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दीया जलाएं अनिष्ट मिटाएं : Lighting lamp
lightning of lamp

Lighting lamp: हिन्दू धर्म में किसी भी शुभ कार्य में दीपक की उपस्थिति अनिवार्य मानी गई है। आइये जानते हैं कि दीपक कितने प्रकार के होते हैं, उसके क्या लाभ हैं तथा क्या है दीपक द्वारा आरती करने की सही विधि?

दीया अर्थात् जिसने सदा दिया। दीये का संबंध मात्र मिट्टी के आवरण या किसी पात्र से नहीं है। दीया आशा का प्रतीक है, दीया नूतन चेतना एवं नवीन कार्य करने की प्रेरणा देता है। दीये की लौ हमें केवल रोशनी ही नहीं देती, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर, नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रेरणा भी देती है। ‘लौÓ हमें अनुशासन सिखाती है, देने, बांटने और बुराई से लड़ने की सीख देती है। दीया स्वयं अंधेरे में रहकर दूसरों के घर-आंगन में प्रकाश करने का संदेश भी देता है।
दीपावली दीपकों का त्योहार है। इस दिन दीपकों को विधिपूर्वक प्रज्जवलित करना या जलाना अति शुभ माना गया है। लक्ष्मी पूजन एवं आरती के बाद एक-एक छोटे दीपक मंदिर में घर के सामने चौराहे पर, नदी के किनारे या नल के पास, घर के प्रत्येक कमरे मे, आंगन में, पीपल के पेड़ व तुलसी के पौधे के समीप और छत आदि जगहों पर अवश्य प्रज्जवलित करने चाहिए। इन दीपकों से घर में लक्ष्मी आती है। इसके अलावा विभिन्न प्रकार के पात्रों से बने दीपकों को जलाने से मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं।
सोने का दीपक- सोने के बने दीपक को गेहूं के आसन पर रखकर इसे चारों ओर से लाल कमल या गुलाब के फूल की पंखुड़ियों से सजाएं। इसमें गाय का शुद्ध घी डालकर पूर्व दिशा की ओर जलायें। इससे धन तथा बुद्धि में निरंतर वृद्धि होती रहेगी।
चांदी का दीपक- चांदी के बने दीपक को चावलों के आसन पर रखकर इसे चारों ओर से सफेद गुलाब या अन्य सफेद फूलों की पंखुड़ियों से सजाएं। इसमें गाय का शुद्ध घी डालकर पूर्व दिशा की ओर जलायें। इससे सात्त्विक धन की वृद्धि होगी।
तांबे का दीपक- तांबे के बने दीपक को लाल मसूर के आसन पर रखें, फिर इसे चारों ओर से लाल फूलों की पंखुड़ियों से सजाएं और तिल का तेल डालकर इसे दक्षिण दिशा में जलाने से मनोबल में वृद्धि तथा अनिष्टों का नाश होगा।
कांसे का दीपक- कांसे के बने दीपक को चने की दाल के आसन पर रखें व इसे चारों ओर से पीले फूलों की पंखुड़ियों से सजाकर इसमें तिल का तेल डालें और उत्तर दिशा में जलायें। इससे धन की स्थिरता बनी रहेगी।
लोहे का दीपक- लोहे के बने दीपक को उड़द दाल के आसन पर रखें तथा इसे चारों ओर से गहरे नीले या काले रंग के फूलों की पखुंड़ियों से सजाकर जलाएं। इससे अनिष्ट तथा दुर्घटनाओं से बचाव होगा।
मिट्टी के दीपक- मिट्टी के बने दीपक को शुद्ध देसी घी से प्रज्जवलित कर तुलसी के पौधे पर संध्या के समय जलाने से बुरी शक्तियों का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता और पापों का नाश होता है।
आटे का दीपक- आटे से बने चौमुखे दीपक को शुद्ध घी के साथ चौराहे पर जलाने से चहुंमुखी लाभों की प्राप्ति होती है।
ध्यान रखें पूजन के समय जलाया गया बड़ा दीपक सारी रात जलना चाहिए तथा सुबह तारों की छांव या ब्रह्मï मुहूर्त में उठाकर साथ में घर का थोड़ा कूड़ा लेकर घर से थोड़ी दूर यह कहते हुए रखें कि ‘भाग द्ररिद, लक्ष्मी आवे।
मान्यता है कि इस प्रकार विधिपूर्वक लक्ष्मी पूजन करने से समस्त द्ररिद्रताएं समाप्त हो जाती हैं और घर वैभव व खुशियों से भर जाता है।

वास्तु लाभ

वास्तु के अनुसार दीपक से कई प्रकार के वास्तु दोष स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। दीपक से निकलने वाला प्रकाश नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव खत्म कर देता है और सकारात्मक ऊर्जा सक्रिय करता है। दीपक से निकलने वाला धुआं वातावरण में मौजूद कई ऐसे सूक्ष्म कीटाणुओं को नष्ट कर देता है जो हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
पूजन-अर्चन में दीपक जमीन पर नहीं रखना चाहिए बल्कि दीप को अक्षत या चावल पर रखना चाहिए। प्रतिदिन सूर्यास्त तक दीपक प्रज्जवलित कर लेने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। दीप जलाते समय इस मंत्र जाप से घर में धन-धान्य की कमी नहीं रहती और सभी सदस्यों की आय में बढ़ोतरी होती है। मंत्र इस प्रकार है-
शुभं करोतु कल्याणंमारोग्यं सुखसंपदम्।
शप्रुबुद्धिविनाशाय च दीपज्योतिर्नमोस्तु ते।।

आजकल घी के दीपक का प्रयोग कम होता जा रहा है। मिट्टी का बना दीपक जलाने से न सिर्फ सुंदरता आती है बल्कि वहां उपस्थित नकारात्मक शक्तियों का भी नाश होता है। मिट्टी से बने ‘घीÓ के दीपक से मन में सात्त्विक विचारों का जन्म होता है।

इन बातों का रखें ध्यान

  • देवताओं के घी का दीपक अपनी बायीं ओर तथा तेल का दीपक दायीं ओर लगाना चाहिए।
  • देवी-देवताओं के लिए जलाया गया दीपक पूजन कार्य के बीच बुझना नहीं चाहिए।
  • दीपक हमेशा भगवान के सामने ही लगाएं।
  • घी के दीपक के लिए सफेद रुई की बत्ती लगाएं।
  • तेल के दीपक के लिए लाल बत्ती का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • दीपक कहीं से खंडित या टूटा नहीं होना चाहिए।

दीपक की लौ का प्रभाव

दीया जलाएं अनिष्ट मिटाएं : Lighting lamp
lamp flame effect

पूजा के समय अगर दीपक की लौ दाहिनी तरफ झुकती है तो यह शुभ फल मिलने का संकेत है। दीपक की लौ का रंग अगर ज्यादा नीलापन लिए हो तो पूजा का शुभ फल कम हो जाता है। पूजा में दीपक की लौ अस्थिर हो तो भी अच्छा नहीं माना जाता है। ये संकेत अनावश्यक व्यय होने का है। दीपक की बड़ी लौ का इशारा आपके हर काम पूरे
होने की तरफ होता है। दीपक की लौ अगर स्थिर, बड़ी और एक समान होती है तो समझना चाहिए आप पर बहुत जल्दी लक्ष्मी प्रसन्न होने वाली हैं। अगर आरती करते समय दीपक बुझ जाता है तो अपशकुन माना जाता है।

लाभ प्राप्ति के लिए करें ये उपाय

  • व्यापार में वृद्धि तथा मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए शाम के समय घी का दीपक जलाना चाहिए।
  • शत्रुओं से अपनी रक्षा के लिए तथा सूर्य संबंधी उत्पन्न कष्टों से मुक्ति के लिए सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
  • शनि देव को प्रसन्न करने तथा स्वस्थ रहने के लिए तिल के तेल का दीपक जलाएं।
  • सौभाग्य प्राप्ति के लिए देवों को महुयै के तेल का दीपक अर्पित करना चाहिए।
  • राहु तथा केतु की शांति के लिए अलसी के तेल का दीपक जलाकर भगवान शंकर को अर्पित करें।
  • सामान्य पूजा के पूजा स्थल पर एक बत्ती का दीपक जलाएं।
  • भगवान शंकर को आठ बत्तियों वाला दीपक अर्पित करना चाहिए।
  • गणेश जी के लिए तीन या बारह बत्तियों का दीपक जलाना चाहिए।
  • विष्णु जी की आराधना के लिए दस या सोलह बत्तियों का दीपक लगाना चाहिए।
  • धन की देवी लक्ष्मी को सात बत्तियों के दीपक से प्रसन्न करें।
  • वास्तु संबंधी दोष तथा रोग मुक्ति के लिए तिकोने दीपक जलाएं।
  • स्वयं पर आई आपदा को टालने के लिए उथला दीप जलाएं।

दीपक जलाने से अन्य लाभ

  • प्रत्येक अमावस्या को रात्रि में पीपल के नीचे शुद्ध घी का दीपक जलाने से पित्तर प्रसन्न होते हैं।
  • पीपल के नीचे कड़वे तेल का दीपक लगातार 41 दिन तक प्रज्जवलित करने से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।
  • तिल के तेल का दीपक 41 दिन लगातार पीपल के नीचे प्रज्जवलित करने से असाध्य रोगों में अभूतपूर्व लाभ मिलता है और रोगी स्वस्थ हो जाता है।
  • केले के पेड़ के नीचे बृहस्पतिवार को घी का दीपक प्रज्जवलित करने से कन्या का विवाह शीघ्र हो जाता है ऐसी भी मान्यता है।
  • मान्यता है कि अपराध व दीर्घ बिमारियों से पीड़ित व्यक्ति के पहने हुए कपड़ों में से कुछ धागे निकालकर उसकी जोत शुद्ध घी में अपने इष्ट के समक्ष प्रज्जवलित की जाए, तो रोग दूर हो जाता है।
  • दीपावली के दिन अपने घर के मुख्य द्वार पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं। घर में सुख-शांति स्थापित होती है।

दीपक द्वारा आरती की सही विधि

दीया जलाएं अनिष्ट मिटाएं : Lighting lamp
Correct method of Aarti by Deepak

हिन्दू संस्कृति में पूजा-पाठ, अनुष्ठान, हवन, यज्ञ आदि कर्मों में दीपक द्वारा आरती करने का विधान है। पूजा की थाली में कपूर डालकर भी आरती की जाती है। आरती के लिए दीपक अथवा थाली को किस प्रकार पकड़ना चाहिए व किस प्रकार संबंधित देवी-देवता के समक्ष घुमाया जाना चाहिए इसकी भी विधि है। यह कर्म विधि अनुसार न किया जाए तो संपूर्ण पूजा का फल निष्फल हो जाता है, अत: आरती करते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए-

  • दीपक की आरती करते समय दीपक को अपने इष्ट देवी-देवता के सम्मुख इस प्रकार घुमाया जाना चाहिए कि घुमाते हुए ‘ऊंÓ जैसी आकृति का निर्माण हो जाए, तभी आरती सफल मानी जाती है। आरती अपनी बाइंर् ओर से दाइंर् ओर चलाएं।
  • आरती की थाली अथवा दीपक आरती के पश्चात् दूसरे के आरती हेतु देने के लिए अपने दाइंर् ओर से दें।
  • भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं के समक्ष दीपक को घुमाने की संख्या भी भिन्न है, जो इस प्रकार है-
  • भगवान शिव के समक्ष: तीन अथवा पांच बार घुमाएं।
  • भगवान गणेश के समक्ष: चार बार घुमाएं।
  • भगवान विष्णु के समक्ष: बारह बार घुमाएं।
  • भगवान रुद्र के समक्ष: चौदह बार घुमाएं।
  • भगवान सूर्य के समक्ष: सात बार घुमाएं।
  • भगवती दुर्गाजी के समक्ष: नौ बार घुमाएं।
  • अन्य देवताओं के समक्ष: सात बार घुमाएं।


दीपमालिका (दीपक) पूजन की विधि

भारतीय उत्सव श्रंृखलाओं में दीपावली का त्योहार अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस दिन महालक्ष्मी का पूजन दीपमालाओं से किया जाता है। दीपमाला से तात्पर्य है कि किसी पात्र अथवा स्थान विशेष पर ग्यारह, इक्कीस या अधिक दीपकों को प्रज्जवलित कर महालक्ष्मी के समीप रखकर उस दीप-ज्योति का ‘ऊं दीपावल्यै नम:Ó मन्त्र से गन्धादि उपचारों द्वारा पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना की जाती है।
त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युदग्निश्च तारका:।
सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दोपावल्यै नमो नम:।।

इस प्रकार दीपमालाओं का पूजन करके अपने आचार के अनुसार संतरा, ईख अर्थात्ï गन्ना, धान का लावा (खील) इत्यादि पदार्थ चढ़ाएं। गणेश महालक्ष्मी तथा अन्य सभी देवताओं को भी अर्पित करें व अंत में सभी दीपकों को प्रज्जवलित कर संपूर्ण घर को अलंकृत व प्रकाशमान करें।
विशेष: प्रथम अपने इष्ट देवता के चरणों की तीन बार आरती उतारें और दो बार मुखारविंद से चरणों तक उतारें, जिसमें संपूर्ण चक्र बनाएं। तदानुसार तीन बार ‘ऊंÓ की आकृति बनाएं। इस प्रकार आरती संपूर्ण होती है।

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