वट सावित्री व्रत में सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए इस दिन वट यानी कि बरगद के पेड़ के नीचे पूजा-अर्चना करती हैं।
वट सावित्री व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त
वट सावित्री व्रत की तिथि: 22 मई 2020
अमावस्या तिथि प्रारंभ: 21 मई 2020 को रात 9 बजकर 35 मिनट से
अमावस्या तिथि समाप्त: 22 मई 2020 को रात 11 बजकर 8 मिनट तक
वट सावित्री व्रत का महत्व
इस व्रत में वट का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि इसी पेड़ के नीचे सावित्री ने अपने पति को यमराज से वापस पाया था। हिंदू पुराण में बरगद के पेड़े में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास बताया जाता है। मान्यता के अनुसार ब्रह्मा वृक्ष की जड़ में, विष्णु इसके तने में और शिव उपरी भाग में रहते हैं। यही वजह है कि यह माना जाता है कि इस पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होती है।
वट सावित्री पूजन सामग्री
सत्यवान-सावित्री की मूर्ति, धूप, मिट्टी का दीपक, घी, फूल, फल, 24 पूरियां, 24 बरगद फल (आटे या गुड़ के) बांस का पंखा, लाल धागा, कपड़ा, सिंदूर, जल से भरा हुआ पात्र और रोली।

कैसे करें पूजा?
- पूजा स्थल पर पहले रंगोली बना लें फिर पूजा स्थल पर एक चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर उस पर लक्ष्मी नारायण और शिव-पार्वती की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित करें।
- लॉकडाउन में बरगद के पेड़ के पास पूजा करने नहीं जा सकते हैं इसलिए कहीं से बरगद पेड़ की एक टहनी तोड़ कर मंगवा लें और गमले में लगाकर उसकी पूजा करें।
- पूजा की शुरूआत गणेश और माता गौरी से करें।
- फल और पूरियां अपने आंचल में रखकर वट की पूजन करें और पूरियां और फल वट पर चढ़ा दें।
- इसके बाद वट पर एक लोट जल चढ़ाएं। फिर हल्दी, रोली और अक्षत लगाएं।
- इसके बाद धूप-दीप से पूजन करें। फिर वट में कच्चे सूत को लपटते हुए 12 बार परिक्रमा करें। हर परिक्रमा पर एक भीगा हुआ चना चढ़ाते जाएं।
- परिक्रमा पूरी होने के बाद सत्यवान व सावित्री की कथा सुनें।
- फिर 12 कच्चे धागे वाली एक माला वृक्ष पर चढ़ाएं और दूसरी खुद पहन लें। अब 6 बार माला को वृक्ष से बदलें और अंत में एक माला वृक्ष को चढ़ाएं और एक अपने गले में पहन लें।
- पूजा खत्म होने के बाद पति का पति का आशीर्वाद लें और अपना व्रत खोले।
