googlenews
दीपावली यानी दीपों का प्रकाश पर्व: Diwali festival of lights
Diwali festival of lights

Diwali festival of lights: दिवाली का पर्व बुराई पर सच्चाई की जीत का पर्व है, यह दिन और भी कई संदर्भों में विशेष महत्त्व रखता है। दिवाली के इस शुभ दिन की क्या है विशेषता, आइए जानें लेख से।

मनुष्य की चिरकाल से अंधकार से लड़ने और उस पर विजय पाने की दृढ़ संकल्प शक्ति और सतत उद्योग का स्मरण दिलाता है यह प्रकाश पर्व दीपावली। दीप प्रकाश का आदिम लघु स्त्रोत है। दीपावली में उसे प्रज्जवलित करके अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने के अपने प्रस्थान बिन्दु का, उसे आधार और आश्रय देने वाली भूमि का-अपने मूल का हम स्मरण करते हैं। विद्युत और परमाणुशक्ति (एटमिक एनर्जी) का अविष्कार करके हम प्रकाश और ऊर्जा के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ चुके हैं फिर भी हम मिट्टी के दिए को भूले नहीं हैं अपितु हमने उसे पूरी आस्था और सम्मान के साथ अपने धार्मिक पर्वों में और अपनी दैनिक उपासना में अनिवार्य स्थान दिया है। भारतीयों के प्रत्येक शुभ कार्य दीप प्रज्जवलित करके ही प्रारम्भ किए जाते हैं। बहुत अधिक प्रकाश देने वाले विद्युत बल्बों और ट्यूबलाइटों के रहते हुए भी हम दीपावली के पर्व में मिट्टी के दिए जलाकर भगवती लक्ष्मी की आराधना करते हैं। दीपक के रूप में अपनी आदिम लघुता का स्मरण हमें अपने मूल से गगनचुम्बीवृक्ष की भांति जोड़े रखता है और निरहंकार बनाए रखता है। क्योंकि अहंकार पतन का कारण है इसलिए उत्थानकामी सदैव उससे दूर रहकर अपनी विनम्र लघुता का स्मरण करते हुए उत्तरोत्तर उन्नति के सोपानों पर चढ़ता जाता है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में-‘दिवाली आकर कह जाती है कि अंधकार से जूझने का संकल्प ही सही यथार्थ है। उससे जूझना ही मनुष्य का मनुष्यत्व है। जूझने का संकल्प ही महादेवता है। उसी को प्रत्यक्ष करने की क्रिया को लक्ष्मी पूजा कहते हैं।

दीपावली यानी दीपों का प्रकाश पर्व: Diwali festival of lights
Diwali festival of lights

‘वाल्मीकीय रामायण ‘अध्यात्म रामायण और महाभारत के वन पर्व के अनुसार क्वॉर के शुक्ल पक्ष की दशमी को राम ने तमोगुण और अधर्म के मूर्त विग्रह रावण का संहार किया था और इस तरह मानवता का ‘असतो मां सद्गमय का संकल्प साकार हुआ था। इसलिए इस दिन विजयादशमी या दशहरा का उत्सव मनाया जाता है और कार्तिक की अमावस्या को धर्म के मूर्त विग्रह राम का राज्याभिषेक हुआ था और राम को पाकर जगत की ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय की प्रार्थना सफल और पूर्ण हुई थी। राम ने विजयादशमी को जयलक्ष्मी और अमावस्या को राजलक्ष्मी पायी थी तभी से दीपों की अवली सजाकर दीपावली पर्व मनाया जाता है। इसी दिन जैन धर्म के चौवीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर और वैदिक धर्म के उन्नायक महर्षि दयानंद सरस्वती का महापरिनिर्वाण हुआ था और उन्होंने अमर यश: शरीर पाया था।
भारतीय संस्कृति में राम को धर्म का मूर्त रूप ‘रामो विग्रहवान् धर्म: कहा गया है और रामनाम को सत्य का पर्याय माना गया है। शवयात्रा में हम ‘रामनाम सत्य है का उद्घोष करते चलते हैं। राम अर्थात् परमात्मतत्व ही सत्य है, और उसका अंश भूत आत्मतत्व भी सत्य है, सनातन है, अमर है। राम का उल्टा होता है मरा। जो मरता है वह नश्वर देह है। ‘रामनाम सत्य है यह उद्घोष हमें स्मरण दिलाता है कि रामनाम अमर है, आत्मा अमर है, मनुष्य का धर्म से – सत्कर्मों से अर्जित नाम अमर है। कबीर ने कितनी सटीक बात कही है- ‘हम न मरें मरि है संसारा अर्थात संसार मरेगा, संसार के नश्वर जड़ पदार्थ नष्ट होंगे, यह पांच भौतिक जड़ देह मरेगी किन्तु हमारी आत्मा नहीं मरेगी क्योंकि हमें अमर कर देने वाला रामनाम मिल गया है, धर्ममय अनश्वर यश: शरीर मिल गया है। राम का विलोम है रावण-पुष्पक विमान पर उड़ने वाला, त्रिलोक में निर्वाध संचरण करने वाला, उनकी सम्पदा हथियाकर सोने की लंका के रूप में नश्वर ऐश्वर्य का संग्रह करने वाला, मरणधर्मा जड़ शरीर की अपूरणीय वासनाओं और लालसाओं की पूर्ति में रातदिन लगा रहने वाला परोत्पीड़क तनुपोषक रावण मर गया किन्तु अयोध्या के पुष्कल ऐश्वर्य-सम्पनन राज्य को तिनके के समान त्यागकर वन की कंकरीली भूमि पर नंगे पैर चलने वाले दीनदुखियों के त्राता आतंकियों के उत्खाता जितेन्द्रिय अपरिग्रही लोकसंग्रही राम अमर हो गए। उन्हें पाकर मानवता कृतार्थ हो गयी, धर्म मूर्तिमान हो उठा भगवत्ता साकार हो गयी और इसके साथ ही मानव की ‘मृत्योर्माऽमृत ंगमयÓ की साधना सफल हो गयी, सिद्ध हो गयी।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने ग्रन्थ आलोकपर्व के आलोक पर्व की ज्योतिर्मयी देवी आलेख में लिखा है- ‘मार्कण्डेय पुराण के अनुसार समस्त सृष्टि की मूलभूत आदिशक्ति महालक्ष्मी हैं। वह सत्व, रज और तम तीनों गुणों का मूल समवाय है। वही आदिशक्ति हैं। वह समस्त विश्व में व्याप्त होकर विराजमान हैं। वह लक्ष्य और अलक्ष्य इन दो रूपों में रहती हैं। लक्ष्य रूप में यह चराचर जगत ही उनका स्वरूप है और अलक्ष्य रूप में यह समस्त जगत की सृष्टि का मूल कारण है। उसी से विभिन्न शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है। दीपावली का पर्व आदिशक्ति के विभिन्न रूपों के स्मरण का दिन है। जिन लोगों ने संसार का भरण पोषण करने वाली वैष्णवी शक्ति को मुख्य रूप से उपास्य माना है, उन्होंने उस आदिभूता शक्ति का नाम महालक्ष्मी स्वीकार किया है। दीपावली के पुण्यपर्व पर इस आदिशक्ति की पूजा होती है। (आलोक पर्व-पृ.11)
यह सारा दृश्य जगत्ज्ञान, इच्छा और क्रिया के रूप में त्रिपुटीकृत है। ब्रह्म की मूल शक्ति में इन तीनों का सूक्ष्म रूप में अवस्थान होगा। त्रिपुटी कृत जगत की मूल कारण भूता इस शक्ति को त्रिपुरा भी कहा जाता है। महालक्ष्मी भी यही हैं। ज्ञानरूप में अभिव्यक्त होने पर यह सत्वगुणप्रधान सरस्वती के रूप में, इच्छा रूप में रजोगुणप्रधान लक्ष्मी के रूप में और क्रिया रूप में तमोगुण प्रधान काली के रूप में उपास्य होती है। लक्ष्मी इच्छा रूप में अभिव्यक्त होती है। जो साधक लक्ष्मी रूप में आदिशक्ति की उपासना करते हैं उनके चित्त में इच्छा तत्त्व की प्रधानता होती है पर बाकी दो तत्त्व ज्ञान और क्रिया भी उसमें सहायक होते हैं। इसीलिए लक्ष्मी की उपासना ‘ज्ञानपूर्वा क्रियापरा होती है। अर्थात वह ज्ञान द्वारा चालित और क्रिया द्वारा अनुगमित इच्छा शक्ति की उपासना होती है। ‘ज्ञानपूर्वा क्रियापराÓ का मतलब है कि इच्छाशक्ति ही मुख्यतया उपास्य है, पर पहले ज्ञान की साधना और बाद में क्रिया का समर्थन इसमे आवश्यक है। यदि उल्टा हो जाए अर्थात इच्छाशक्ति की उपासना क्रियापूर्वा और ज्ञानापरा हो जाए तो उपासना का रूप बदल जाता है। पहली अवस्था में उपास्या लक्ष्मी समस्त जगत के उपकार के लिए होती है। उस लक्ष्मी का वाहन गरुड़ होता है। गरुड़ शक्ति, वेग और सेवावृत्ति का प्रतीक है। दूसरी अवस्था में उसका वाहन उल्लू होता है। उल्लू स्वार्थ, अंधकार-प्रियता और विच्छिन्नता का प्रतीक है। लक्ष्मी तभी उपास्य होकर भक्त को ठीक-ठीक कृतकृत्य करती हैं, तब उसके चित्त में सबके कल्याण की कामना रहती है। यदि केवल अपना स्वार्थ ही साधक के चित्त में प्रधान हो तो वह उलूक वाहिनी शक्ति की ही कृपा पा सकता है। फिर तो वह तमोगुण का शिकार हो जाता है उसकी उपासना लोक-कल्याणमार्ग से विच्छिन्न होकर बंध्या हो जाती हैं।
दीपावली प्रकाश का पर्व हैं। इस दिन जिस लक्ष्मी की पूजा होती है वह गरुड़-वाहिनी है- शक्ति, सेवा और गतिशीलता उसके मुख्य गुण हैं। प्रकाश और अंधकार का नियत विरोध है। अमावस्या की रात को प्रयत्नपूर्वक लाख-लाख प्रदीपों को जलाकर मां लक्ष्मी के उलूक वाहिनी रूप की नहीं, गरुड़ वाहिनी रूप की उपासना करते हैं। हम अंधकार का, समाज से कटकर रहने का, स्वार्थपरता का प्रयत्नपूर्वक प्रत्याख्यान करते हैं और प्रकाश का, सामाजिकता का और सेवावृत्ति का अह्वान करते हैं। हमें भूलना नहीं चाहिए कि यह उपासना ज्ञान द्वारा चालित और क्रिया द्वारा अनुगमित होकर ही सार्थक होती हैं।
‘सर्वस्याद्यामहालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता।।

Leave a comment