बढ़ते बच्चों को बड़ों की तरह ट्रीट करें या छोटा मानें, समझ नहीं आता। खुद उन्हें भी कई मामलों में लगता है, वे बड़े हैं और खुद ही कई बार वे बच्चों जैसा बर्ताव भी करने लगते हैं किशोरावस्था इसी का नाम है इस उम्र में शारीरिक, मानसिक  और भावनात्मक  परिवर्तन होते हैं हारमोन्स के बदलाव के कारण किशोर किशोरी कई बार अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैंमनोचिकित्सक सुशील  कुमार बताते हैं कि अक्सर  लड़के टीनेज  में अपनी मां के प्रति आकर्षित रहते हैं और लडकियां पिता के प्रति। शारीरिक  बदलावों की जिज्ञासा भी इस उम्र में बहुत होती है। किशोर नई-नई  जानकारियां  खोजते हैं और गलत सूचनाओं से कई बार भ्रमित भी हो जाते हैं। जी हां, यह  हमारे ही बच्चे हैं और इनके साथ हमें कुछ व्यावहारिक सावधानियां रखने की जरूरत है।

आक्रामक  हो गये हों

हारमोन्स में हो रहे परिवर्तन से किशोर अत्यधिक  भावुक  हो जाते हैं। छोटी  छोटी बातों से उन्हें बहुत गुस्सा आने लगता है। बचपन  की रिवार्ड  और  पनिश्मेन्ट थ्योरी इन पर अब काम नहीं करती। इन्हें समझाना पड़ता है। अभिभावक भी यदि  गुस्से का सहारा लें तो किशोर और अधिक उद्दण्ड हो  जाते हैं और फिर बच्चों और मां-बाप के बीच संबंध खराब हो जाते हैं। प्यार से समझाना ही इसका एकमात्र हल है।

गुमसुम रहने लगे हों
अगर  किशोर बहुत अधिक  सोच में डूबे और गुमसुम रहते हों तो हो सकता है कि वे अवसाद का शिकार हो रहे हों या उत्पीडऩ  के शिकार बन रहे हों। अस्वाभाविक  क्रियाकलाप, चाहे कोई भी हो किसी न किसी रुग्ण मनोदशा के सूचक हैं।  बच्चे से बात करके वजह पता करें, नहीं तो मनोचिकित्सक का सहारा लें।

सजने में काफी वक्त लगाते हों
सभी किशोर- किशोरियां अपने लुक्स के प्रति संवेदनशील होते हैं पर यदि आपका किशोर कुछ ज्यादा ही समय लगा रहा हो तो इसकी वजह उसकी कोई मित्र हो सकती है। विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण स्वाभाविक  है, पर अति करने से बचना चाहिए।

सुस्त रहते हों
किशोर व किशोरियां जवानी की दहलीज  पर खड़े होते हैं तो सुस्ती का तो प्रश्न ही नहीं। यदि वे सुस्त हैं तो जांचें कि कहीं किसी प्रकार के नशे का शिकार तो नहीं बन गये हैं। परिवार परामर्शदात्री श्रीमती कंचन बताती हैं कि समय-समय पर उनका सामान चेक करते रहना चाहिए। कोई भी अवांछित चीज मिलने पर पूछताछ अवश्य करें ।

बात-बात पर बहस
किशोर यदि हर बात पर आपसे बहस या तर्क करता हो तो आप अपना तरीका सुधारें। उसे ज्यादा रोकना-टोकना बंद करें। उसके पक्ष को भी समझने का आप प्रयत्न करें।

घंटों कमरा बंद करके बैठे हों

अकेला बैठना अच्छा है, पर यदि किशोर/किशोरी घंटों  अपने कमरे  में अकेले  बैठते हों या कमरा बंद र खते हों, तो चैक करें कि वो पोर्न वेबसाइट्स तो नहीं देख रहे। एकान्त हर तरह की समस्या को बढ़ावा देता है। प्राइवेसी के  नाम पर उन्हें बहुत देर अकेला मत बैठने दीजिए। बीच-बीच में कमरे में आते-जाते रहिए।  

दोस्तों के साथ ही समय  बिताएं
सहेलियां दोस्त अच्छे होते है पर सारा समय उन्हीं के साथ बिताने से अपव्यय, व्यसनों का डर व पढ़ाई से दूरी हो जाती हैकोशिश करें कि आप भी उनके मित्रों-सहेलियो के साथ वक्त बिताएं  ताकि वो भी आपसे बात शेयर करें।

आप यह उपाय भी कर सकते हैं –

  1. किशोरवय बच्चों को अपना मित्र मानें। उनसे मित्रतापूर्ण व्यवहार करें। अपने आदेश उन पर थोपें नहीं। उनकी भी सुनें।  उनके प्वाइन्ट ऑफ व्यू को जानने की कोशिश करें।

  2. उनके मित्रों का ध्यान रखें। गलत आदतों वाले साथियों से दोस्ती तुड़वा दें।

  3. घर से कोचिंग आने-जाने के समय का ध्यान रखें। अधिक छूट न दें।

  4. भोले मन छूट की मर्यादा को लांघ बैठते हैं और  फिर जन्म लेते हैं अपराध या एक्सीडेन्ट।

  5. उनके टच में रहें। अभिभावकों को किशोर-किशोरियों के आने जाने का समय व जगह पता होनी चाहिए। 

  6. उन्हें भरपूर प्यार दें पर अनुचित मांगें ना मानें। थोड़ा स्ट्रिक्ट रहकर भी आप अच्छे मां-बाप बन सकते हैं। आखिर वो आप ही के बच्चे हैं और कुछ समय बाद समझ  जाएंगे कि ये आप उनके भले के लिए ही कह रहे थे।

  7. अभिभावक  यदि खुद स्मोक या ड्रिंक करते हों तो किशोरों को उसमें इनवाल्व ना करें। सोडा मंगाना, लाइटर ले आना जैसी गतिविधियों के सम्पर्क  में आने पर उन्हें भी गलत आदतों का आकर्षण हो सकता है ।

  8. बच्चे को समझाते हुए अपनी कथनी और करनी में फर्क ना करें। अन्यथा आप अच्छे उदाहरण नहीं बन पाएंगे।

  9. मनोचिकित्सा के रिटायर्ड विभागाध्यक्ष  डॉक्टर चन्द्रशेखर का मानना है कि यदि किशोर-किशोरियों की सोच को सकारात्मक  बनाया जाए तो तनाव व अवसाद उनसे दूर रहेंगे। आत्महत्या, हत्या, नशाखोरी जैसे दुव्र्यसनों से वे बचे रहेंगे।

  10.  सवाल सिर्फ थोड़े सजग रहने का है, फिर देखिए कैसे आपके किशोर बन जाते हैं आपके सबसे अच्छे मित्र।