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मनन की तितली-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां गुजरात: Balman ki Kahaniyan
Mannan ki Titli

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Balman ki Kahaniyan: एक था मनन। मनन को तितलियाँ अच्छी लगती थी।

छुट्टी के दिन रंग-बिरंगी तितलियाँ देखने मनन बाग में जाता था।

एक दिन दीदी ने उसे कहा, “मनन, जरा अपना रूमाल तो दे। मैं उस पर एक प्यारी-सी तितली बनाकर दूँ।”

“थैक्यू दीदी! “कहकर मनन ने दीदी को अपना रूमाल दिया। दीदी कढ़ाई और कशीदाकारी में होशियार थी। उसने सुई और धागा लेकर रेशमी धागे से छोटी-सी लेकिन प्यारी-सी तितली बनाकर दी। मनन तितली देखकर उछलने लगा।

इतने में स्कूल की बस आ गई। मनन ने अपना बस्ता उठाया और बस में जा बैठा। बस चलने लगी, तब कुछ बच्चों का ध्यान मनन के रूमाल की ओर गया। सब मनन के रूमाल पर बनाई गई तितली की प्रशंसा करने लगे। वह स्कूल का आखरी दिन था। दूसरे दिन से दिवाली की छुट्टियाँ होने वाली थी। इस कारण सभी बच्चे उत्साह में थे।

अचानक मनन की दष्टि रूमाल पर पडी। “अरे! रूमाल पर बनी हई तितली कहाँ गई? “उसने खुशबू की ओर देखा। खुशबू हँस रही थी। मेरी, मीना, जरीना भी हँस रहीं थीं। मनन ने देखा कि तितली खुश्बू के फ्रॉक पर जा बैठी थी। शीघ्र ही वह वहाँ से उठी और उड़ने लगी। अब वह स्वीटी के बस्ते पर जा बैठी थी। फिर वहाँ से उड़कर वह कोमल के सिर पर जा बैठी। बस के सभी बच्चे तालियाँ बजाकर ‘वाह, वाह’ करने लगे। तितली उड़ी और बस में सब जगह फिरने लगी। ड्राईवर ने बस चलाते-चलाते छोटे आईने में देखा। अरे! टोपी पर तितली! ड्राइवर उमंग में आ गया। उसने सिटी बजाई। हाथ से तितली को छूने की कोशिश की। तब बच्चों ने फिर तालियाँ बजाई।

कुछ ही देर में बस स्कूल के अहाते में आ रूकी। बच्चे अपना-अपना बस्ता लेकर जल्दी से नीचे उतरने लगे। मनन ने अपने रूमाल की ओर देखा। अरे! तितली तो पता नहीं कब उसके रूमाल पर वापस आ गई थी। स्कूल की सीढ़ियाँ चढ़कर मनन आगे बढ़ने लगा। प्रधानाचार्य के दफ्तर तक पहुँचा। दरवाजे पर चपरासी खड़ा था। मनन की तितली फिर इधर-उधर उड़ने लगी। चपरासी ने तितली देखी तो उछल पड़ा। उसने उत्साह में आकर तितली को पकड़ने की कोशिश की। तितली जहाँ जाती, चपरासी उसके पीछे-पीछे दौड़ता। चपरासी का सारा ध्यान तितली पर था। बस वाले सभी बच्चे रूक गए। चपरासी की नजर बचाकर तितली कब गायब हो गई, उसका उसे पता ही नहीं चला। तितली अब प्रधानाचार्या के दफ्तर में पहुँच गई थी।

मनन घबरा गया। अब क्या होगा? प्रधानाचार्य साहब तो कठोर स्वभाव के हैं। जरूर डाँट खानी पड़ेगी। मनन तितली के पीछे दफ्तर की ओर दौड़ा। लेकिन उससे पहले ही तितली दफ्तर की खिड़की से बाहर निकल गई थी। उड़ते-उड़ते वह फिर आकर मनन के रूमाल पर बैठ गई। मनन ने ठंडी साँस ली। वह तितली के पंखों को सहलाने लगा। चपरासी आकर वहाँ पहुँचे, उससे पहले वह अपनी क्लास में आ गया। क्लास में सभी बच्चों की दृष्टि मनन की तितली पर पड़ी। टीचर बोर्ड पर कुछ लिख रही थीं लेकिन किसी का भी ध्यान उनकी ओर नहीं था। मनन सोचने लगा, “यह तितली बड़ी शरारती लगती है, यहाँ क्लास में वह चुप बैठे तो ठीक है वरना…” वह सोच ही रहा था तब तितली फिर उड़ी। क्लास में यहाँ-वहाँ मंडराने लगी एक कोने से दूसरे कोने तक… एक दीवार से दूसरी दीवार तक। सबका ध्यान तितली की ओर था। तितली उड़कर छत में लटके पंखे तक पहुंच गई। ‘अब क्या होगा?’ मनन को पसीना आने लगा क्योंकि कुछ दिन पहले ही एक कबूतर क्लास में घुस आया था, तब वह पंखे में फंस गया था और घायल होकर नीचे गिर गया था।

लेकिन यह तितली बड़ी चालाक थी। पंखे से दूर भागती खिड़की की ओर जाने लगी। खिड़की से निकलकर बाग में पहुंच गई। मनन ने सोचा, “बाग में उसे रंग-बिरंगे फूल पसंद आ गए तो वह वापस ही नहीं आएगी। क्या किया जाए? “वह बैंच से उठने ही वाला था। तब तितली फिर आकर मनन के रूमाल पर बैठ गई। कुछ देर रूमाल पर विराम किया और फिर भाग खड़ी हुई। इस बीच टीचर बच्चों को लिखने का काम देकर स्वयं चुपचाप बैठ गई थीं। तितली जाकर उनके बालों पर बैठ गई। टीचर ने आश्चर्य से उसे देखा और कुर्सी से उठ खड़ी हुई। बच्चे हँसने लगें और तालियाँ बजाने लगे। टीचरजी को भी हँसी आ गई। उन्होंने तितली को पकड़ने के लिए हाथ ऊँचा किया लेकिन तितली उनके हाथ न आई। वह उड़ गई। किसी समय टेबल पर तो किसी समय किसी बच्चे की पुस्तक पर, किसी के सिर पर तो किसी समय टीचरजी के पास पहुँच जाती। आखिर में वह थककर मनन के पास वापस आ गई और रूमाल पर शांति से बैठ गई।

उसी समय चपरासी आया और मनन से कहा कि उसे प्रिन्सिपाल साहब ने बुलाया है।

मनन के होश उड़ गए। डर के मारे टीचरजी की ओर देखा। उन्होंने जाने का इशारा किया। मनन का मुँह उतर गया। क्लास के सभी बच्चे जो कुछ समय पूर्व ठहाका लगा रहे थे। वे शांत हो गए। मनन उठा, चपरासी के पीछे-पीछे चलने लगा। क्लास से निकलकर वह प्रधानाचार्य के दफ्तर में पहुँचा। वह डर के मारे काँप रहा था। मुँह लटकाकर वह प्रधानाचार्य साहब के आगे खड़ा हो गया। उस समय साहब की आवाज सुनाई दी, “बेटे, यहाँ आ, मेरे पास!”

मनन चुपचाप प्रधानाचार्य साहब की ओर बढ़ा। साहब की दृष्टि मनन के रूमाल पर थी। उन्होंने पूछा, “यह तितली?”

ठीक उसी समय तितली उड़ने लगी। जाकर प्रधानाचार्य साहब के कोट पर बैठ गई। साहब को हँसी आ गई। उन्होंने तितली को छूने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। लेकिन तितली कहाँ किसी के हाथ आने वाली थी! वह तो उड़कर फिर रूमाल पर बैठ गई। साहब हँसने लगे। कहा, “ऐसी प्यारी तितली मैंने आज तक नहीं देखी। किसने बनाई है?”

“मेरी दीदी ने…” मनन ने धीरे से उत्तर दिया।

“बहुत सुंदर लग रही है। “कहकर साहब ने मनन को पास बुलाया। उसके सिर पर हाथ रखकर कहा, “लगता है तुम्हारी दीदी कढ़ाई-बुनाई में निपुण है। वह क्या करती है?”

“दीदी तो…” वह आगे बोल नहीं पाया।

“तुम्हारी दीदी क्या करती है? हम उन्हें इनाम देना चाहते हैं।”

“दीदी तो…बहुत छोटी थी तब से…चल नहीं सकती। उन्हें लकवा…” मनन की आवाज रोने जैसी हो गई।

प्रधानाचार्य साहब आगे कुछ कहे, उससे पहले तितली फिर उड़ने लगी। वह टेबल पर जा बैठी। टेबल से गुलदस्ते पर। उसके बाद फिर मनन के रूमाल पर। प्रधानाचार्य साहब का ध्यान तितली पर था। उन्होंने हँसते-हँसते टेबल पर रखे गुलदस्ते में से सबसे सुंदर गुलाब का फूल निकाला और मनन के हाथों में दिया। कहा, “यह लो… तुम्हारी दीदी के लिए। इसे हमारी ओर से इनाम समझो। उन्हें यह देते हुए कहना है कि उनकी तितली हमें बेहद पसंद आई है।”

गुलाब का फूल हाथ में लेकर मनन दौड़ाकर क्लास में जा पहुँचा। मनन को यों हँसते हुए आते देखकर और उसके हाथ में गुलाब का फूल देखकर बच्चे प्रसन्न हुए। सबको प्रसन्न देखकर तितली भी मस्ती में आ गई और इधर-उधर मंडराने लगी। बच्चों ने हर्ष के साथ तालियाँ बजाई।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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