मानव सभ्यता के इतिहास में पहली बार गणतंत्रात्मक राज्य की कल्पना और स्थापना का श्रेय वैशाली को ही प्राप्त है। ऐतिहासिक गाथाओं में वर्णित तथा महान परंपराओं से परिपूर्ण, भारत के प्राचीनतम नगरों में से एक वैशाली छठी शताब्दी ई. पू. में शक्तिशाली लिच्छवी गणराज्य की राजधानी थी। एक तरफ इसे चौबीसवें जैन तीर्थंकर भगवान महावीर की जन्मस्थली होने का गौरव प्राप्त है, तो दूसरी और भगवान बुद्ध की कर्मस्थली होने का।

भगवान बुद्ध ने अनेक ‘वर्षावास यहां व्यतीत किए और अन्त में अपने निर्वाण की घोषणा भी वैशाली में ही की। भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित आठ अनोखी घटनाओं में से एक बंदर द्वारा बुद्ध को ‘मधु भेंट करना, यहीं घटित हुई। बुद्ध का पवित्र शारीरिक अवशेष आज भी यहां सुरक्षित है। साथ ही वैशाली को ही प्रसिद्ध सम्राट काला शोक के काल में द्वितीय बौद्ध संगति के आयोजनस्थल का भी गौरव प्राप्त है।

सत्ता में समता– अपने राज्य विस्तार के कारण ‘विशाला नाम से प्रसिद्ध इस नगरी के बारे में पालिग्रंथ बताते हैं ‘कि इस नगरी की चहारदीवारी को हटाकर विशाल करना पड़ा था, इसी से इसका नाम वैशाली पड़ा है। वैभवशाली, पराक्रमी व बुद्धिजीवी, लिच्छिवियों के वज्जीसंघ की इस राजधानी में एक विशाल संसद भवन था। जिसके 7777 (सात हजार सात सौ सतहत्तर) सदस्य थे। जिनमें 30 सभासदों का मंत्रिमंडल संघागार कहलाता था। इनका चुनाव आधुनिक निर्वाचन पद्धति के आधार पर होता था।

राजकीय व धार्मिक मामलों में वाद-विवाद, विचार विमर्श और मंत्रणा के बाद ही निर्णय लिए जाते थे। इन निर्णयों के विरुद्ध सशक्त न्यायपालिका में अपील करने का भी अधिकार था। सभी सभासदों को समान अधिकार और समान सुविधा थी। इसके लिए यहां 7777 प्रसाद 7777 कूटानगर, 7777 आरामगाह तथा 7777 पुष्करणियां थीं। धनजन से परिपूर्ण यह नगरी अपनी गणतांत्रिक पद्धति तथा शोभा की समता नहीं रखती थी। बुद्धकाल में इस नगर का वैभव अपने चरम पर था। कुल 42000 में 7000 के गुम्बज स्वर्ण के, 14000 के चांदी के और 21000 के कांसे के थे। यह नगर मुख्य रूप से तीन भागों में विभक्त था।

प्रथम पुरा वैशाली, दूसरा-कुंडा ग्राम और तीसरा पुरा वापियग्राम। वापियग्राम मुख्य रूप से व्यापारिक केंद्र था। गौतम बुद्ध की विश्रामगृह और कूटागार शाला चारों तरफ से घने शालवन से घिरा था। लिच्छवि की उपजातियों में एक ‘ज्ञातु उपजाति में वर्धमान महावीर का जन्म हुआ था। राजा चेतक की पुत्री त्रिशाला महावीर की मां थी। चेतक की दूसरी पुत्री का विवाह प्रतापी मगध शासक बिंबसार से हुआ, जिसका पुत्र अजातशत्रु, इतिहास प्रसिद्ध विजेता व राजा हुआ। रामायण तथा महाभारत में भी इस नगर का उल्लेख मिलता है कि इस नगर को बुद्ध और महावीर से भी प्राचीन माना जाता है।

रामायण में वर्णन है कि विश्वामित्र ने जनकपुर जाते समय इस नगर ‘कन्या दिव्या स्वर्गोपमा कहा था। गणतंत्र की परिकल्पना हमारे देश के लिए कोई नई नहीं है। हजारों वर्ष पूर्ण भारत के प्राचीनतम नगरों में प्रमुख वैशाली में गणतांत्रिक व्यवस्था मौजूद थी। वैभवशाली पराक्रमी व बुद्धिजीवी लिच्छवियों के वज्जी संघ की इस राजधानी में एक विशाल संसद भवन भी था। जहां राजकीय व धार्मिक मामलों पर विचार-विमर्श के बाद ही एकमत से निर्णय लिए जाते थे।

फाहियान व ह्वेनसांग का विवरण-पांचवीं शताब्दी के वैभव का वर्णन चीनी यात्री फाहियान ने भी किया है। सातवीं सदी के यात्री ह्वïनसांग के काल में यह नगर उजड़ चुका था। उसने वैशाली की परिधि 20 मील बताई है, जिसके भीतर कई महलों के भग्नावशेष भी उसने देखे थे। उसने बुद्ध के शिष्य आनंद के अस्थि अवशेष पर निर्मित स्तूप का भी वर्णन किया है।

चीनी उल्लेखों और सीमित उत्खननों से पुष्टि करने के बाद सर एलेक्जेंडर कनिंघम ने 1861-62 में इस स्थल को वैशाली के रूप में पहचाना। तत्पश्चात टी. ब्लाच (1903-04) तथा डी. बी. स्पूनर (191314) द्वारा यहां उत्खनन कार्य किया गया। हाल के वर्षों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण उत्खनन हुए हैं। उत्खनन के बाद इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण तथ्यों को उजागर करने वालों में श्रीकृष्ण देव, श्री विजयकांत मिश्र, अनंत सदाशिव अल्टेकर प्रमुख हैं। उत्खनन में प्राचीनकाल के अनेक मूर्ति शिल्प प्राप्त हुए हैं जो पटना संग्रहालय में रखे हुए हैं।

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