जब मैंने पुदुचेरी की उप राज्यपाल के रूप में शपथ ली थी, मैंने अपने एक लक्ष्य के रूप में इसे एक नाम दिया था- समृद्ध पुदुचेरी। तब मुझे पता नहीं था कि यह कैसे होगा और इसके लिए कितना कुछ करना होगा। अनुशासन पृष्ठभूमि से होने के नाते मेरी ड्यूटी हमेशा यह सुनिश्चित करने से ही शुरू होती है कि बेसिक सही हैं या नहीं और मैं स्वयं अपनी इंचार्ज होती हूं।

शुरूआती राउंड में मैंने देखा कि इसे अनुशासन की जरूरत है क्योंकि उस अराजक स्थिति में इसे संभालना मेरे लिए आसान नहीं था। दुकानदारों ने फुटपाथों पर सामान फैलाया हुआ था और सड़क पर कारवाले हॉर्न बजा-बजा कर पैदल चलने वालों को परेशान कर रहे थे। जो जगह बची थी, उसे दुकानदारों ने अपनी गाडिय़ों की पार्किंग के तौर पर इस्तेमाल किया हुआ था। यह तो स्वीकार्य नहीं है। मेरी जरूरत तो मौलिक थी।

कानून का नियम, कानून के प्रति आदर, विश्वास के साथ कानून के अनुपालन की इच्छा और सेवा देने वालों को प्रति विश्वास। मैंने कानून लागू करने के लिए पुलिस की उपस्थिति को प्राथमिकता दी, ताकि जमीन के हर इंच पर जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। अब पुदुचेरी में हर इंच किसी एक पुलिस अधिकारी के नाम से पहचाना जाता है। यह जल्दी ही सही हो गया… लेकिन… स्वच्छता का काम वाकई मुश्किल था। मैंने देखा कि बहुत से बाहरी शहरी और ग्रामीण इलाकों का दृश्य पूरी तरह अस्वीकार्य था।

खुले में कूड़े के ढेर और पड़ी गंदगी को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। इसे सही करना था, लेकिन आदेश से नहीं, बल्कि उन्हें जोड़कर, समस्या की गहराई को समझकर। समझना कि क्यों हम सब शहर में भरी पड़ी नालियों और उनसे आती बदबू को झेल रहे हैं, जो मानसून में ओवरफ्लो हो जाती हैं और सारी गंदगी लोगों के घर में पहुंचती है। मैंने कहा कि यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है, इसलिए हमें, हमारे पास जो भी जैसा भी है, उसके साथ ही स्वच्छता अभियान शुरू करना होगा। तब मुझे मालूम हुआ कि यह कितना मुश्किल था।

यह सिर्फ इतना ही नहीं था कि पानी की कनाल सीवेज से मिल रही थी, बल्कि बड़ी समस्या यह थी कि उन हजारों लोगों द्वारा खुले में शौच किया जा रहा था, जिन्होंने टॉयलेट की जगह छोड़े बिना अपने छोटे-छोटे घर बना लिये थे। उनका मानना था कि वहां मौजूद जमीन, पार्क, झील इत्यादि उनके शौच के लिए ही हैं। पुरुषों के लिए तो कोई समस्या नहीं थी लेकिन महिलाएं? प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान के तहत भारत सरकार द्वारा शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में घरों तथा कम्युनिटी में शौचालय बनवाने के लिए पर्याप्त फंड उपलब्ध कराया जा रहा है। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं था। आप इसे कैसे लागू करेंगे? क्योंकि इसके लिए बड़ी मात्रा में एक बुनियादी ढांचे की जरूरत थी। और जहा यह था भी, जैसे कम्युनिटी शौचालय, इसे इस्तेमाल करने के लिए व्यावहारिक बदलाव की जरूरत थी। और फिर यह सवाल भी कि इसका रखरखाव कौन करेगा? यह तय कौन करेगा कि कोई भी खुले में न जाए और सभी इसका इस्तेमाल करें। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? राजनेता, कलेक्टर, बीडीओ, पब्लिक अधिकारी, महिला एसएचओ या निजी स्वयंसेवी संस्थाएं? 

इसे कौन लागू करेगा और करता रहेगा? कुछ जगहों पर कलेक्टर्स या नगर निगम ने जबकि कुछ जगहों पर महिलाओं के स्वयंसेवी ग्रुप्स ने पहल करके इसे किया। दोस्तों, इसीलिए मैंने प्रसिद्ध सितारे रजनीकांत को स्वच्छ पुदुचेरी के लिए ब्रांड एम्बेसडर चुना। मुझे लगता है कि उनके संदेश से बहुत से लोग तो स्वयं ही अपने घरों में टॉयलेट बनवा लेंगे। इससे अनेक व्यावहारिक परिवर्तन आएगे जो काम में तेजी के लिए बेहद जरूरी हैं। लोगों का यह जानना जरूरी है कि यह बदलाव उनके बच्चों के जीवन को बचा सकता है, क्योंकि बच्चे ही सड़क पर जगह-जगह पड़ी गंदगी के कारण बीमारियों के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं।

पुदुचेरी के हमारे कलेक्टर ने टॉयलेट बनाने के लिए सिर्फ कबाली फिल्म का एक फ्री टिकट देने की बात कही और वहां दंगा मच गया। सोचें, अगर रजनीकांत का चेहरा उन्हें दिख गया तो क्या होगा? शायद आप समझ गए होंगे कि समृद्ध पुदुचेरी तक समृद्ध नहीं हो सकती जब तक यह सुरक्षित और स्वच्छ नहीं हो और न ही भारत तब तक समृद्ध हो सकता जब तक इसका हर निवासी को मानवनीय गरिमा न प्राप्त हो।