Shiva and Kamadeva
Shiva and Kamadeva

Mythological story of Shiva and Kamadeva: हिंदू धर्म में भगवान शिव और कामदेव दोनों ही महत्वपूर्ण देवता हैं, जो एक-दूसरे से विपरीत स्वभाव के होते हुए भी एक-दूसरे से गहरे रूप में जुड़े हुए हैं। शिव जहाँ विनाश और पुनर्निर्माण के देवता माने जाते हैं, वहीं कामदेव प्रेम, आकर्षण और कामवासना के देवता हैं। दोनों के बीच की कड़ी एक ऐसी कहानी को दर्शाती है, जिसमें प्रेम और तपस्या का संगम होता है।

कामदेव का जन्म भगवान ब्रह्मा के मन से हुआ था। उन्हें देवताओं और मनुष्यों के बीच प्रेम और कामवासना का संचार करने वाला देवता माना जाता है। कामदेव को एक सुंदर, युवा देवता के रूप में चित्रित किया जाता है, जिनके पास बांस का धनुष और मधुमक्खियों से बनी डोरी होती है। उनका वाहन हरा तोता होता है और वे अपने पाँच बाणों से लोगों के दिलों में प्रेम और आकर्षण का संचार करते हैं। उनकी पत्नी रति (कामवासना) होती है, जो उनके साथ प्रेम के हर रूप का प्रतीक बनती है।

भगवान शिव, जिन्हें महादेव भी कहा जाता है, विनाश और पुनर्निर्माण के देवता हैं। शिव के बारे में कहा जाता है कि वे निराकार और निरंकारी हैं, और उनका रूप अत्यधिक कठोर और उग्र होता है। शिव के तीसरे नेत्र, त्रिशूल, और शांतिपूर्ण ध्यान की मुद्रा उन्हें जीवन और मृत्यु के चक्र के ऊपर एक नियंत्रण प्रदान करते हैं।

शिव का जीवन एक आदर्श तपस्वी का जीवन है, जो दुनिया से अलग हटकर ध्यान और साधना में लीन रहते हैं। वे ब्रह्मांड के चक्र को नियंत्रित करते हैं और जीवन के विनाश के समय भी शांति और संतुलन बनाए रखते हैं। शिव की गहरी तपस्या और उनके क्रोधी रूप को देखकर यह कहा जा सकता है कि वे अपनी उग्रता और शांति दोनों के संतुलन में रहते हैं।

एक प्रसिद्ध कथा में भगवान शिव और कामदेव का टकराव होता है। जब भगवान शिव अपनी पत्नी सति के आत्मदाह से गहरे शोक में डूबे थे और उन्होंने ध्यान में लीन होकर सभी सृष्टि से खुद को अलग कर लिया था, तब पूरी दुनिया में असंतुलन फैल गया। देवताओं ने भगवान शिव को उनके ध्यान से हटाने के लिए कामदेव को भेजा, ताकि शिव के हृदय में प्रेम जागृत हो और वह फिर पार्वती से विवाह करने के लिए तैयार हो जाएं।

कामदेव ने भगवान शिव पर अपने बाण छोड़े, जिससे भगवान शिव के हृदय में पार्वती के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ। लेकिन शिव ने तुरंत यह महसूस किया कि यह कामदेव का काम था। शिव ने अपनी तीसरी आँख खोल दी और कामदेव को भस्म कर दिया। इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि भगवान शिव के लिए प्रेम और आकर्षण के किसी भी रूप से अधिक महत्वपूर्ण उनके ध्यान और तपस्या का सिद्धांत था।

कामदेव के भस्म होने के बाद रति, उनकी पत्नी, बहुत दुखी हुईं। देवताओं ने भगवान शिव से कामदेव को पुनः जीवन देने की प्रार्थना की, और शिव ने उन्हें आश्वासन दिया कि कामदेव एक दिन पुनः जन्म लेंगे, लेकिन इस बार वह एक अदृश्य रूप में रहेंगे। भगवान शिव ने यह भी कहा कि कामदेव का पुनर्जन्म कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में होगा।

प्रद्युम्न के रूप में कामदेव ने फिर से रति से मिलन किया और शंबर राक्षस का वध करके अपना कर्तव्य पूरा किया। इस पुनर्जन्म में कामदेव का कार्य केवल प्रेम और आकर्षण तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उसने राक्षसों का नाश भी किया और पुनः सृष्टि में संतुलन लाया।

भगवान शिव और कामदेव की कथाएँ यह दर्शाती हैं कि सृष्टि के निर्माण और विनाश के बीच एक गहरा संबंध है। जहाँ भगवान शिव विनाश और पुनर्निर्माण के देवता हैं, वहीं कामदेव प्रेम और आकर्षण के देवता हैं। दोनों देवताओं के बीच की यह कड़ी जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रकट करती है, जिसमें शांति, तपस्या, प्रेम और आकर्षण का संतुलन महत्वपूर्ण होता है। शिव की तपस्या और कामदेव का प्रेम, दोनों ही सृष्टि के चक्र में आवश्यक तत्व हैं, जो जीवन और मृत्यु के बीच संतुलन बनाए रखते हैं।

राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...