ज्योतिषीय सिद्धांतों के अनुसार पंचम् भाव संतान सुख का प्रतिनिधित्व करता है। कारक ग्रहों में बृहस्पति को संतान का कारक ग्रह माना जाता है। संतान सुख हेतु पंचमेश एवं बृहस्पति का बलवान होना एवं पंचम् भाव पर और कारक पर शुभ ग्रहों का प्रभाव संतान सुख देता है। लेकिन इन कारकों पर पाप ग्रहों का प्रभाव, कारकों का नीच नवांश में होना, भाव का बलहीन होना, शत्रु राशि एवं अस्तगत स्थितियां संतान सुख में बाधा उत्पन्न करती हैं। संतान में बाधा कारक योगों की पहचान कर उनका उपाय विधिवत करने से संतान सुख प्राप्त होता है। यहां हम आप को संतान प्रतिबंधक योग एवं उपाय बता रहे हैं –
 
 
1. यदि पंचम् भाव, पंचमेश एवं संतान कारक बृहस्पति पर राहु का अशुभ प्रभाव हो तो जातक को सर्पश्राप दोष के कारण संतानहीनता होती है। निवारण हेतु स्वर्ण निर्मित नागराज की मूर्ति की पूजा करें। गौदान, तिलदान एवं स्वर्णदान करें। तंत्र और यंत्र का विधिपूर्वक एक लक्ष्या जाप कराने से सर्पदोष दूर हो जाते हैं और संतान की वृद्धि होती है।
 
2. यदि पितृकारक सूर्य, सिंह राशि, दशमेश एवं दशम् भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो या निर्बल हो, त्रिक भावों में स्थित हो तो पितृशाप के कारण संतान बाधा होती है। बाधा निवारण हेतु पितृदोष शांति करवाएं। गया में श्राद्ध कर कन्यादान, गौदान करने से संतान बाधा दूर हो जाती है। सूर्य की पूजा करने से और सूर्य को अर्घ्य देने से भी राहत मिलती है।
 
3. यदि मातृकारक चन्द्रमा, कर्क राशि, चतुर्थ भावों पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो, कर्क राशि में मंगल एवं राहु स्थित हो, चंद्रमा अपनी नीच राशि या त्रिक भावों में स्थित हो तो मातृदोष के कारण संतान बाधा आती है। बाधा निवारण हेतु समुद्र तट पर स्नान करने के पश्चात् गायत्री मंत्र का एक लाख जाप कराएं। चांदी के पात्र में दूध का सेवन करने और एक वर्ष तक पीपल की पूजा करने से दोष दूर होकर संतान सुख में वृद्धि होती है।
 
4. शनि की अधिष्ठित राशि से षष्ठ स्नान पर यदि चंद्रमा, बुध और सूर्य की दृष्टि हो व लग्न पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो कुल देवता के दोष के कारण संतानहीनता होती है। कुल देवता की पूजा नियमित रूप से करने से संतान सुख प्राप्त हो जाता है।
 
5. यदि तृतीय भाव, तृतीयेश एवं मंगल पंचमेष या बृहस्पति के साथ त्रिक भावों में स्थित हो तो भातृ शाप के कारण संतान बाधा होती है। बाधा निवारण हेतु श्री विष्णु भगवान की पूजा करें। हरिवंश पुराण का श्रवण करें। चन्द्रायण व्रत करने से, पीपल एवं वट वृक्ष की पूजा करने से संतान सुख प्राप्त होता है।
 
6. पंचम् भाव, पंचमेश एवं कारक बृहस्पति पर बुध का अशुभ प्रभाव हो एवं इन पर शनि, राहु, केतु का प्रभाव भी पड़े तो मातृशाप के कारण संतान बाधा आती है। बाधा निवारण हेतु विष्णु जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजन करने से परोपकारार्थ कुंआ, तालाब, खुदाई एवं छात्रों को विद्यालय सामग्री का दान करने से श्राप निवारण हो कर संतान सुख अवश्य मिलता है।
 
7. यदि बृहस्पति पंचमेश या नवमेश होकर शनि, राहु, केतु के पाप प्रभाव में हो या त्रिक भाव में होकर निर्बल हो तो ब्राह्मण शाप के कारण संतान बाधा होती है। बाधा निवारण हेतु कन्यादान, गरीब ब्राह्मण का सहयोग, स्वर्ण पुखराज का दान, धर्मस्थान में पीले फल वितरण करने से संतान सुख प्राप्त होता है।
 
संतान बाधा कारक ग्रहों के विधिवत उपाय करने से एवं बुध, शुक्र एवं चन्द्र दोष कारक हो तो रूद्राभिषेक कराने से, बृहस्पति दोष कारक हो तो मंत्र, यंत्र, औषधि से, सूर्य मंगल, राहु, केतु एवं शनि के लिए कुल देवता की उपासना से बाधा दूर हो जाती है। ऐसा ‘जातकांलकार’ का मत है। मंत्र हेतु बृहस्पति मंत्र ऊं ग्रां ग्रीं ग्रौं नम: गायत्री मंत्र का जाप एवं बृहस्पति रत्न पुखराज धारण सर्वोत्तम उपाय है।
 
 
ये भी पढ़ें –