गृहलक्ष्मी ऑफ़ द डे

मात्र 18 साल में शादी हो जाने की वजह से सरीता के अंदर छुपी अपनी पहचान बनाने की महत्वकांक्षाएं दबी-सी रह गई। घर और परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें ऐसा घेरा कि अपने बारे में, पढ़ाई को आगे बढ़ाने के बारे में सोचना मुश्किल लगने लगा। लेकिन 15 साल पहले जब उन्हें जॉन्डिस ने बुरी तरह जकड़ा तो अपनी बीमारी से परेशान होकर सरिता ने फिर से अपने लिए सोचना शुरू किया और सबसे पहले दूसरे शहर के एक इंस्टिट्यूट में योगा इंस्ट्रक्टर का कोर्स किया। और यही से उन्होंने फिर से लाइफ को एंजॉय करना शुरू किया। 

मुश्किल समय का ऐसे करती हूं सामना– मैंने अपने वॉर्डरोब में भग्वान की एक ऐसी प्रार्थना लगा रखी है जिसे पढ़कर मुझे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

मेरी नज़र में खुशी- मैं मानती हूं कि खुशी वो है जो आपके मन को सुकून दे सके। जब भी मुझे ऐसा लगता है कि मैं खुश होना चाहती हूं तो गाड़ी में सामान रखकर मैं निकल जाती हूं और कभी बच्चों को, कभी किसी जरूरतमंद को या कभी किसी आश्रम में लोगों के बीच वो चीज़ें बांट देती हूं।

अपनी पसंदीदा चीजों को न करें नज़रअंदाज– मैं बचपन से ही क्रीएटिव रही हूं, इसलिए पेंटिंग व डिज़ाइनिंग में मेरी खासा रुचि है। आज मैं अपने दोस्तों के लिए भी ज्वेलरी डिज़ाइन करती हूं। मैंने पिछले कुछ सालों में डायमंड ग्रेडिंग का कोर्स भी किया था। 

मैं मानती हूं क हर महिला को समय के साथ अपनी सोच और स्किल्स में परिवर्तन लाना चाहिए और तकनीक से घबराने की जगह उसे अपनाने की कोशिश करना चाहिए। 

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