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गृहलक्ष्मी की कहानियां  : चक्रव्यूह में फंसी औरत
Stories of Grihalakshmi

गृहलक्ष्मी की कहानियां : घर के छोटे से बगीचे में हरे भरे सुंदर फूलों के पौधे करीने से गमलों में लगे थे। मेन दरवाजे से अन्दर घुसते ही भगवान जी की एक सुंदर बड़ी सी मूर्ति स्थापित थी और मोगरा अगरबत्ती की खुशबू का झोंका यकायक सांसों को महकाने लगता। एक कोने की तिकोनी मेज पर ताजे अखबार और पत्रिकाएं थीं। दूसरी ओर शेल्फ़ पर रखी हुई आधुनिक फ्रेमों में जड़ी कुछ तस्वीरें बड़े ही सलीके से रखी थीं।  उस बड़े से हाल में से एक दरवाजा किचन की ओर खुलता था , जहां सलीके से रखे बर्तन और वहां की साफ़ सफाई उस औरत की सुगढ़ता को दिखला रहे थे। सामने वाली दीवार पर एक बड़ी सी पेंसिल स्केच वाली एक ड्राइंग फ्रेम में लगी बड़ी प्यारी लग रही थी और उसके कोने मे उस औरत का नाम लिखा था । 

अपने हाथ में एक कपड़ा लिये वह डायनिंग टेबल पर रखी प्लेटों को पोंछ कर सजा रही थी। सलाद की प्लेट को सजाना,  और फलों को फ्रिज से निकाल कर टेबल के सेंटर में रखना।

यह सब काम हो रहे थे कि अचानक से उसके मोबाइल की बेल बजी और उसने झट से बोला , ” हैलो “………” पर मैंने तो खाना बनाया है ” ……..और फोन कट गया । फिर उसके चेहरे पर थोड़े मायूसी के बादल आए पर दूसरे ही पल वह सहज हो गई,  क्योंकि बच्चों के स्कूल से वापस आने का समय था ।

इसी दिनचर्या में से समय निकालकर वह औरत बाहर भी जाती – बच्चों की किताबें लेने, साहब की पसंद की सब्जियाँ लेने, घर को घर बनाए रखने का सामान लेने। स्कूल से लौटते अपने बच्चों को दोनों बाहों में भर लेती और बच्चों के साथ पति का इंतजार करने लगती। बच्चों की आंखों में अपनी मासूम मांग पूरे होने की चमक होती कि मां दिनभर कहीं भी रहे, पर उनके स्कूल से लौटने से पहले उन्हें घर में उनके पसंदीदा खाने के साथ मां हाजिर मिलनी चाहिए। यही हिदायत पति जी की भी थी।

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यह सारी दिनचर्या एक घर की रहती ही है आमतौर पर। और हर दूसरी औरत के पूरे दिन की कहानी भी यही रहती है। पर उस औरत की एक बड़ी मुश्किल थी कि उसकी अपनी हंसी,  जो कभी खिलखिलाहट से गूंजती थी, वह नदारद थी उसके चेहरे से । जो संतुष्टि के भाव होते हैं, वे उसकी फाउंडेशन की परत के नीचे कहीं दबे थे। वह ढूंढती थी अपनी वह हँसी,  पर नहीं मिलती थी वह उसे अपने पास ।

बच्चे, जो अब बच्चे नहीं रहे थे, हंसकर पूछते, “क्या खो गया है मैम? हम मदद करें ?” 

“नहीं, मैं खुद ढूँढ लूँगी।” …वह अपनी झेंप मिटाती हुई कहती। “यहाँ, इस कमरे में तो नहीं है न !!!” …बच्चे शायद उसका मजाक उड़ाते फिर अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो जाते और मां को भूल जाते,  पर जब किसी चीज की जरूरत होती या भूख लगती तो मां की याद आती । बेटी जो अब यौवन की दहलीज पर खड़ी थी , पूछती,  ” हे मम्मी,  जस्ट चिल् ..!!!!” , तब लगता कि आज की ये पीढ़ी कितनी सहजता से बातों को कह लेते हैं,  और एक हम हैं कि अपने इमोशनल मन के चक्रव्यूह में ही फंसे रह जाते हैं ।

ऐसे ही चक्रव्यूह में फंसी वह औरत , जो एक सहज हंसी नहीं हंस पाती थी , उसे लगता था कि वह एक मुखौटा औढ़े रहती है हर पल। अपनी बहन से बात करते हुए,  अपनी सबसे प्यारी सहेली से भी वह अब वैसी सहजता महसूस नहीं करती थी , मन खुल नहीं पाता था उसका। कुछ था , जो उसे खुश होने से रोकता था ।  शाम हुई,  और बच्चे घर से बाहर खेलने निकले तो वह चुपचाप अपने कमरे में गई । साड़ी उतारी और अपने ब्लाउज की दाहिनी बाजू को जरा सा खिसकाया और सामने की टेबल पर रखी बेटनोवेट की स्किन क्रीम को दाहिने कंधे पर दिख रहे गहरे लाल रंग के बड़े से निशान पर मला और वापस ब्लाउज को ठीक से पहन कर दोबारा साड़ी ओढ़ ली, फिर से थोड़ा फाउंडेशन लगाया और पलकों के कोनों पर जो नमी आ गई थी , उसे पोंछा और आंखों को अच्छा दिखाने के लिये काजल का एक स्ट्रोक लगा लिया। फिर से वही गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगाई और अपने होठों पर एक मुस्कान को भी सजा लिया ।

तो क्या यह एक घाव था जो उसे हंसने से,  खिलखिलाने से रोकता था ? शादी के अट्ठारह सालों में जाने कितने ऐसे घावों को वह छुपा छुपा कर रखती रही है, चुपके से मलहम लगा कर एक झूठी मुस्कान सजा कर सहज होने की कामयाब कोशिश करती रही है। शरीर के घाव तो वह बेटनोवेट लगाकर भर लेती थी पर उसकी आत्मा पर जो ज़ख्म थे, उनके लिये कोई दवा नही थी। वह रिसते थे, दर्द भी करते थे पर दिखते नही थे किसी को भी।

रात को जब बच्चों का खाना निपट गया, तो पतिदेव की कार का हार्न सुनते ही वह लपक कर दरवाजा खोलने गई, ” आज कुछ ज्यादा काम था ? ” ….थोड़ा हिचकिचाहट के साथ पूछा। कोई जवाब नहीं।  पत्नी का दिन कैसे बीता,  बच्चों की पढाई की कोई चिंता नहीं। एक सुगढ़ पत्नी होने का यही आराम रहता है जीवन भर पतिदेव जी को। खैर , फिर से रात का वह पल आया जब पतिदेव का हाथ उस औरत के शरीर पर चलना शुरू हो गया। उस घाव पर भी गया तो एक आह के साथ उस औरत ने मुंह मोड़ लिया। वह घाव अभी दो दिन पहले का ही तो था। थोड़ी देर में फिर वही खींचातानी। वह औरत अपनी दबी सी आवाज़ में सिसक रही थी पर पतिदेव को इससे कोई फरक नही पड़ता। यह खींचातानी ज्यादा देर तक नही चल पाई क्योंकि बिल्कुल साथ वाला कमरा बच्चों का था। वह रात एक और नया घाव छोड़ गई थी उसकी आत्मा पर और शरीर के घाव को और गहरा गई थी।

सुबह अलार्म बजा। रसोई में से आवाजें आने लगीं। ” बच्चों …..चलो उठो, स्कूल के लिये देरी हो जायेगी। ….आप भी उठिये चाय बन गई है।”…..वह औरत एक सुन्दर सी साड़ी पहने,  धुले लम्बे बालों को समेटती चाय का कप लिये बेडरूम की तरफ चली गई।

यह भी पढ़ें –संगति का असर – गृहलक्ष्मी कहानियां

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