जिं दगी के एक पड़ाव पर आकर जैसे जिंदगी थम सी जाती है। बच्चे अपने करियर बनाने में रम जाते हैं और पति अपने व्यवसाय में। इस उम्र में आकर महिलाएं जिंदगी में सूनापन और खालीपन महसूस करने लगती हैं। कुछ तो वहीं कुछ रोजमर्रा के काम में बंध कर बोर होने लगती है। इस उम्र में शारीरिक तकलीफ भी उभरने लगती हैं और खालीपन उस तकलीफ को बढ़ा देता है, जिससे वह अक्सर डिप्रेशन के साथ अन्य कई बीमारियों की शिकार हो जाती हैं। क्यों ना इस वक्त को कोई सही दिशा दिखाकर जिंदगी के माने बदले जाएं और इस खालीपन को भरकर एक नई मिसाल कायम की जाए, जो कई महिलाओं के लिए दिशा-निर्देश साबित हो सके। इस आयुवर्ग, यानी 40-50 वर्ष की महिलाओं को अपनी जिंदगी की दूसरी पारी खेलने की जरूरत है। जो शौक बच्चों की परवरिश में कहीं खो गए थे या दब गए थे, उन्हें बाहर निकालने का वक्त है। जो प्रौढ़ महिलाओं को अपने जिंदगी के इस दौर में सहायक साबित होते हैं। अपने-आपको किसी शौक में बांधकर यह महिलाएं ना सिर्फ अतिरिक्त आय कर सकती हैं, बल्कि अपनी एक अलग पहचान भी बना सकती हैं।