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गृहलक्ष्मी कहानी

अपने बिजनेस को लेकर वह पागल हुआ फिरता था। वह मुझे प्यार करता था, या फिर अपने काम को। पर निर्मल… मैं अपना झूठ कब तक छिपा सकती थी? विवाह के तीन महीनों बाद भी जब मैं उम्मीद पर न हुई तो मेरी परेशानी बढऩे लग पड़ी। मैं अपने झूठ को कैसे छिपाती। मैंने एक दिन रवीन्द्र से सबकुछ सच सच बता दिया। मैंने यह झूठ सिफऱ् रवीन्द्र को हासिल करने के लिए बोला था। मैं उससे बेइंतहा मुहब्बत करती थी। पर रवीन्द्र इस सच को जानने के बाद मेरे साथ कभी हंसकर नहीं बोला। वह जैसे खामोशी के गहरे कुओं में गुम होता चला गया था। वह बहुत कम मतलब की बात ही मेरे साथ करता। उसने अपने आप को और अधिक अपने काम और बिजनेस में झोंक दिया। एक वर्ष बीता, दूसरा बीता और फिर तीसरा… चौथा और मैं मां बनने को तरस गई। डॉक्टरों को दिखलाया तो उन्होंने जो जवाब दिया, वह मेरे लिए ऐसे था जैसे मेरे कानों में किसी ने गरम पिघलता हुआ शीशा डाल दिया हो। मैं जि़ंदगी में कभी मां नहीं बन सकती थी।

दु:ख का एक विशाल पहाड़ जैसे मेरी ख्वाहिशों पर अचानक आ गिरा था। सारी चाहतें, सारे सपने उसके नीचे दबकर, कुचलकर दम तोड़ रहे थे और मैं बेबस देख रही थी। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। न खाने को, न पीने को, न पहनने को। रात रातभर मैं जागती रहती। मुझे अपनी जि़ंदगी में अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देता था। काला… स्याह अंधेरा… रोशनी की हर किरण को लीलता हुआ। एक दिन मुझे खबर मिली कि पुत्र की चाह में मेरी बड़ी बहन के यहां तीसरी कन्या ने जन्म लिया था। 

एक दिन रवीन्द्र और मैंने आपस में सलाह-मशवरा किया और मैं अपनी बहन की छह महीने की बेटी अपने घर ले आई। रवीन्द्र ने उसका नाम रखा- श्वेता। श्वेता के आ जाने के बाद मेरे अंदर की मां जैसे जीवित हो उठी। हमने श्वेता को पाला, पोसा, पढ़ाया और योग्य बनाया। जब वह ब्याहने योग्य हुई तो रवीन्द्र ने कहा, ‘हम अपनी बेटी का विवाह उसके संग करेंगे जो घर-दामाद बनने को तैयार होगा। हमें वर खोजने में कोई अधिक परेशानी नहीं हुई। रवीन्द्र का फलता-फूलता बिजनेस था, हमारी बेटी पढ़ी-लिखी और सुन्दर थी। 

हमने उसका विवाह कर दिया। लड़का हमारे घर पर ही रहने लगा। रवीन्द्र के साथ बिजनेस में हाथ भी बंटाने लग पड़ा। और फिर एक दिन मेरी जि़ंदगी में फिर से अंधेरा छा गया। एक दिन काम करते समय रवीन्द्र की छाती में ऐसा दर्द उठा कि वह वहीं का वहीं ढेरी हो गया। उसको हार्ट-अटैक पड़ा था। फिर इसके बाद की कहानी मैं निर्मल तुम्हें क्या बताऊं… जिसे मैंने अपनी बेटी समझकर पाला, उसने मुझे मां कहना तो एक तरफ, मां समझना भी बंद कर दिया। मां जी, मां जी करते दामाद ने भी रंग बदल लिए। दोनों ने रवीन्द्र का सारा बिजनेस अपने हाथों में ले लिया। एक फ्लैट और थोड़ीसी प्रॉपटी मेरे नाम छोड़कर उन्होंने सबकुछ बेच दिया और स्टेट्स चले गए। कई वर्ष हो गए हैं अब तो उन्हें गए हुए। कभी कोई फोन नहीं, कोई चिट्ठी नहीं। मैं हूं और बस, मेरा अकेलापन है। कभी-कभी मैं सोचती हूं कि दूसरों से चीज़ें छीन लेने वाली मैं आज अपना सबकुछ गवां चुकी हूं। निर्मल… जब मैंने रवीन्द्र को तेरे से छीना था तो सोचा था कि मैं जीत गई और तू हार गई। पर मुझे लगता है, मैं जीतकर भी जीती नहीं थी, और तू हारकर भी हारी नहीं थी। रवीन्द्र ने तुझे कभी अपने दिल से भुलाया नहीं था। वह बेशक मेरे साथ था, दुनियादारी के लिए मुझसे प्यार करता था, पर दिल से तेरे पास था, तुझे ही प्यार करता था। कई बार मुझे प्यार करते करते मेरा नाम भूल जाता था और ‘निर्मल… निर्मल… कहने लग पड़ता था। उन्हीं क्षणों में मुझे लगता था, वह मुझे नहीं, मेरे जरिये तुझे अपनी बांहों में कस रहा है… तुझे प्यार कर रहा है। 

सच, निर्मल, वह मेरा कभी हुआ ही नहीं। वह तो तेरा था जिसको मैंने झूठ का सहारा लेकर तुझसे छीन लिया था। अगर मुझे माफी के योग्य समझो तो मुझे माफ कर देना, निर्मल… तेरी सखी- रंजना। निर्मल के हाथों में खत अभी भी झूल रहा है… उसके हाथ कांप रहे हैं… उसने खत को पहले अपने होंठों से लगाया और फिर छाती से चिपकाॉ लिया है। उसको ऐसा लगता है मानो उसने खत को नहीं, रंजना को अपनी छाती से लगा रखा है… उसकी आंखों से दो मोती गिरते हैं और खत के पन्ने उन मोतियों को अपने में जज़्ब कर लेते हैं।

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