उदयपुर से लगभग 50 किमी की दूरी पर, एक बेहद प्राचीन मंदिर स्थित है जिसे अंबिका माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर जगत नाम के गाँव में स्थित है और इस मंदिर में अंबिका देवी, जो देवी दुर्गा का रूप हैं, को पूजा जाता है।  यह एक कम ज्ञात मंदिर है, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच इसका अपना एक अलग महत्व है। इतना ही नहीं, राजस्थान के प्राचीन विशिष्ट मंदिरों की सूची में इसका नाम अवश्य लिया जाता है। यहां पर देवी अंबिका की पूजा की जाती है क्योंकि देवी शक्ति को ऊर्जा का आदि स्रोत माना जाता है। इस मंदिर की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस मंदिर को मेवाड़ के खजुराहो के नाम से जाना जाता है। तो चलिए आज हम आपको इस प्राचीन मंदिर के बारे में विस्तारपूर्वक बता रहे हैं।

 

इसलिए कहते हैं मेवाड़ का खजुराहो

 

 

कहा जाता है कि इस प्राचीन मंदिर कानिर्माण 961 ईस्वी में हुआ था, जब खजुराहो में लक्ष्मण मंदिर का निर्माण किया जा रहा था। मंदिर पर एक शिलालेख से पता चलता है कि सबपुरा नाम के एक व्यक्ति, जो वेल्लूर के पुत्र हैं, ने विक्रम संवत 1017 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया है। सुंदर मूर्तियां, मूर्तियों की मुद्रा, आभूषण और मंदिर की नागर स्थापत्य शैली खजुराहो मंदिर के समान है। इसलिए इसे मेवाड़ का खजुराहो भी कहा जाता है।

 

बेहतरीन मूर्तियांऔर शिलालेख करते हैं अंचभित

 

 

यूं तो मंदिर में मुख्य रूप से अंबिका माता की पूजा की जाती है। लेकिन मंदिर में कई बेहतरीन मूर्तियां देखी जा सकती हैं जिन्हें उत्कृष्ट रूप से संरक्षित किया गया है। मंदिर के स्तंभ और दीवार पर असंख्य शिलालेख हैं जो हर आने वाले की आंखों को मोह लेते हैं। बेजोड़ मूर्तियों में महिषासुरमर्दिनी, नवदुर्गा, वीणाधारिणी, सरस्वती, नृत्य मुद्रा में गणपति, यम, कुबेर, वायु, इंद्र, कामुक मूर्तियां आदि कई मूर्तियां मौजूद है। मंदिर में बाहरी हिस्से में पीछे की तरफ उकेरी गई महिलाओं की विभिन्न मूर्तियां और उनके शरीर की भाव भंगिमाए बेहद ही खूबसूरती के साथ उकेरी गई हैं।

 

मन मोह लेती है मंदिर की खूबसूरती

माता का मंदिर आकार में पंचकोणीय है। मंदिर एक प्रारंभिक, माध्यमिक, शैली का उदाहरण है जिसे मारू-गुर्जर वास्तुकला के रूप में जाना जाता है। मंदिर के आंतरिक भाग में एक माउंटेन पैलेस की थीम के साथ एक खूबसूरत आकृति है। यह देवताओं के स्वर्गीय निवास जैसा दिखता है। मंदिर के टॉवर को जटिल आकृति से कवर किया गया है। देवी को समर्पित मंदिर होने के कारण, मंदिर में मौजूद अधिकांश मूर्तियां दुर्गा, बरहमानी, लक्ष्मी और अन्य समकक्षों से मिलती जुलती हैं। वहीं, मंदिर के दोनों किनारों पर प्रोजेक्शन के साथ एक मंडप है। एक हॉल है, जिसकी खिड़कियाँ नक्काशीदार पैनलों से खूबसूरती से सजी हैं। वहीं, छत एक पिरामिड के आकार में है। मंदिर के द्वार पर आकर्षक नक्काशी की गई है। मंदिर में एक प्रार्थना कक्ष भी है जिसमें नाचते हुए गणेश का उल्लेखनीय नक्काशी वाला पैनल है। मंदिर की वास्तुकला बहुत ही उत्कृष्ट है और पूरे भारत से पर्यटकों को आकर्षित करती है।

 

इसलिए भी खास है मंदिर की वास्तुकला

 

 

मंदिर की वास्तुकला के बारे में एक आश्चर्यजनक बात यह है कि अद्वितीय स्थापत्य शैली किसी भी तरह से इसके आसपास के क्षेत्र से संबंधित नहीं है। इसमें उत्तर भारतीय हिंदू मंदिर की स्थापत्य विशेषताओं या किसी राजस्थानी स्थापत्य विशेषताओं का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। यह स्थानीय या क्षेत्रीय वास्तुशिल्प सुविधाओं और विशेषताओं के साथ भी मिश्रित नहीं है।

 

जानिए इतिहास : अंबिका माता मंदिर एक छोटा मंदिर है जो एक चट्टान की दरार में बना है। मंदिर 961 ईस्वी में बनाया गया था और इसे जगत मंदिर के नाम में भी जाना जाता है क्योंकि मंदिर जगत गांव में स्थित है। मंदिर अपनी बेहतरीन और उत्कृष्ट वास्तुकला के कारण बेहद प्रचलित है जो कहीं और आपको शायद ही देखने को मिले। मंदिर बहुत बड़ा नहीं है लेकिन निश्चित रूप से कला का एक नमूना है जिसे देखने के लिए पूरे भारत से लोग आते हैं। राजस्थान के प्राचीन मंदिरों में जगत का अम्बिका माता मंदिर एक विशिष्ठ स्थान रखता है। आज, मंदिर राजस्थान के पुरातत्व और संग्रहालय विभाग द्वारा संरक्षित है।

 

यहां लगता है मेला

 

 

यूं तो यह मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला और मूर्तियों के लिए बेहद प्रसिद्ध है। लेकिन इसके अलावा भी एक ऐसी चीज है, जिसके लिए धार्मिक यहां पर आते हैं। दरअसल, मंदिर में नवरात्रि के समय और दुर्गा पूजा आदि के दौरान मेले आयोजित किए जाते हैं और इस मेले में दूर-दूर से लोग आते हैं। इस दौरान इस मंदिर में यात्रा करने पर आपको एक अलग ही अनुभव प्राप्त होगा। पुरातत्व और मूर्तियों में रुचि रखने वाले लोगों को एक बार इस प्राचीन मंदिर के दर्शन अवश्य करना चाहिए।

 

ऐसे पहुंचे : उदयपुर शहर से 50 किमी दूर जब आप जगत गांव पहुंचेंगे तो मंदिर पहुंचना आपके लिए काफी आसान हो जाएगा। गांव शहर से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है और मंदिर तक पहुंचने के लिए बस और टैक्सी आसानी से मिल सकती है। अगर आप चाहें तो अपने निजी वाहन के साथ भी मंदिर जा सकते हैं। यह आपकी यात्रा को अधिक आसान बनाएगा।

 

खुलने/बंद होने का समय और दिन : मंदिर आम जनता के लिए सुबह 06:00 बजे खुलता है और शाम को 07:00 बजे बंद हो जाता है। इस दौरान दर्शन और पूजा के लिए जा सकते हैं।

 

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