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अध्यात्म और सफलता

बुद्धिमान व्यक्ति व्यवहारिक (ब्राह्य) जीवन और आध्यात्मिक (आन्तरिक) जीवन को सुचारू ढंग से जीने के लिए चार विधियों का प्रयोग करते है। उन विधियों को साम, दाम, भेद और दंड कहते हैं।

संसार में लोगों से व्यवहार करने और विवेक से निर्वाह करने के लिए सर्वप्रथम आप ‘साम’ का प्रयोग करते हैं। ‘साम’ का अर्थ है शान्ति और समझदारी के साथ व्यवहार। यदि यह रास्ता सफल न हो तो दूसरी विधि अर्थात ‘दाम’ के प्रयोग का नियम है।

दाम का अर्थ है सहज जो जाना, घटनाओं को घटने देना, क्षमा का गुण और स्वतंत्रता देने का भाव। दाम समर्पण है। समर्पण शब्द का अर्थ बहुत गलत समझा जाता है। समर्पण गुलामी नहीं। समर्पण ऐसी वस्तु नहीं जो किसी पर थोपी जा सके। समर्पण तो एक घटना है। प्रेम, श्रद्धा और अहोभाव के क्षणों में समर्पण की घटना घटती है। मन में कोई भय हो तो उसे दूर करना है। भय से मुक्ति अटूट विश्वास और श्रद्धा से ही संभव है और यही समर्पण है। यदि लोग आपकी उदारता और उन्हें दी गई स्वतंत्रता का मूल्यांकन न कर पायें तो फिर तीसरा उपाय ‘भेद’ का प्रयोग होता है।

भेद का अर्थ है विवेचन, भेदभाव, जानबूझ कर दूरी बनाना। सबसे पहले तो बातचीत का सहारा लें। क्योंकि सही संवाद के अभाव में ही सब समस्याएं पनपती हैं। ठीक ढंग से, प्रेमपूर्ण वार्तालाप से चीजें सुलझने लगती हैं। यदि प्रेमपूर्ण संवाद का कोई प्रभाव दिखाई न दे तो पे्रमपूर्ण हृदय से उन लोगों की उपेक्षा करें। कोई गलती करे तो उसकी गलती की ओर ध्यान न दें। उन्हें अपने से इस बात की प्रतीति होने दें कि उनकी उपेक्षा की जा रही है। आपकी उदारता, आपकी सहजता से लोगों को उनकी गलती की प्रतीति होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो ‘भेद’ रूपी उपाय का प्रयोग करें। दो लोग खड़ें हों तो आप एक का पक्ष लेकर दूसरे की उपेक्षा करें। संभवत: उसे उसकी गलती समझ में आ जाये। दाम की विधि में पक्षपात नहीं करते। यह एक बहुत सूक्ष्म किंतु महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि जीवन में भेदभाव या पक्षपात का प्रयोग हम प्राय: करते हैं। यह अज्ञानवश ही हो जाता है। समझ से, प्रयोजन से या बोधपूर्वक नहीं किया जाता। यदि सजगता के साथ यदि भेद का प्रयोग करें तो एक संवेदनशील व्यक्ति तुरंत समझ जाता है।

यदि ‘भेद’ से भी बात न बने तो अंतिम उपाय है ‘दंड’ का, छड़ी हाथ में लेने का। यदि व्यक्ति इतना जड़ है कि भेद-पक्षपात या अवहेलना से भी उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता तो छड़ी से, दंड से झटका देकर सचेत करना पड़ेगा।

यही चार उपाय हमारे आन्तरिक जीवन, हमारी आत्मा के विकास में भी सहायक होते हैं। यद्यपि आन्तरिक विकास में उपायों का उपरोक्त क्रम अनिवार्य नहीं। ‘साम’ अर्थात समभाव बना रहे। सुखद संवेदना हुई तो क्या? उसे दृष्टी बन कर देखो। दुख संवेदना को भी दृष्टी बनकर देखो। दोनों को समभाव से लो। ध्यान, योग साधना सब समभाव अर्थात मन के अन्दर के ‘सम’ की पुष्टीके उपाय हैं। परंतु कुछ लोगों को यह भारी पड़ने लगता है।

सम को संभालना कठिन हो रहा हो तो दाम का उपयोग करें। दाम का अर्थ-जो भी मन की शान्ति को भंग कर रहा हो, मन को समभाव के शाही सिंहासन पर विराजने में जो भी आड़े आए, उसका त्याग। आखिर मन को विचलित करता क्या है? कुछ गलत काम करने का अपराध भाव या कोई महान कार्य करने का अहंकार-इन दोनों भावों से युक्त मन को, इसके गुणों, अवगुणों सहित त्याग दो, इसका समर्पण कर दो। आन्तरिक जगत का यही दाम है। 

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