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Childhood Memory

Childhood Memory: खुले आसमान के नीचे छत पर सोने का अनुभव हम और आप बखूबी जानते हैं। एक बार यह अनुभव अपने बच्चों को भी करवाकर देखें।

उस अनुभव का तो कोई मुकाबला ही नहीं

९० के दशक का हमारा वो बचपन बहुत खूबसूरत था। जब गर्मियों की छुट्टियों के साथ बुआओं के आने की आमद होती थी। घर उस समय छोटे ही हुआ करते थे। लेकिन दिल बहुत बड़े थे। आज के जमाने की तरह किसी को भी कोई प्राइवेसी नहीं चाहिए होती थी। ऐसे में किसी अलग कमरे की दरकार न के बराबर थी। हॉल में सभी लोग एक साथ आपस में बतियाते वक्त गुजारते थे। उस समय तो कमरे बस सामान रखने के लिए हुआ करते थे। दिन में कैरम, लूडो चलता था। रात की बात करें तो उसके तो कहने ही क्या… शाम को छत को ठंडा करने के लिए पानी का छिडक़ाव होता था। छत पर बाल्टी लेकर जाना, सुराही या छोटी मटकी का रखा जाना। एक टेबिल फैन, सिरहाने पर हाथ के पंखे, कितना कुुछ था, जो अब कहीं खो सा गया है। रात में खाने के बाद छत पर सभी के बिस्तर लगा करते थे। तारों की छांव के नीचे वो सोना उस अनुभव का तो कोई मुकाबला ही नहीं। अगर किसी पहर आंख खुल जाए तो ऐसा लगता था तारे हमें देखकर मानों मुस्कुरा रहे हों।

उन्हें भी तो होना चाहिए अनुभव

आजकल तो महानगरों में फ्लैट कल्चर आ चुका है। जिन लोगों के अपने मकान भी हैं वह भी कूलर और एसी मे नीचे ही सोते हैं। समय के साथ छत पर सोने का कॉन्सेप्ट तो चला ही गया। लेकिन हां गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं। ऐेसे में अगर आप अपने पुराने शहर या गांव जाकर बच्चों को यह अनुभव कराएंगे तो उन्हें भी अच्छा लगेगा। वो ब्रहमांड के साथ एक रिश्ता जोड़ पाएंगे। उन्हें पता चलेगा तारों का टूटना क्या होता है। चांद की शीतलता के क्या मायने हैं। धूमकेतू,, मिल्की वे को समझने का इससे प्रैक्टिल तरीका और क्या हो सकता है?

एक नियम सिखाती है

हम सभी को मालूम है कि प्रकृति निरंतर गतिमान है। हर चीज अपने नियत समय पर होती है। छत पर बच्चे सोएंगे तो उन्हें समय पर उठना ही होगा। सूर्य देवता तो अपने समय पर ही पधारेंगे। उन्हें लगता है जब वो आ गए हैं तो सभी को अपने काम-काज पर लग जाना चाहिए। यही वजह है कि सूरज की रौशनी मुंह पर ऐसी पड़़ती है कि आप चाहें कितनी भी चादर से अपने चेहरे को क्यों न ढक लें आप सो नहीं सकते। सूरज की किरणों की जिद के सामने पलकें बंद रही नहीं सकती। नींद को भी दुम दबाकर भागना ही होता है। सूरज और नींद की लुकाछिपी के इस खेल से बच्चों को पता चलेगा कि प्रकृति एक नियम सिखाती है। बच्चों को आप यह समझा पाएंगे कि लोग क्यों पहले अपने आप ही जल्दी सोते और उठते थे। क्योंकि प्रकृति के साथ उनका एक सेतू था। कितने ही बड़े लोगों को आपने यह कहते सुना होगा कि भई हमसे तो सूरज की रौशनी के बाद सोया नहीं जाता। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने सूरज और अपने उठने को एक संबंध में बांधा है।



मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि तारों को निहारना आपके स्ट्रेस को दूर करता है। ऐसा आज के समय में हमेशा तो नहीं हो सकता। लेकिन बच्चे जब एक-दो बार छत पर सोएंगे तारों को देखेंगे तो उनके मन की उथल-पुथल भी शांत होगी। उनकी रचनात्मकता भी बड़ेगी। तारों के झुंंड को देखना, उनमें एक पैटर्न को समझना बड़े ही रोचक होते हैं। इससे उनमें एकाग्रता भी आएगी।
बच्चों के साथ आप भी देखें
कोराना ने हमें बता दिया जब हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हैं तो प्रकृति पलट कर क्या जवाब देती है। हमें प्रकृति और अपने रिश्ते को खूबसूरत बनाना है। महानगरों में छत पर सोना प्रैक्टिल नहीं है। लेकिन अपनी खिडक़ी से चांद और तारे तो निहारे जा ही सकते हैं। अगर बच्चे छोटे हैं तो उनके साथ बैठकर ऊपर वाले के इस सजीले आसमान को निहारें। सोचिए एक बार अगर यह टिमटिमाते तारे नहीं होते तो ऊपर देखने में कितना खौफ आता। चमकते चांद और सितारे आपका इंतजार कर रहेे हैं। कितने बरस बीत गए उनको मन भर देखे हुए भी। बच्चों के साथ इस अनुभव को जिएंगे तो आप भी बचपन की उन गलियों में लौट जाएंगे जहां का रास्ता ‘खुशीगंज’ की तरफ लेकर जाता है।

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