googlenews
krishna and rukmini - पढ़रपुर के इस मंदिर में भगवान कृष्ण के साथ होती है रुक्मिणी की पूजा
shri krishna and rukmini
पंढरपुर के इस मंदिर में रुक्मणि जी के साथ विराजते हैं श्री कृष्ण 3

भगवान कृष्ण का जिक्र आते ही राधा जी का नाम जुबान पर खुद-ब-खुद आ जाता है। यूं तो दुनियाभर में राधाकृष्ण के कई मंदिर है। जहां कृष्ण जी के साथ राधा जी की पूजा अर्चना की जाती है। मगर महाराष्ट्र में पुणे से लगभग 200 कि.मी. की दूरी पर स्थित एक गांव में बने मंदिर में  श्रीकृष्ण को उनकी पत्नी रुक्मिणी के साथ पूजा जाता है। यहां दर्शनों के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं और मन्नते मांगते हैं।

पंढरपुर नाम के इस गांव में बने विट्ठल रुक्मिणी मंदिर में भगवान कृष्ण और देवी रुक्मिणी की सुंदर मूर्तियां नजर आती हैं। इस स्थान से लोगों की अपार श्रद्धा जुड़ी हुई है। ये मंदिर चंद्रभागा नदी के तट पर है और इसके पूर्व दिशा में भीमा नदी का तट। चंद्रभामा के नाम से मशहूर भीमा नदी के तट पर सालाना विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जहां लोगों की खासी तादाद नज़र आती है अैर इस प्रकार के मेलों में भजन-कीर्तन करके भगवान विट्ठल को प्रसन्न किया जाता है।

दिंडी यात्रा से जुड़ी है लोगों की अटूट आस्था

इस मंदिर से लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। इसी के चलते लोग मंदिर तक पैदल चल कर आते है, जिसे दंडी यात्रा कहकर भी पुकारा जाता है। इस यात्रा को लेकर एक खास मान्यता है। ऐसा कहा जाता है कि अगर आषाढ़ी एकादशी या कार्तिकी एकादशी को मंदिर में खत्म कर रहे है, तो सभी मन्नतें पूरी होती हैं और यात्रा भी सार्थक होती हैं। ऐसे में लोग उस हिसाब से ही यात्रा शुरू करते हैं ताकि उस खास दिन तक यात्रापूर्ण हो सके। भगवान विट्ठल के रूप में यहां विराजे श्रीकृष्ण की पूजा अराधना के लिए लोगों की खासी भीड़ यहां जुटती है।

यहां पहुंचने के लिए भक्तजन  पताका-डिंडी लेकर यहां तक पद यात्रा करते हैं। इस यात्रा क्रम के तहत श्रृद्धालु अलंडि में जमा होते हैं और फिर पुणे तथा जजूरी से होकर गुजरते हुए पंढरपुर तक पहुंचते हैं। इनको ज्ञानदेव माउली की डिंडी या फिर दिंडी के नाम से भी जाना जाता है।  महाराष्ट्र के कई संतों ने मराठी भाषा में भगवान विट्ठल के गुणगान में रचनाएं लिखी हैं। श्रद्धालु पदयात्रा के दौरान उनकी रचनाओं का संगीतमय तरीके से गायन भी करते हैं। भक्तों की प्रबल मान्यता है कि विट्ठल के दरबार में कोई सच्चे मन से आए तो कभी खाली हाथ नहीं जाता।

मंदिर का इतिहास

इस तीर्थ स्थल की स्थाप्ना 11वीं शताब्दी में हुई थी। जबकि इसका निर्माण कार्य 12वीं शताब्दी में आरंभ हुआ था। इसको देवगिरि के यादव शासकों ने निर्मित करवाया था। ये स्थल भक्ति संप्रदाय को समर्पित मराठी कवि संतों की पवित्र भूमि है। लगभग 1000 साल पुरानी पालखी परंपरा की शुरुआत महाराष्ट्र के कुछ प्रसिद्ध संतों ने मिलकर की थी। उनके अनुयायियों को वारकारी कहा जाता है जिन्होंने इस प्रथा को जीवित रखा। इस मंदिर को भक्तराज पुंडलीक के स्मारक के रूप में स्थापित किया गया था।

जहां भगवान श्रीकृष्ण यहां के अधिष्ठाता विठोबा के रूप में विराजमान है। इस स्थल को लेकर यूं तो कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। मगर जो कथा मुख्य है उसके तहत अपने एक परम भक्त पुंडलीक की पितृभक्ति से प्रसन्न होकर उसके हाथों उछाला गया पत्थर या ईंट जहां भी जाकर गिरा, वहीं उन्होंने अपना स्थल बना लिया। ऐसी मान्यता है कि एक बार विजयनगर नरेश कृष्णदेव विठोबा की मूर्ति को अपने राज्य में ले गए। मगर फिर वह एक महाराष्ट्रीय भक्त के जरिए पंढरपुर वापस लेकर आई गई।

भगवान विट्ठल की प्रतिमा

यूं तो भारतवर्ष में कई जगहों पर भगवान विट्ठल के मंदिर बनाए गए हैं, मगर महाराष्ट्र के पंढरपुर में बना भगवान विटठ्ल का मंदिर सुप्रसिद्ध है। जहां पर प्रभु की प्रतिमा काले रंग की है और उनके दोनों हाथ कमर पर टिके हुए हैं। यहां की खासियत ये है कि यहां भगवान विट्ठल के रूप में श्रीकृष्ण राधारानी की बजाय रुक्मिणी जी के साथ विराजे हुए हैं। यहां उनके दर्शनों के लिए भक्तों की भीड़ जमा रहती है। खासतौर से त्योहारों और मुख्य पर्वों पर भगवान की अराधना पूरे धूम-धाम के साथ की जाती है। साल भर भक्तों की भीड़ यहां जमा रहती है। मगर आषाढ़, कार्तिक, माघ और श्रावण में यहां काफी संख्या में श्रद्धालुओं का आगमन होता है।

पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान विट्ठल के लिए की जाने वाली पैदल यात्राओं का इतिहास सैकड़ों साल पुराना मिलता है। दरअसल, ऐसी मान्यता है कि आज से लगभग 800 वर्ष से भी ज्यादा समय से लोग यहां पदयात्राएं कर रहे हैं और उनका प्रभु विटठ्ल के लिए जो विश्वास है, वो ज्यों का त्यों बना हुआ है। यात्राओं के समय में पंढरपुर की रौनक में चार चांद लग जाते है।

विट्ठल को किन नामों से संबोधित किया जाता है?

कोई भगवान विट्ठल को विट्ठाला कहकर पुकारता है, तो कोई पांडुरंगा कहता है। इसके अलावा नारायण, पंधारीनाथ और हरि जैसे नाम भी भगवान विट्ठल के ही हैं। मंदिर में विट्ठल के साथ विराजमान रुक्मिणी को साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है।

मंदिर तक पहुंचने का मार्ग

अगर आप हवाई मार्ग के जरिए यहां तक पहुंचना चाहते हैं, तो पुणे एयरपोर्ट सबसे नजदीक है और पंढरपुर से पुणे एयरपोर्ट की दूरी लगभग 200 कि.मी. है। इसके तहत आप हवाई मार्ग से दूरी तय करने के बाद सड़क मार्ग से पंढरपुर के विट्ठल रुक्मिणी मंदिर पहुंच सकते हैं।

अगर आप रेल मार्ग से यहां पहुंचना चाहते हैं, तो कुर्डुवादी का रेलवे स्टेशन सबसे नजदीक हैं। जो पंढरपुर से लगभग 52 किण्मी की दूरी पर स्थित है। कुर्डुवादी से पंढरपुर तक पहुंचने के लिए आपको आसानी से बस मिल सकती है। 

अगर आप पूरा रास्ता सड़क मार्ग से ही तय करना चाहते हैं, तो पुणे से पंढरपुर 200 किमी की दूरी पर है। वहीं अगर आप मुंबई से यहां पहुंच रहे हैं, तो कुल रास्ता 370 किमी दूर है। विट्ठल रुक्मिणी मंदिर तक आप चाहें तो अपने निजी वाहन या अन्य किसी साधन से भी पहुंच सकते हैं।

Leave a comment