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नारीमन की कहानियां
Nayi Umang- Nariman Ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

भोर की आहट पाते ही मानसी और आलोक बिना अलार्म ना के ही उठ जाते हैं। नित्य नियम से निवृत्त हो आलोक सैर को निकल जाते हैं। मानसी भी थोड़ा योगा और प्राणायाम करके रसोई का रुख करती है। आलोक के वापिस आने पर दोनों इकट्ठे बैठ चाय नाश्ता करते है। घर गृहस्थी की कुछेक बातें करके वे बच्चों की मीठी यादों को दोहरा कर प्रसन्न हो लेते हैं।

जब से दोनों बच्चे उच्च शिक्षा के लिए विदेश में पढ़ने गए हैं, मानसी और आलोक की दिनचर्या में जैसे ढीलापन-सा आ गया है, नहीं तो मानसी का दिन से रात, रात से सुबह घड़ी की सुइयों के साथ दौड़ते नज़र आते थे। फुर्सत के नाम पर मानसी के पास सिर्फ रात की सात-आठ घंटे की नींद ही हुआ करती थी। पढ़ाई की शौकीन मानसी ने जब से होश सम्भाला, खुद को हमेशा व्यस्त रखना ही पसंद किया। शादी के बाद गृहस्थी को बखूबी सम्भाला। बच्चों के पालन-पोषण से लेकर उनकी पढ़ाई-लिखाई, एक्स्ट्रा करिकुलम में हमेशा खुद को व्यस्त रखा। पर अब पहले जैसी व्यस्तता नहीं थी।

“कौन-सी सब्जी बनाऊँ, आज?” मानसी ने मुस्कुराते हुए आलोक से पूछा।

“कुछ भी बना लो।” आलोक संक्षिप्त-सा जवाब देकर ऑफिस के लिए तैयार होने चले गए।

पहले आलोक बच्चों संग कुछ-कुछ सब्जियां न खाने की ज़िद कर लिया करते थे, पर अब सब कुछ चुपचाप खा लेते हैं। बच्चों संग बड़े भी बच्चे बन लेते हैं। मन को खुश रखने वाली हर छोटी-बड़ी हरकत घर के माहौल को ज़िन्दगी से भर देती है। अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर ये कहा जाए की बच्चे घर की धमनियों में रक्त प्रवाह के समान होते हैं। मानसी इन्हीं विचारों में मगन टिफिन की तैयारी कर रही थी, तभी आलोक की आवाज़ आई,

“मेरा टिफिन तैयार है क्या?”

“जी, गाड़ी में रखने जा रही हूँ।” विचार तंद्रा से निकल मानसी ने कहा।

मानसी टिफिन का बैग उठाकर बाहर के आंगन में चली आई। पीछे-पीछे आलोक भी आ पहुंचे। आलोक को बाय बोलकर मानसी अपने घर के छोटे से किचन गार्डन में आ गई। कुछ सूखी पत्तियों को हटा, कुछ पत्तों को सहला, फूलों की महक का आनंद ले मानसी फूलों से बतियाने लगी।

“लो, बुहार दिया आंगन तुम्हारा! अब खुलकर खिलो, खिलखिलाओ।”

ऐसा लग रहा था, मानो मानसी बच्चों का प्यार-दुलार इन फूल-पत्तियों पर बांटकर खुश होना चाहती है। अंदर आकर मानसी ने बेडरूम का सामान व्यवस्थित किया। बच्चों के कमरे में नज़र दौड़ाई तो वहाँ सब कुछ ज्यों का त्यों व्यवस्थित ही था। पहले वो बच्चों को हमेशा हिदायतें देती रहती थी कि बेटा अपना सामान सही ठिकाने पर रखना सीखो। साथ ही साथ सब सामान सम्भालते रहा करो। इससे तुम्हारे व्यक्तित्व में भी निखार आता है। तब बच्चे शैतानी में कभी करते तो कभी लापरवाह हो जाते। मानसी भी कभी गुस्साती और कभी मुस्कुराकर कहती थी ‘वक्त सब सीखा देगा तुम्हें।’ मानसी घर, बच्चे, सब की सेहत का ध्यान रखना ही अपना कार्यक्षेत्र मानती थी। पूजा पाठ में मानसी का कम ही ध्यान लगता था। उसका मानना था कि कर्म करना ही इंसान का परम धर्म है। हमेशा व्यस्त रहना पसंद करने वाली मानसी व्यस्तता में ही मस्त रहती और यही मस्ती उसकी तंदुरुस्ती का भी राज थी।

घर के काम निपटाकर मानसी दोपहर को बारह-एक बजे खाली हो जाती। कुछ देर समाचार-पत्रों पर नज़र दौड़ाती और थोड़ा टीवी का भी आनंद ले लेती। उसके बाद फिर वही खालीपन उसको आ घेरता। दोपहर में सुस्ताने का भी मन अब मानसी का नहीं करता था। बस वो शाम का इंतज़ार करती कि कब आलोक आएँगे और वो इकट्ठे बैठेंगे। पर इस अलसाई दिनचर्या ने मानसी को तन-मन से बूढ़ा-सा करना शुरू कर दिया था। तभी घंटी की आवाज़ सुन मानसी ने दरवाजा खोला क्योंकि आलोक आ चुके थे। हंसकर आलोक का स्वागत कर उनके हाथ से टिफिन का बैग ले, वो किचन में चाय चढ़ाने आ गई।

“चाय तैयार है आलोक” मानसी ने पुकारा।

आलोक हाथ-मुँह धोकर रसोई में ही चाय पीने के लिए आ गए। चाय पीते उसने मानसी के चेहरे पर एक नज़र दौड़ाई और बोले, “आजकल बुझी-बुझी सी क्यों लगती हो?”

“नहीं तो, ऐसे ही लगा आपको।”, मानसी ने बिना नज़र ऊपर उठाए कहा।

“फिर तुम्हारे चेहरे और आँखों की चंचलता कहाँ गायब है?”

मानसी थोड़ा-सा हँसी और आलोक को देखते हुए बोली,

“हाँ, बूढ़ी हो चली हूँ ना।”

“इंसान बूढ़ा सिर्फ मन से हो सकता है, डियर! और अभी हमारे बूढ़ा होने में समय है।” दोनों हंस पड़ते हैं।

चाय की चुस्कियों के साथ मानसी ने कहा, “आजकल समय कटता ही नहीं। 24 घंटे बहुत लम्बे लगते हैं। पहले यही 24 घंटे कम पड़ा करते थे।”

“हूँ, तो कोई नौकरी ज्वॉइन कर लो।” आलोक ने सुझाव दिया।

“नौकरी?” मानसी ने हंसती आँखों से अलोक को देखा।

मानसी वैसे तो खूब पढ़ी-लिखी थी। शादी से पहले नौकरी भी की है उसने पर शादी के बाद उसने नौकरी और गृहस्थी में से गृहस्थी को प्रथम स्थान दिया। वैसे भी आलोक एक सफल बिजनेसमैन हैं। भगवान का दिया बहुत है। घर में नौकर चाकर भी है। तभी तो बच्चे अपनी काबिलियत और अपने पापा से आर्थिक सहायता लें, आज उच्च शिक्षा विदेश में पा रहे हैं।

“हाँ, तुम कहो तो तुम्हारी नौकरी के लिए कहीं प्रयास करूं?” आलोक ने पूछा।

चाय के खाली कप उठाते हुए मानसी बोली,

“मैं किसी आगंतुक प्रतिभागी की सीट क्यों छिन।”

“तो कोई किट्टी ही ज्वॉइन कर लो।” आलोक ने सुझाया।

“तुम्हारे साथ महीने की दो कपल किटी है तो।”

“पर तुम्हारा तो दिन का समय नहीं कटते बनता तो मैंने सुझाया कि दिन की लेडीज किटी ज्वॉइन कर लो।”

“लेडीज किटी का मन नहीं है, वहाँ ज्यादातर कपड़े गहनों के दिखावे का ही चलन रहता है।” मानसी ने थोड़ा मुँह बनाते हुए कहा।

इतने में आलोक का फोन खनखनाया। आलोक कॉल सुनते-सुनते कमरे में चले गए। मानसी रात के खाने की सुध लें उसमें लग गई और सोचने लगी कि आलोक तो समाज और सामाजिकता का आनंद ले लेते हैं। कारोबार के सिलसिले में वो शहर से बाहर भी जाते रहते हैं क्योंकि उनके कार्यक्षेत्र का कार्य तो ज्यों का त्यों ही है। पर मानसी के कार्यक्षेत्र की जिम्मेदारियां कम हो गई है।

रात का खाना निपटा सोने से पहले मानसी आलोक से बोली,

“चलो, बच्चों से ही मिल आए।”

“अगले महीने बच्चे आ तो रहे है।” आलोक करवट लेते हुए बोले।

“हूँ।” मानसी के मुँह से हल्का-सा स्वर निकला।

“अभी बच्चों को पढ़ाई में डिस्टर्ब करना ठीक नहीं।” आलोक ने कहा।

जब भी बच्चे छुट्टियों में घर आते है तो घर जैसे महकने लगता। रसोई में से हमेशा खुशबू उड़ती रहती। बच्चों से मिलने उनके दोस्त और सहेलियां भी आने लगते। मानसी के हाथ के पकवानों को खाकर खूब तारीफ भी करते। कभी जब मानसी थोड़ा सजी-संवरी तैयार मिलतीं तो उसकी खूबसूरती और फिटनेस पर थोड़ी-सी तारीफ़ भी करते। इन्हीं विचारों में खोयी मानसी नींद की आगोश में खो गई। अगली सुबह फिर वही दिनचर्या। एक ही ढर्रे पर चलती ज़िन्दगी।

एक शाम मानसी आंगन में रखे झूले पर बैठी, अपने मोबाइल पर यूं ही इधर-उधर की पोस्ट खंगाल रही थी। आसपास उड़ती चिड़ियों की नीड़ क्रीडा देख भावविभोर-सी मानसी सोचने लगी कि ये चिड़िया घोंसला बना, बच्चों को पाल, एक दिन उड़ा देंगी। मेरे घोंसलें के बच्चे भी दुनियादारी सीखने, अपने पंखों को पसारने उड़ चुके हैं। तभी ऊपर से एक खिलौना उसके पास आकर गिरा। कटघरे से पांच छः साल की बच्ची खिलौना नीचे गिरा देख, दौड़कर नीचे आ गई।

‘रूहानी’, ऊपर की मंजिल पर रहने आए, एक छोटे से परिवार की बेटी। बहुत ही प्यारी और नटखट। उसका एक छोटा-सा भाई भी है, रोहन। जिसे प्यार से ये लोग ‘रोहू’ कहते हैं। कुछ समय पहले ही मानसी और आलोक ने इन लोगों को अपने यहाँ किराये पर एक कमरा दिया है। छोटे बच्चों की खिलखिलाहट से घर में थोड़ी रौनक भी महसूस होती है और अगर मानसी और आलोक शहर से बाहर कहीं जाते हैं तो घर भी सुरक्षित रहता है।

खिलौना उठाकर रूहानी ने मानसी को नमस्ते की।

“नमस्ते बेटा, कैसे हो आप?”

“मैं ठीक हूँ आप कैसे हो आंटी?” बच्ची ने चहकते हुए पूछा।

“मैं भी ठीक हूँ बेटा।” मानसी ने बच्ची को पास बुलाते हुए कहा। मानसी उस बच्ची से बात करना चाह रही थी। उसने बच्ची को अपने साथ झूले पर बिठा लिया।

“कौन-सी क्लास में पढ़ते हो आप?” मानसी ने प्यार से पूछा।

“एल. के. जी.”

“अच्छा! तो मुझे वन टू सुनाओगी?”

बच्ची ने वन, टू, थ्री, फोर, गिनना शुरू कर दिया। 20 तक सब सुनाया। पर 13 से 19 तक की स्पष्टता में कमी थी। उसी तरह ‘ए टू जेड’ के भी कुछ एक एल्फाबेट्स में कन्फ्यूजन थी। मानसी ने बच्ची को ठीक से सब बुलवाया तो बच्ची भी बहुत ध्यान से सीखने की उत्सुक दिखी।

“वेरी गुड! आप तो बहुत इंटेलीजेंट हो!” मानसी ने प्यार से बच्ची को सहलाया।

“आंटी! भैया और दीदी दूर बाहर पढ़ने गए है न?” बच्ची ने उत्सुकता से पूछा।

मानसी ने हाँ में सिर हिला दिया।

“मैं भी बड़ी होकर बाहर पढ़ने जाऊंगी।”

मानसी मंत्रमुग्ध-सी बच्ची की भोली-भाली बातें सुन रही थी। तभी बच्ची ने मानसी से कुछ पूछा तो मानसी कुछ क्षण चुप-सी सोचने लगी।

“आंटी, आप मुझे भी पढ़ा दोगे क्या? मम्मी ने मुझे बताया है कि भैया और दीदी को आप ही पढ़ाते थे।” बच्ची ने झूले को तेजी देने की चेष्टा से थोड़ा ज़ोर लगा खुद को हिलाना शुरू किया तो मानसी ने उसकी मंशा समझते हुए झूले की गति थोड़ी बढ़ाई।

“आप भी अपनी मम्मी से पढ़ते होंगे ना?” मानसी ने पूछा।

“मम्मी तो सारा दिन काम में ही लगी रहती है। रोहू भी मम्मी को बहुत तंग करता है। मैं जब भी पढ़ने बैठती हूँ तो वहीं आकर खेलता है और पता है आंटी! वो मेरी किताबें भी फाड़ देता है।” बच्ची ने मुँह मसोसते हुए कहा।

इतने में बच्ची को देखने उसकी माँ कटघरे पर आ पहुंची। बच्ची को आवाज़ लगा, उसने ऊपर आने की हिदायत दी। माँ को देखते ही बच्ची एकदम से झूले से उतरीं और माँ से पूछने लगी,

“मम्मी, मैं आंटी जी से पढ़ लिया करूँ?”

“बेटा, आंटी को तंग मत करो। चलो ऊपर।” बच्ची की माँ ने कहा।

“नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं है।” मानसी जल्दी से बोली। बहुत प्यारी बच्ची है आपकी। पढ़ने की भी शौकीन हैं। अगर आप ठीक समझे तो इसे पढ़ने मेरे पास भेज दिया करें।”

यह बात सुनकर बच्ची की माँ भी जैसे चहक उठी।

“जैसा आप ठीक समझे।”

“तो ठीक, कल से आप दोपहर में इसे मेरे पास भेज दिया करें।”

बच्ची हँसी-खुशी वापस छत पर चली गई। मानसी एक नई उमंग की किरण से प्रफुल्लित हो शाम की चाय बनाने रसोई में आ गई। रसोई में आकर उसने रेडियो चलाया तो संयोगवश गाना बज रहा था।

“आज फिर जीने की तमन्ना है।”

अगले दिन मानसी जल्दी-जल्दी काम निपटा बच्ची को बुला लाई। पढ़ने की चाहत और पढ़ाने में मिलने वाली राहत से दोनों के चेहरे नई ही उमंग से प्रज्वलित थे। अब मानसी फिर से मस्त, व्यस्त और तंदुरुस्त दिखने लगी थी। उसकी दिनचर्या में घड़ी की सुइयों की महत्ता दिखने लगी थी। आलोक भी मानसी को खुश देख राहत महसूस कर रहे थे और मानसी उस नन्ही बच्ची में अपने बच्चों का बचपन दोबारा जी पा रही थी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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