ईको टूरिज्म का कॉन्सेप्ट अब हमारे देश में भी धीरे-धीरे आकार ले रहा है। लोगों की रुचि भी इस ओर बढ़ रही है। इस लिहाज से उत्तर प्रदेश में ईको टूरिज्म के मद्देनजर कई स्थानों का विकास किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में कुल 16620 वर्ग किलोमीटर जंगली क्षेत्र हैं। यह कई खूबसूरत दृश्यों, कलकल बहती नदियां, हरियाली, पशु-पक्षियों का घर है। इनमें से कुछ के बारे में जानते हैं मोहन शिवालिक फॉरेस्ट डिविजन के अंतर्गत मोहन्द एक बेहद खूबसूरत स्थान है। यह क्षेत्र शिवालिक रेंज के क्षेत्र में स्थित है। देहरादून जाते समय मोहन्द रास्ते में पड़ता है। यहां वाइल्डलाइफ के अंतर्गत आपको तेंदुआ, लोमड़ी, हाथी, घुरल, हिरण, चीतल, सांभर, छिपकली, ग्रे फैंकोलिन, हॉर्नबिल, कॉमन, सिरकीर मलकोहा, आदि देखने को मिल जाएंगे।

कैसे जाएं यहां-

यहां पहुंचने के लिए आपको सहारनपुर जाना होगा, जो सड़क मार्ग के जरिए मोहन्द से केवल 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आप यहां देहरादून रेलवे स्टेशन से भी पहुंच सकते हैं। देहरादून यहां से केवल 22 किलोमीटर की दूरी पर है और सड़क मार्ग के जरिए बेहतरी से जुड़ा हुआ भी है। नजदीकी एयरपोर्ट जॉली ग्रांट है, जो देहरादून से 22 किलोमीटर दूर है। चूंकि यह समतल भूमि और पहाडिय़ों के बीच का हिस्सा है, तो यहां की वाइल्डलाइफ बेहद वृहद और खूबसूरत भी है। यहां बीचोंबीच नदी भी बहती दिख जाएगी। यहां स्थित दत काली मंदिर भी काफी प्रचचित है, जहां हजारों की संख्या में लोग रोजाना दर्शन के लिए आते हैं।

 

 

देवगढ़देवगढ़ गांव बेतवा नदी के दाहिनी किनारे पर बसा है, यह राजघाट डैम से जुड़ता भी है। यह गांव ललितपुर पहाड़ी श्रृंखला के पश्चिमी छोर पर भी है, जो ललितपुर शहर से 23 किलोमीटर और झांसी डिविजनल एडमिनिस्ट्रेटिव सेंटर से करीब 125 किलोमीटर दूर है। यह गांव 5 वर्ग किलोमीटर में बसा हुआ है। देवगढ़ का किला एक घाटी में बना है, यह घाटी बेतवा नदी से बनी है। बेतवा नदी किले के समीप ही बहती है, जिसका किनारा पथरीला है। किला नदी के दाहिने किनारे पर बना है। यहां रहकर आपको प्रकृति के समीप रहने का अनुभव होगा, साथ ही कलकल बहती बेतवा आपको अंदर तक शांति का अनुभव कराएगी। यहां के पहाड़ हरी-भरी वादियों और बेतवा नदी के साथ मिलकर खूबसूरत दृश्य का संयोजन पैदा करते हैं। वहां जाकर ऐसा महसूस होगा मानो आप किसी फिल्म को देख रहे हों।

नवाबगंज पक्षी विहार

 

 

यह जगह कई तरह के मेहमानों के लिए प्रसिद्ध है। पक्षी देखने वालों के लिए यह स्थान स्वर्ग से कुछ भी कम नहीं है। शहर की आपाधापी और प्रकृति को अंदर तक महसूसने के शौकीनों के लिए यह बेहतरीन वीकेण्ड डेस्टिनेशन है। यह उन्नाव जिले में पड़ता है, जहां गारगने टील, मलार्ड, पर्पल मूरहेन, लिटिल ग्रेब, स्पूनबिल डक, रेड वॉटेल्ड लॉपिंग, विगन जैसे कई देशी और विदेशी मेहमान आकर रहते हैं। पक्षियों की चहचहाहट हरियाली भरे क्षेत्र को और खूबसूरत बनाने के साथ वहां मौजूद इंसानों को बेहतरीन संगीत सुनने का भी मौका देती है। यहां हिरण के साथ बगुले भी दिख जाते हैं, जिन्हें देखने के साथ ही लगता है कि मानो ये मेडिटेशन कर रहे हैं। यहां किंगफिशर अपने शिकार के लिए पानी में डुबकी लगाता दिख जाता है। यदि आप अलग तरह के वीकेंड की खोज में लगे हैं तो अपनी दूरबीन निकालिए, साइकिल पर बैठ जाइए और झील के किनारे नए पक्षियों और वाइल्डलाइफ को देखने निकल जाइए। आप यहां झील के किनारे चलकर इसकी खूबसूरती को निहार सकती हैं इस कैंपस में आपके बच्चे के लिए एक पार्क है, साथ ही कैफे और मोटल भी।

कैसे जाएं यहां-

नवाबगंज पक्षी  विहार लखनऊ और कानपुर से करीब 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह विहार राष्ट्रीय राजमार्ग 25 पर है तो आप कभी भी अपने वीकेंड डेस्टिनेशन के तौर पर यहां पहुंच सकते हैं। यहां से अमौसी एयरपोर्ट 30 किलोमीटर और नजदीकी रेलवे स्टेशन कुसुंबी मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर है।

समसपुर पक्षी विहार

 

विभिन्न प्रवासी पक्षियों के संरक्षण के लिए समसपुर पक्षी विहार को विशेष तौर से विकसित किया गया है। यह रायबरेली जिले के नजदीक सालोन शहर के समसपुर क्षेत्र में स्थित है। यह विहार बहुत बड़ा नहीं है, इसका कुल क्षेत्र मात्र 780 हेक्टेयर का है। इसे 1987 में स्थापित किया गया है। यह जिले के रोहनिया ब्लॉक में स्थित है और लखनऊ से करीब 125 किलोमीटर दूर है।
यहां 250 से अधिक प्रजाति के पक्षी स्वयं ही रहते हैं अन्य गरम क्षेत्रों के मुकाबले पक्षियों को यहां थोड़ा आराम मिलता है। गरमी में भी इस विहार में कुछ प्रवासी पक्षी दिख जाते हैं। चील, किंगफिशर, स्पॉट बिल टील, कॉमन, टील व्हिसलिंग आदि ने इस विहार को अपना स्थानीय पता बना लिया है। घरेलू चिडिय़ा सुर्खब भी यहां काफी दिख जाएंगे। पक्षियों के अलावा 11 मछली की प्रजातियां भी समसपुर के नजदीक झील में दिख जाती हैं। 5000 किलोमीटर दूरी से भी प्रवासी पक्षी यहां आनंद उठाने आते हैं। यहां आपको आम, शीशम और महुआ के पेड़ दिख जाएंगे, सरपत नाम की लंबी घास भी यहां खूब उगती है।

कैसे जाएं यहां-

यहां पहुंचने के लिए ऊंचाहार नजदीकी रेलवे स्टेशन करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर है। राष्ट्रीय राजमार्ग 22 के यहां से जुडऩे के अलावा, लखनऊ-वाराणसी सड़क भी यहां पहुंचती है। स्थानीय परिवहन यहां आपको आसानी से पहुंचा देगी।

बिठूर

 

गंगा के तट पर बसा बिठूर महत्वपूर्ण धार्मिक और ऐतिहासिक शहर है, जो कानपुर से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। किस्से- कहानियों में बिठूर का नाम बहुत आता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टिकर्ता ब्राह्मा ने पूरी दुनिया के विनाश के बाद बिठूर को अपने निवास के तौर पर चुना था। यहां का वाल्मीकी आश्रम देखने लायक है, जो सीता कुण्ड के लिए प्रसिद्ध है। सीता रसोई को यहां संरक्षित रखा गया है, इसके पास ही स्वर्ग नासिनी है। इस टावर में 48 सीढिय़ां है, इसके सबसे ऊपर से आप आसपास के विहंगम दृश्य का आनंद ले सकते हैं। यहां ठहरने के लिए स्थानीय होटल हैं, जहां आप लजीज जायकों का भी लुत्फ उठा सकते हैं।

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