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grehlaksmi ki kahani

गृहलक्ष्मी की कहानियां: वैसे तो अपर्णा इस घर में अपने पति आबिद की पसंद से ब्याह कर आई थी परन्तु आज वह इस घर के हर सदस्य की चहेती बन गई थी। अपर्णा और आबिद का केवल अंतरजातीय नहीं वरन अन्तरधर्म विवाह हुआ था ।  इस वजह से कभी-कभार खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाज और पहनावे को लेकर सास-बहू में मतभेद हो जाया करता किन्तु इन सबके बावजूद उनके बीच कभी भी मन भेद की स्थिति नहीं आई। जनवरी का महीना अपर्णा को बचपन से बेहद पसंद है। जब वह छोटी थी तो इस महीने में आने वाले मकर संक्रांति का त्योहार वह पूरे उत्साह से मनाती । अपर्णा को तिल-गुड़ की सौंधी खुशबू और उससे बने लड्डू, पापड़ी व संक्रांति पर बनने वाले फल्ली और गजक के लड्डू भी   बहुत प्रिय है ।  साथ ही साथ उसे संक्रांति से बसंत पंचमी तक चलने वाला हल्दी कुमकुम का फंक्शन भी अच्छा लगता है, जिसमें सुहागनें एक-दूसरे के घर जाती हैं,जहां वे तिल-गुड़ देकर आपस में एक-दूसरे के माथे पर हल्दी कुमकुम लगाती  हैं। आज भी अपर्णा को तिल-गुड़ के लड्डू और हल्दी कुमकुम का फंक्शन बहुत पसंद है परन्तु शादी के बाद जब पहली बार मकर संक्रांति का पर्व आया और अपर्णा ने अपनी सासू मां से तिल-गुड़ के लड्डू बनाने और हल्दी कुमकुम अपने घर पर रखने की अनुमति मांगी तो सासू मां ने मुंह बनाते हुए कहा,” देखो भाई ऐसा है कि हम और तुम्हारे ससुर जी तो परहेज पर चल रहे हैं हमें तो मीठा खाने की मनाही है.बुढ़ापे में मुंआ शुगर जो बढ़ा रहता है और रही आबिद की बात तो वो तुम्हारा शौहर है, मुझसे ज्यादा बेहतर तो तुम जानती होगी उसकी पसंद-नापसंद लेकिन, जहां तक मैं जानती हूं उसे भी तिल-गुड़ के लड्डू कोई खास पसंद नहीं इसलिए इतना पसारा फैलाने की क्या ज़रूरत है? मार्केट से ले आओ और खा लो यदि तुम्हें तिल-गुड़ के लड्डू इतने ही पसंद है और हमारे यहां तो ये हल्दी कुमकुम का रिवाज़ है ही नहीं, अब तुम्हारे लिए तो हम अपने रीति रिवाज बदल नहीं सकते ना। “


        अपनी सासू मां से यह सब सुन अपर्णा को बहुत दुख हुआ और उस दिन के बाद उसने फिर कभी भी इस विषय पर अपनी इच्छा जाहिर नहीं की, हालांकि अपर्णा ने अपनी सासू मां की बातों को अपने दिल में नहीं लिया। वैसे भी जब तक अपर्णा की मां जीवित रही, हर संक्रांति और हल्दी कुमकुम में अपर्णा अपने मायके चली जाती क्योंकि उसका मायका और ससुराल एक ही शहर में था.
        अपर्णा की मां भी यह बात भली-भांति जानती थी कि अपर्णा को मकर संक्रांति पर बनने वाले तिल-गुड़ के लड्डू और हल्दी कुमकुम का फंक्शन सेलिब्रेट करना बेहद पसंद हैं इसलिए वह उसे हर वर्ष घर बुला लिया करती लेकिन इस साल अपर्णा की मां का स्वर्गवास हो चुका था  ।   घर पर केवल पापा और एक छोटा भाई ही था, जो ना हल्दी कुमकुम कर सकते और ना ही तिल-गुड़ के लड्डू ही बना सकते थे।
        मकर संक्रांति के एक दिन पहले अपर्णा अपनी मां को स्मरण कर मायूस हो गई क्योंकि यह उसकी पहली संक्रांति थी ,जिसमें ना तिल-गुड़ की महक थी और ना ही हल्दी कुमकुम की रौनक. अगली सुबह संक्रांति के दिन अपर्णा भारी मन से उठी तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। पूरा घर तिल-गुड़ की सौंधी खुशबू से महक रहा था उसे कुछ समझ नहीं आया कि आखिर यह खुशबू उसे आ कहां से रही है.यह जानने के लिए अपर्णा किचन की ओर बढ़ी.किचन में पहुंची तो उसने देखा उसकी सासू मां तिल-गुड़ के लड्डू बना रही है।अपर्णा को किचन में देख उसकी सासू मां बोली-
        ” संक्रांति मुबारक हो…. जाओ जल्दी से नहा कर तैयार हो जाओ । हल्दी कुमकुम की तैयारी भी करनी है। ”        यह सुनते ही अपर्णा हैरानी से प्रश्नवाचक निगाहों से अपनी सासू मां की ओर देखने लगी तो वह मुस्कुराती हुई बोलीं-
        “अपनों के चेहरे की मुस्कान से ज्यादा कुछ नहीं होता और अपनों की खुशी के लिए रिवाजों में ज़रा सा सकारात्मक बदलाव जायज और अच्छा होता है”।
        यह सुन अपर्णा की आंखें भर आईं ।.आज से उसके अपने घर पर एक नए रिवाज की शुरुआत होने जा रही थी। सासू मां को संक्रांति की तैयारी करता देखा अपर्णा को ऐसा लगा जैसे सामने उसकी सासू मां नही उसकी अपनी मां खड़ी है।

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