googlenews
सोने के पंख-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां बिहार
Sone Ke Pankh-Balman ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

बहुत दिनों की बात है। बिहार के छोटे से गाँव में एक गरीब किसान रहता था जिसका नाम था रमुआ। अपनी ईमानदारी और मेहनत की बदौलत अपने छोटे से खेत में भी खाने-पीने भर अन्न उपजा लेता था वह।

रमुआ की शादी मध्यमवर्गीय परिवार में हुई थी। उसकी पत्नी देवंती दिखने में सुंदर तो थी, लेकिन बहुत चतुर और लालची स्वभाव की थी। रमुआ इतना सीधा-सादा था कि वह अपनी पत्नी की बेवकूफी को उसकी समझदारी समझ बैठता था।

रमुआ को तोता और चिड़िया पालने-पोसने का बहुत शौक था। उसकी झोपड़ी में आठ पिंजड़े थे। चार पिंजड़ों में तोते और चार पिंजड़ों में चिड़िया पाल रखी थी उसने। रंग-बिरंगी चिडियों को देखकर उसका मन-मयूर नाच उठता था।

उसके पड़ोस में ही श्यामू नाम का चिड़िया तोता बेचने वाला एक बूढ़ा भी रहता था। वह बूढ़ा जब कभी चिड़ियों को अपने जाल में फंसाकर लाता, रमुआ उस ओर टकटकी लगाकर देखा करता था।

वह अक्सर श्यामू से कहता-

“पूरी उम्र तूने चिड़ियां-तोते बेचने में गवां दी, यह बात तो समझ में आती है। किंतु जिसे बेचकर तू अपनी जीविका चलाता है, उसे मारकर खाना भी तो पाप है! कम से कम इस बुढ़ापे में तो इस बात का ख्याल करो।”

मगर, वह किसी की नहीं सुनता था।

एक दिन उसने कई रंगों की चिड़ियां फंसा ली थीं, जिन्हें देखकर रमुआ खुशी से नाच उठा। उनमें से एक इंद्रधनुषी रंग की चिड़िया उसे बहुत उदास नजर आई, मानो वह मन ही मन कह रही हो- “मुझे बचा लो। मैं अभी जीना चाहती हूं! यह शैतान मुझे भी जान से मारकर खा जाएगा!”

रमुआ से उसकी उदासी देखी न गई! उसने एक शाम भूखा रहकर, उस चिड़िया को खरीद लिया और उसे एक अलग पिंजरे में टांग दिया।

उस रात रमुआ सपने में उस इंद्रधनुषी चिड़िया को देखकर हैरान रह गया। चिड़िया रमुआ से कह रही थी-

“तुमने मुझे बचाकर मुझपर बहुत बड़ा एहसान किया है। मैं इंद्रलोक की अप्सरा हूँ। मुझे अपने रूप पर बहुत घमंड था! इसलिए देवलोक के श्राप से अभिशप्त हूं।” -चिड़िया थोड़ी देर रुक कर आगे बोली- “तुम रोज मुझे चांदी का दाना खिलाया करोगे, तो मेरे पंख सोने के हो जाएंगे, जिन्हें बेचकर तुम धनवान बन सकते हो। लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि एक दिन में मेरे एक पंख ही तुम्हें नोंचना होगा। एक से अधिक पंख नोचे जाने पर मैं मर जाऊंगी। और मेरे पंख भी सोने के नहीं रह जाएंगे!”

दूसरे दिन सुबह जब रमुआ की आंखें खुली, तो वह सपने को याद कर रोमांचित हो उठा। उसने अपनी बात पत्नी को सुनाई। रमुआ की पूरी बात सुनते हुए उसकी पत्नी बोली- “सपने भी सच होते हैं क्या? मेरी मानो तो इस चिड़िया को बेच आओ। मुझे तो यह चुडैल लगती है। चांदी के दाने की जगह, इस चिड़िया को जहर की गोलियां खिला दो। बहुत अशुभ होने वाला है।”

“नहीं… नहीं..! मैं जीव हत्या नहीं कर सकता! न ही इस उदास चिड़िया को अपनी झोपड़ी से बाहर कर सकता हूं। मैं एक शाम भूखा रहकर, पैसे इकट्ठा कर लूंगा और तब उसे चांदी के दाने जरूर खिलाऊंगा!” ।

रमुआ की जिद के आगे पत्नी देवंती की एक न चली! जब कुछ पैसे इकट्ठे हो गए, तब रमुआ ने उस उदास चिड़िया को चांदी के दाने खिलाने शुरू कर दिए। कुछ ही दिनों में चिड़िया के पंख सोने के हो गए।

रमुआ और देवंती अचंभित हो गए,! वह रमुख को अब समझदार समझने लगी!

धीरे-धीरे रमुआ के पास काफी धन इकट्ठा हो गया। झोपड़ी की जगह, महल खड़ा हो गया। यह किस्सा पूरे गांव में आग की लपटों की भांति फैल गया। फिर क्या था! लोग सोने के पंख वाली चिड़िया को लाखों रुपयों में खरीदना चाहते थे! मगर, रमुआ लालची नहीं था। वह किसी के प्रलोभन में नहीं आया।

श्यामू चिड़ीमार को जब ये सारी बातें मालूम हुई, तब वह उस चिड़िया को एक रात चुराकर, अपने घर ले आया। उसने भी चांदी के दाने खिलाने शुरू कर दिए। सोने का पंख प्रतिदिन पाकर, उसके भीतर का लोभ बढ़ता चला गया।

एक रात उसने सोचा, एक-एक पंख तोड़ते-तोड़ते तो जमाना लग जाएगा! तब कहीं महल बना पाएगा वह! क्यों न उस चिड़िया को मारकर, उसके पूरे पंख ही नोंच डालें।

ऐसा सोचते ही वह फुर्ती के साथ उठा और चिड़ियां के सारे सोने के पंखों को नोंचने लगा। एक से अधिक पंख के टूटते ही सोने की चिड़िया ने प्राण त्याग दिए और सारे सोने के पंख लोहे के बन गए। तब जाकर श्यामू का नशा टूटा! किंतु अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियां चुग गई खेत?

अपने स्वार्थ पर पश्चाताप करने के उद्देश्य से श्यामू ने किसी भी जीव की हत्या करनी छोड़ दी और सारी चिड़ियों को बहुत प्यार से पालने-पोसने लगा।

श्यामू ने उस सोने की चिड़िया को चोरी से लाने और मारने का सारा किस्सा रमुआ को बतलाया और उसके पैरों पर गिरकर फूट-फूटकर रोने लगा।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

Leave a comment