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अधूरे ख्वाब-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां मध्यप्रदेश: Father and Daughter Story
Adhure Khwaab

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Father and Daughter Story: सुलेखा हां यही तो नाम था उसका, बदनसीबी और इसकी जैसे पुरानी पहचान थी। जो जिंदगी के हर मोड़ पर जैसे अपनी बाहें फैलाए इसके स्वागत को आतुर ही रहती।

जब इसका जन्म हुआ तो इसकी माँ को छोड़ पूरे परिवार में किसी को कोई खुशी नहीं हुई। क्योंकि इस सदी में भी कुछ परिवार ऐसे हैं जिनका अब भी मानना है कि वंश तो लड़के ही चलाते हैं लड़कियां नहीं।

फिर जन्म के कुछ साल बाद परिवार ने तो इस मासूम को स्वीकार कर लिया। पर उसके पिता उसके जन्म के बाद ना तो कभी उसकी माँ को माफ कर पाए और ना ही सुलेखा को एक पिता का दुलार ही दे पाए. क्योंकि सुलेखा की डिलिवरी सिजेरियन थी और उसमें हुए कॉम्प्लिकेशन के बाद डॉक्टरों ने सुलेखा के माता-पिता को अब और बच्चा नहीं करने के लिए सख्त हिदायत दे दी थी। क्योंकि उससे माँ की जान को खतरा था। इसके बाद जब भी सुलेखा अपने पिता के पास जाकर उनकी गोद में बैठने की कोशिश करती या अपनी बाल अठखेलियाँ दिखा, उन्हें रिझाने की कोशिश करती। तब वो कोई-न-कोई बहाना बनाकर उसे अपने से दूर कर देते।

अपने पिता का यह रूखा व्यवहार मासूम सुलेखा को बड़ा खटकता और वह कई बार अपनी माँ से, इसका कारण जानने की कोशिश भी करती। पर मजबूर माँ उसे हर बार बहला कर शांत कर देती।

समय यूँ ही बीतता चला गया और सुलेखा भी अब बड़ी हो चुकी थी। जब उसकी शादी हुई तो उसने सोचा कि यहां मायके में अपने पिता के जिस दलार से उसका बचपन रीता रह गया था. शायद वहां ससराल में उसे वह स्नेह मिल जाए। तब भला वो कहाँ जानती थी कि जिंदगी के हर मोड़ पर मिलने वाली बदनसीबी एक बार फिर उससे रूबरू होने को थी और शादी के कुछ ही साल बाद उसका पति एक सड़क दुर्घटना में मारा गया और अभागी सुलेखा एक बार फिर अपने भाग्य को कोसने के अलावा कुछ ना कर सकी। क्योंकि नियति के आगे यहां भला किसकी चली है जो इस बेचारी की चलती।

उसे उसकी किस्मत के दिए इस छलावे ने मानो एक बार फिर अंदर तक झकझोर दिया था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, अपने पति से उसकी निशानी के रूप में मिली इस नन्हीं-सी जान, अपनी मासूम बेटी को लेकर वो अब कहाँ जाए। अपने चारों ओर पसरे निराशा के इस घोर अंधेरे ने उसे घेर लिया था कि तभी कॉलेज में उसके साथ ही पढ़ने वाला लड़का अनमोल, जैसे उम्मीद की एक नई किरण के रूप में उसके जीवन में आया। और उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाने व उसकी बच्ची को अपना नाम देने का वचन देकर उसके मन की इस उलझन को सुलझा दिया।

सुलेखा ने अभी-अभी अपना अतीत भूलकर, अनमोल की हमकदम बन, जिंदगी के इस नए सफर पर कछ कदम बढाए ही थे कि आज फिर अनमोल के इस अजीब प्रश्न ने उसे फिर दुविधा में डाल दिया। आज सुबह जब वह अनमोल को चाय का कप थमा रही थी। तब उसके चेहरे को घूरते हुए, वह उससे बोला, “सुनो सुलू जब मैंने तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था, तभी इस बच्ची को भी दिल से अपनी बेटी ही माना था। पर पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ, यह बच्ची जब-जब भी मेरे करीब होती है, तुम या तो सामने से या फिर किसी आड़ से हम पर अपनी पैनी नजरें जमाए रहती हो। अरे भाई अब मैं उसका पिता हूँ, जिस तरह मेरे समूचे स्नेह पर उसका हक है। उसी तरह उसकी भोली-भाली बात सुन, अपने मन को हर्षित कर ऑफिस के कामकाज की थकान को कम करने का मुझे भी अधिकार है कि नहीं?”

इस पर फिर एक बार, सुलेखा अपने पति के सामने बुत बनी खड़ी थी। उसकी यह खामोशी देख अनमोल फिर बोला, “सच-सच बताओ सुलू शादी के इतने साल बाद भी क्या तुम मुझे परख नहीं पाई हो। क्या तुम्हें अब भी लगता है कि मैं अपनी इस मासूम बच्ची के साथ सौतेला व्यवहार कर सकता हूँ?”

आज अपने पति के मुंह से निकले इस अकल्पनीय प्रश्न को सुन सुलेखा कांप उठी और थर्राते होंठो से बोली, “नहीं अनमोल ऐसा कुछ भी नहीं है। बल्कि तुम तो मेरी नजर में एक सामान्य इंसान से कहीं ऊपर उसी पल हो गए थे, जब मेरे पहले पति के गुजरने के बाद, तुमने लोगों की परवाह किये बगैर मुझे अपनाकर, इस बच्ची के सर पर भी अपना स्नेहभरा हाथ रख दिया था। अब तो स्वयं ईश्वर भी आकर मुझसे यह सब कहें, जो आज तुमने कहा है तो शायद मैं यकीन ना करूं।”

तो फिर तुम ही बताओ सुलू, तुम्हारा आखिर मुझ पर यूँ नजरे जमाए रखने का क्या कारण है।” पति ने अपने प्रश्न को पुनः दोहराया।

तब कुछ देर की खामोशी के बाद एक गहरी सांस छोड़ते हुए वह बोली, “तो सुनो अनमोल तुम्हें यह तो पता ही है कि मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान हूँ। जब मेरा जन्म होने को था, तब मेरे पिता की दिली तमन्ना थी कि मेरी माँ एक लड़के को जन्म दे। पर शायद ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था और उन्हें संतान रूप में एक लड़की यानी कि मैं प्राप्त हुई। तब मुझे माँ और सारे परिवार ने तो सहर्ष स्वीकार कर लिया, पर मेरे पापा मुझे कभी अपना ही नहीं पाए और मेरा सारा बचपन अपने पिता के उस स्नेह से रीता ही गुजर गया। इसलिए आज तुम्हें जब हमारी बच्ची पर अपना सारा स्नेह लुटाते हुए देखती हूँ, तो मंत्रमुग्ध-सी हो जाती हूँ, क्योंकि पिता का वह स्नेह आज भी मेरे लिए उस अधूरे ख्वाब जैसा है जिसे मैं चाहकर भी कभी पूरा ना कर सकी।” और इतना कहते हुए उसकी आवाज रुंध गई। और वह सुबकते हुए अपने पति के गले जा लगी। अपनी पत्नी की पीठ को सहलाते हुए, अब अनमोल की आंखे भी पश्चाताप में नम थीं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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