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Social Equality
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Social Equality: “बराबरी तो दूर की बात है सर, फिलहाल हिस्सेदारी मिल जाए ना वही बात है”…
रानी मुखर्जी की फिल्म मर्दानी 2 का ये सबसे प्रसिद्ध डायलॉग है। इस एक डायलॉग में हमारे समाज की समस्या का सार छिपा है।
बराबरी… यह एक शब्द नहीं, पूरी समस्या का जड़ भी है और समाधान भी। लड़का-लड़की बराबर नहीं होते हैं, यह सबक बचपने से ही बच्चों को ना चाहते हुए भी मां-बाप सिखा देते हैं। जैसे कि रोटी बनाने के लिए हमेशा लड़कियों को ही बोला जाता है।
कुछ बाजार से सामान लाना हो तो… साहिल जा तो दौड़कर, मार्केट से धनिया ले आ।
घर पर मेहमान आ गए तो…. संस्कृति देख तेरे अंकल-आंटी आएं हैं, जरा चाय चढ़ा दे।
ऐसे ही छोटे-मोटे काम अलग-अलग करके लड़के-लड़कियों के लिए रखे जाते हैं। फ्रीज साफ करना है तो संस्कृति को आवाज दी जाती है और अगर बाइक साफ करनी है तो साहिल को। घर पर पोंछा लगाना है तो संस्कृति का याद किया जाता है और बिजली और पानी का बिल भरना हो तो साहिल।
कितनी आसानी से हमलोग काम के जरिये बच्चों को लड़का-लड़की में डिफरेंस करना सीखा देते हैं और फिर अपने पति से झगड़ा करते हैं कि तुम मुझे अपने बराबर समझते नहीं।
जब आप खुद को और अपनी बेटी को स्वंय लड़कों के बराबर नहीं समझती तो फिर आपके बच्चे कैसे बराबरी का पाठ पढ़ेंगे। तो आज से ही काम में अंतर को खत्म करें और आने वाली पीढ़ी को सोच, काम, बातों…हर चीज में बराबर बनाएं।

खुद भी भरें बिल्स

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Try to pay your own bills

नब्बे फीसदी घरों में बिजली बिल, पानी बिल, पॉलीसी की महीने की किस्त, गैस बिल आदि से संबंधित काम पिता ही करते हैं। ऑफिस से समय ना मिलने के बावजूद भी मम्मियां बार-बार पापा को बिल भरने की अंतिम तारीख याद दिलाती रहती हैं। इससे बच्चों में खुद ये संदेश चले जाता है कि बिल से संबंधित जितने भी काम हैं वे पापा द्वारा ही किए जाते हैं, जो बाद में बेटे को करना होगा।

इसी तरह घर पर कोई मेहमान आते हैं, तो पिताजी उनका स्वागत करते हुए मम्मी को ही चाय बनाने के लिए बोलते हैं। ऐसे में यह काम खुद घर में मौजूद बच्चे इस काम को लड़कियों का काम समझने लगते हैं और बड़े होने पर भाई अपनी बहन को या शादी के बाद पत्नी को मेहमानों के लिए चाय बनाने को बोलता है।

काम के अंतर को ऐसे करें कम

आगे से बिल जैसे ही आए तो उसे आप खुद भरने जाएं न कि पति और बेटे को परेशान करें। इससे आपको बिजली विभाग के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलेंगी, जिससे अक्सर कई महिलाएं अनजान रहती हैं।
इसी तरह मेहमान आए तो घर के पुरुषों को बैठने के लिए कहकर रसोई में खुद चाय चढ़ाकर आनी चाहिए। वैसे भी चाय बनने में मुश्किल से 5 मिनट लगते हैं। अगर ऐसे आप दोनों एक-दूसरे का बराबर साथ देंगे तो आपके बच्चे भी एक-दूसरे का हर काम में साथ देने लगेंगे।

काम का बराबर बंटवारा करें

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Divide the work equally

पोंछा लगाने और बर्तन मांजने के लिए एक दिन साहिल को बोलें तो एक दिन संस्कृति को। क्योंकि कॉलेज जाने के दौरान होस्टल में तो दोनों को ही अकेले रहना है, तो यह दोनों के काम आएगा। इसी तरह मार्केट से धनिया लाने के लिए संस्कृति को भी हर दूसरे दिन भेजें।
लड़कियों का रेग्युलर बाहर निकलना बिल्कुल बंद हो जाता है और धीरे-धीरे फ्रेंड सर्कल टूटने लगता है। इस कारण ही तो बड़े होने पर अधिकतर लड़कियों को डिप्रेशन जैसी बीमारियां घेरती हैं क्योंकि घर पर मनमुटाव होने पर भी वे कहीं बाहर नहीं जा सकती और माइंड फ्रेश नहीं कर सकतीं। जबकि लड़के बाहर निकलते हैं, काम करते हैं, दोस्तों से मिलते हैं, हंसी-मजाक करते हैं और माइंड रिफ्रेस कर घर आ जाते हैं। घर पर झगड़ा भी होता है तो अक्सर घर के लड़के बाहर चले जाते हैं और बहुत देर के बाद घर आते हैं। जबकि घर की महिलाएं, चाहे वह मां हो, बहन हो या पत्नी, घर के पुरुषों का गुस्सा होने के बावजूद इंतजार करती हैं और जब वे आ जाते हैं तो उनको प्यार से मनाकर खाना भी खिलाती हैं। ये अच्छी आदत है… लेकिन ये आदत दोनों की होनी चाहिए।

अपने बेटे को रोने की आजादी दें और जेंटलमेन बनाएं

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Give your son freedom to cry

ओए साहिल, लड़कियों की तरह रोना बंद कर और जा साइकिल बनवा कर ला।
यह एक लाइन तो हर किसी ने सुनी होगी। इस कारण ही तो बड़े होने पर भी जब पुरुषों को किसी चीज से डर लगता है तो भी वे कुछ नहीं बोलते और एक डायलॉग चिपका देते हैं… मर्द को दर्द नहीं होता।
सीरियसली…लोहे के बने हो क्या जो दर्द नहीं होता? चोट पड़ने पर तो लोहा भी पिचक जाता है फिर मालूम नहीं पुरुष कैसे एक पीस में सही-सलामत खड़े होते हैं?
लेकिन आप यह लाइन अपने बेटे को ना कहें। अपने साहिल या सिम्बा को रोने दें और उन्हें मर्द नहीं जेंटलमेन बनाएं। उन्हें चोट लगने पर रोने दें और खुश होने पर खुल कर हंसने दें। सूरज भी तो खुलकर चमकता है और बादल घिरने पर दुखी होता है। तो फिर आप अपने घर के सूरज को क्यों रोने और खुश होने से रोक रहे हैं। ये दो भावनाएं ही तो इंसान को इंसान बनाती हैं। तो उनके आंसू निकलने दें। ये उन्हें और अधिक मजबूत बनाएगी।
इन तीन छोटे -छोटे उपायों को आज ही अपने रोजाना की आदतों में शामिल करें और आने वाली पीढ़ी को बराबर बनाएं।

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