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प्रतीक्षित लम्हा- भाग 1

मेरी बातों को सुन आलोक ने मेरी आंखों में झांका, धीरे से मुस्कुराया… कुछ देर यूं ही मुस्कुराता रहा। फिर बोल उठा- ‘ऐसी बात तो नहीं भावी। तुम तो… मेरी मूकता में… शब्द हो…! और सच पूछो तो मैं तुममें ही जीवन का सार ढूंढा करता हूं, जहां मेरे मन में भावनाओं के न जाने […]

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मुझे माफ़ कर देना- भाग 2

फिल्म और साहित्य को लेकर वह अक्सर बातें करता था। विशेषकर वे बातें जो स्त्री-पुरुष के बीच की अंतरंग बातों को व्याख्यायित करती थीं। मेरे भीतर एक औरत भूखी रहने लगी थी। मैं उसकी भूख को कुचलने की कोशिश करती, तो वह और अधिक भड़क उठती। मैं सोचती कि वह भूख रवीन्द्र के सानिध्य में कम हो जाएगी, उसके स्पर्श से वह शांत हो उठेगी, पर ऐसा न होता। वह और अधिक तेज़ हो जाती। फिर सोचती, रवीन्द्र्र की अनुपस्थिति में यह भूख शांत हो जाएगी, पर जब वह मेरे करीब न होता तो इस भूख को जैसे दौरा-सा पड़ जाता। मुझे वह रवीन्द्र के पास दौड़ा ले जाना चाहती। अभी मैं अपने भीतर की औरत की इस भूख से दो-चार हो ही रही थी कि मुझे यह अहसास होने लगा कि रवीन्द्र की दिलचस्पी मुझमें खत्म होती जा रही है, वह अब तेरी तरफ झुक रहा है।

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मुझे माफ़ कर देना- भाग 1

डाक में कुछ चिट्ठियाँ आई पड़ी हैं। निर्मल एकबार उन्हें उलटपलट कर देखती है, पर पढऩे को उसका मन नहीं कर रहा। वह जानती है कि ये सभी चिट्ठियाँ पाठकों की तरफ से ही आई हैं, जो नि:संदेह अभी हाल ही में एक पत्रिका में छपे उसके आत्मकथा-अंश को लेकर ही होंगी। अधिकांश में उसकी तारी$फ होगी, कुछ में उसके साथ सहानुभूति दिखाने की कोशिश की गई होगी और हो सकता है, एक-आध चिट्ठी में आलोचना भी हो। पता नहीं क्यों, आजकल पाठकों के आए खतों को वह उतनी बेसब्री से नहीं पढ़ती जितनी बेसब्री से पहले पढ़ा करती थी। उसकी रचना पर यदि कोई खत आता था तो वह सारे काम छोड़कर उसे पढऩे बैठ जाया करती थी। कई-कई बार पढ़ती थी, खुश होती थी। दिनभर एक नशा-सा तारी रहता था उस पर।

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प्रतीक्षित लम्हा- भाग 2

वह उन्हें देख कर कह उठे- ‘भावी! कितनी प्यारी है ये पहाडिय़ां और कितनी सुंदर है इन पर बर्फ से ढकी चादर। बिल्कुल तुम्हारी तरह। जी चाहता है बस तुम्हें इसी तरह निहारता रहूं। बड़ा सुख और संतोष है तुम्हारे सौंदर्य को देखने और निहारने में। और मैं मन ही मन पुलकित हो उठती। आलोग ने बताया था कि उसके घर वाले भी शादी के लिए तैयार हैं। यह कहते हुए उसने मेरे मुंह में एक टॉफी डाल दी थी, आधी अपने दांतों से काटकर। फिर हम दोनों मुस्कुराते हुए आगे बढ़ चले थे। एक साथ एक ही डगर पर।

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