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दरवाजे की घंटी जोरों से बजी..-गृहलक्ष्मी की लघु कथा
Darwaze ki Ghanti Joro se Baji

गृहलक्ष्मी की लघु कथा-“ओह इतनी रात गए कौन है? उठिए ना, जाकर देखिए कौन आया!” ममता जी ने अपने पति मनोहर जी को जगाते हुए कहा।
दरवाजा खोलने पर मोहन खड़ा दिखा जो कि घबराया हुआ था। उसे देखकर मनोहर जी ने पूछा, “क्या बात है मोहन? इतने घबराए क्यों लग रहे हो?”
“भईया, सुबह तो बाबूजी की तबीयत ठीक थी लेकिन अचानक से सांस लेने में उन्हें दिक्कत हो रही है। जल्दी चलिए भईया” मोहन ने कहा।
“अच्छा रूक अभी आता हूं”
“सुनती हो, मैं अभी आता हूं। मोहन के बाबूजी की तबीयत बहुत खराब है। अभी हाॅस्पिटल जाना पड़ेगा।” मनोहर जी ने कहा।
“इस समय….रात के एक बज रहे हैं। सुबह ही तो उसे ले जाकर दवाई – सूई करवाया था आपने। अब क्या हुआ? आप ना कंपाउंडर बन गए हैं जो जब बुलाता है तब चले जाते हैं। सीनियर है लेकिन आपकी हरकतों से लगता ही नहीं इसलिए सब अपना काम फ्री में करवाकर चले जाते हैं। उल्टे आपसे पैसे भी ऐंठ ले जाते हैं।” ममता जी ने गुस्से से कहा।
“बस करो ममता, समाज में रहकर एक – दूसरे के काम न आए तो फिर जीने का क्या मतलब है! ये बताओ, भारी – भरकम बनकर रहने से क्या मिलेगा? मरने के बाद हमारी अच्छाईयां और व्यवहार ही रह जाएगा। जरूरतमंद की सेवा करना ही मेरा धर्म है। चलो मैं जल्दी ही लौटूंगा।” इतना कहकर मनोहर जी, मोहन के साथ चले गए।


सुबह चार बजे मनोहर जी लौटे तो ममता ने चाय बनाया और पूछा, “अब कैसे हैं मोहन के बाबूजी?”
“अब ठीक है, ऑक्सीजन पर रखा गया है लेकिन तुम्हें इतनी फिक्र क्यों हो रही है? रात में तो गुस्से से भर गई थी।”
“आप भी मेरी बातों पर चले गए। मोहल्ले के सारे लोग जब आपकी प्रसंशा करते हैं तो मुझे कितना गर्व होता है! ये मैं आपको नहीं बता सकती लेकिन कभी – कभी डर लगता है क्योंकि आप तो सबका ख्याल रखते हैं लेकिन अपना बिलकुल भी नहीं इसलिए मैं ऐसे कठोर शब्द बोल जाती हूं। मेरे लिए तो आपकी सेहत सबसे जरूरी है।”, ममता जी ने कहा।
“मैं सब समझता हूं ममता, तुम अगर अच्छी नहीं होती तो मैं इतनी तत्परता से सबकी मदद नहीं कर पाता। मैं बस तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता था।”

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