लग्जरी दिखती है, हमेशा ऐसी नहीं थी। आज जब हम किसी फिल्म के सेट की कल्पना करते हैं, तो आलीशान वैनिटी वैन, एसी और हर सुख-सुविधा का ख्याल रखने वाली एक बड़ी टीम दिमाग में आती है। लेकिन बॉलीवुड की ‘धक-धक गर्ल’ माधुरी दीक्षित जब पीछे मुड़कर देखती हैं, तो यादों के झरोखे से एक अलग ही तस्वीर उभरती है।
हाल ही में एक बातचीत के दौरान माधुरी ने उन दिनों का जिक्र किया जब ग्लैमर के पीछे कड़ी मेहनत और संघर्ष की एक लंबी दास्तान हुआ करती थी। एक्ट्रेस ने बताया कि कैसे उन्हें जंगलों में काली छतरी के नीचे तैयार होना पड़ता था।
वो दौर जब वैनिटी वैन एक सपना थी
माधुरी दीक्षित ने 80 और 90 के दशक के उन संघर्षों को याद किया, जिसकी कल्पना आज के दौर के कलाकार शायद ही कर पाएं। उन्होंने बताया कि उस वक्त फिल्म इंडस्ट्री आज की तरह संगठित नहीं थी। माधुरी कहती हैं, “आज के समय में शूटिंग बहुत आरामदायक हो गई है, लेकिन तब न तो वैनिटी वैन होती थी और न ही कोई प्राइवेट स्पेस।” सोचिए, आज जो सितारे एक छोटा सा स्पॉट भी बिना एसी के बर्दाश्त नहीं करते, उस दौर में उन्हें घने जंगलों, कड़ी धूप और कड़कड़ाती ठंड में खुले आसमान के नीचे तैयार होना पड़ता था।
माधुरी ने बताया कि ऊटी जैसे हिल स्टेशन्स पर शूटिंग के दौरान हालात और भी कठिन हो जाते थे। हेयरड्रेसर शॉल ओढ़कर ठंड से बचते थे और कलाकार पेड़ की छांव या किसी झाड़ी के पीछे जाकर अपने कॉस्ट्यूम बदलते थे।
मजबूरी नहीं, काम का जुनून था
दिलचस्प बात यह है कि माधुरी इन मुश्किलों को कोई ‘बड़ा त्याग’ नहीं मानतीं। उनके अनुसार, उस वक्त यही जीवनशैली थी। वह कहती हैं, “उस समय काम के प्रति इतना जुनून था कि किसी को यह महसूस ही नहीं होता था कि हम किसी तरह की तकलीफ में हैं। हम सब एक बड़े परिवार की तरह थे और हमारा एक ही मकसद होता था, फिल्म को बेहतरीन बनाना।”
माधुरी ने की आज के बॉलीवुड की तारीफ
माधुरी ने अपने सफर की शुरुआत ‘अबोध’ से की थी और हाल ही में ‘मिसेज देशपांडे’ तक का लंबा सफर तय किया है। उन्होंने इस बदलाव को बहुत करीब से देखा है। उनके मुताबिक, पुराने दौर में केवल कुछ ही प्रोडक्शन हाउस जैसे राजश्री, यश चोपड़ा, सुभाष घई और बी.आर. चोपड़ा बेहद व्यवस्थित तरीके से काम करते थे। बाकी जगहों पर काम परिस्थितियों के भरोसे चलता था।
आज के दौर की तारीफ करते हुए वह कहती हैं कि अब इंडस्ट्री बहुत प्रोफेशनल हो गई है। आज कलाकारों को शूटिंग से पहले पूरी स्क्रिप्ट मिलती है, किरदार की तैयारी के लिए वक्त दिया जाता है और सेट पर वैनिटी वैन जैसी सुविधाएं मिलती हैं जहां कलाकार शॉट के बीच आराम कर सकते हैं। पहले तो धूप में छाता लेकर बैठना ही एकमात्र ‘लग्जरी’ हुआ करती थी।
