………….‘लेकिन इस प्रकार तो यह अधिक अच्छी लग रही है।’ अचानक राजेश ने कहा।

 ‘इस प्रकार?’

 ‘हां-हां और क्या?’ राजेश ने मूर्ति हाथ में ले ली। ऊपर-नीचे करता हुआ बोला‒‘इसी को तो मॉडर्न आर्ट कहते हैं, विदेश में तो इन मूर्तियों का मूल्य काफी अधिक दिया जाता है।’

 ‘विदेश में?’ बाबा ने उसे आश्चर्य से देखा। राधा भी चकित थी।

 ‘हां-हां, और क्या? मैं इस मूर्ति को इसी प्रकार ख़रीदूंगा। कितने पैसे दे दूं?’ राजेश ने कहा।

 ‘पैसे?’

 ‘पैसे नहीं रुपए, मेरा मतलब रुपयों से है।’ राजेश ने उनकी चिंता दूर की, ‘दो सौ रुपए ठीक होंगे इसके लिए?’

 ‘दो सौ रुपए!’ बाबा इतनी बड़ी रकम का नाम सुनकर अवाक् रह गया।

 ‘अच्छा तीन सौ रुपए ले लो।’ राजेश ने बिना एक पल गंवाए कहा।

 ‘तीन सौ रुपए?’ राधा को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ।

 ‘अच्छा बाबा, यह लो पांच सौ रुपए’ ‒ राजेश ने झट अपने कोट की बगल से सौ-सौ के पांच नोट इस प्रकार निकाले, जैसे वह पहले से इन्हें देने को अलग रख चुका था, ‘अब और इससे अधिक पैसे नहीं मांगना, बस।’ और फिर राजेश ने पांचों नोट जबरदस्ती बाबा के हाथों में थमा दिए।

 बाबा फटी-फटी आंखों से राजेश को देखता ही रह गया। राधा को अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। इससे पहले रामगढ़ में उसके बाबा ने जाने कितनी मूर्तियां बनाई थीं, छोटी-बड़ी, अच्छी और काफी अच्छी, परंतु आज तक किसी ने दस रुपए से अधिक मूल्य दिया ही नहीं था। वह आश्चर्य में पड़ गई। बाबा के हाथ में नोट बुरी तरह कांप रहे थे।

 राजेश ने इन दोनों की यह अवस्था देखी तो अपनी ज़ल्दबाज़ी पर उसे घबराहट हुई। कहीं इन दोनों को उस पर किसी प्रकार का संदेह न हो जाए। उसने झट कहा‒‘यदि आप लोगों को एतराज़ न हो, तो मैं इसे दुगने दाम पर बेच दूंगा।’

 ‘दुगने दाम पर…अर्थात्…’ बाबा की जुबान लड़खड़ा गई।

 ‘एक हज़ार रुपए में एक मूर्ति! यह मूर्ति!’ बाबा को विश्वास ही नहीं हुआ।

 ‘जी हां!’ राजेश ने अपनी बातों से उन्हें प्रभावित प्रतीत किया तो बात जारी रखी, ‘मेरा धंधा ही मूर्तियां ख़रीदने का है, मैं भारत से मूर्तियां ख़रीदकर विदेश ले जाता हूं। वहां मुझे कभी-कभी तो पांच-पांच गुना लाभ हो जाता है।’

 ‘पांच गुना?’

 ‘हां और क्या?’ राजेश ने कहा‒‘बस अब तुम जल्दी-जल्दी मूर्तियां बनाना आरंभ करो और मैं सप्ताह में एक दिन आकर सारी-की-सारी मूर्तियां ले जाया करूंगा।’

 बाबा तब भी कुछ नहीं बोला। अवाक्।

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राधा भी उसी प्रकार बच्चे को गोद में लिए चकित खड़ी थी।

 ‘आज से मैं आपका ग्राहक हूं।’ राजेश ने दूसरी जेब से सौ रुपए का एक नोट फिर निकालते हुए कहा‒‘इसलिए मेरी ओर से इस बच्चे के लिए यह छोटी-सी भेंट स्वीकार कीजिए राधा देवी!’

 ‘राधा देवी!’ राधा चौंकी। ‘आपको कैसे पता चला कि मेरा नाम राधा है?’ उसने तुरंत पूछा।

 राजेश अपनी गलती पर चौंका। परंतु फिर बोला‒‘क्यों? क्या फादर जोजफ मुझे नहीं बता सकते कि बाबा हरिदयाल मूर्तिकार के साथ उनकी बेटी भी है, जिसका नाम राधा है?’

 राधा की चिंता दूर हो गई। उसने बच्चे को देखा। उसके हाथ में डगमगाते नोट को देखकर वह लेने से इनकार नहीं कर सकी। प्रेम से दिया हुआ कांटों का उपहार भी फूलों से अधिक सुंदर और सुगंधित बन जाता है।

 राजेश ने आगे बढ़कर बच्चे के गाल छुए तो राधा के शरीर की भीनी-भीनी सुगंध उसके दिल के अंदर उतर गई। इससे पहले कि उसका दिल डगमगा जाए और वह खड़ा होकर राधा की समीपता प्राप्त करता रहे और फिर उसकी वास्तविकता खुल जाए, उसने अपने को संभाला। ऐसा न हो कि बना-बनाया खेल बिगड़ जाए, उसके जीने का सहारा छिन जाए, वह वहां से हट गया। दूसरे कमरे से उसने अपनी टोपी उठाई और आंगन का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया।

 राधा और बाबा उसी प्रकार स्तब्ध खड़े देखते रहे।

 कच्ची सड़क पार करके राजेश काफी आगे पहुंचा तो एक ख़ूबसूरत लंबी सफ़ेद कार उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। कार की नंबर प्लेट पर लिखा था‒रामगढ़ स्टेट। उसने अपनी आंखों में दुबारा आए आंसू पोंछे और कार के अंदर प्रविष्ट हो गया। ये आंसू ख़ुशी की एक किरण पाकर ही छलक आए थे।

 एक सप्ताह बीत गया। पिछले तीन दिन वर्षा की ख़ूब तेज़ झड़ी लगी रही। आज जाकर धूप निकली थी, परंतु सर्दी का मौसम शुरू हो चुका था, इसलिए सुबह की धूप अच्छी लग रही थी।

 राजेश से सब्र करना कठिन हो गया था। एक हफ्ते बाद वह फिर राधा के द्वार पर जा पहुंचा। उसने अपनी टोपी ठीक की, फिर कुंडी खटखटाई। दरवाज़ा खुलने की प्रतीक्षा करते हुए उसने समीप की कच्ची मिट्टीदार सड़क पर नज़र डाली, जो नगर महापालिका की लापरवाही के कारण कीचड़ से लथपथ और गंदी थी, बहुत कठिनाई से वह किनारे-किनारे चलकर यहां तक पहुंचा था। कार उसने पहले के समान ही दूर खड़ी कर दी थी।

 ‘कौन है?’ दरवाजे के अंदर से आवाज़ आई। आवाज़ राधा की थी, जिसे सुनकर राजेश की बेचैन धड़कनों को कुछ संतोष मिला।

 ‘मैं हूं‒राजेश, मूर्तियों का ख़रीददार।’ उसने अपने सिर की टोपी दुबारा ठीक करते हुए कहा, कुछ नीचे, मस्तक पर झुकाकर।

 दरवाज़ा खुला। सामने राधा खड़ी थी, दर्द और गम की तस्वीर बनी हुई, परंतु इस बार इस तस्वीर में एक नई परेशानी की झलक भी प्रकट हो रही थी, जिस पर वह काबू पाने का प्रयत्न कर रही थी।

 ‘नमस्ते राधा देवी!’ राजेश ने पहले ही हाथ जोड़कर मुस्कुराने का प्रयत्न किया।

 राधा ने उत्तर में हाथ जोड़ दिए। फिर गंभीर स्वर में बोली‒‘आइए।’

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………….. आंगन पार करके जब वह राधा के पीछे कमरे में पहुंचा तो उसने देखा आज इस घर की अवस्था कुछ बदली हुई है, इस कमरे में एक और खटिया है। लोहे की दो कुर्सी हैं। दीवार पर भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर फ्रेम की हुई टंगी है। घर काफी साफ़-सुथरा था। उसने दूसरे कमरे में झांका, सामने एक पालना था। शायद बच्चा सो रहा है। उसका मन हुआ वह उससे जाकर मिले, उसे गोद में उठाकर चूम ले, परंतु इस बार वह निश्चय करके आया था कि शीघ्रता से काम नहीं लेगा, वरना पिछली बार की तरह उसकी वास्तविकता पर संदेह होने की फिर संभावना हो सकती है।

 राधा ने कपड़े द्वारा एक कुर्सी झाड़ी, फिर उसकी ओर बढ़ा दी। टोपी उसने समीप की दूसरी कुर्सी पर रख दी।

 ‘कैसी हैं आप?’ उसने बात करने का ढंग निकाला।

 ‘आपकी कृपा है।’ राधा ने उत्तर दिया और फिर बोली‒‘आप बैठिए मैं बाबा को लेकर आती हूं।’

 राजेश नहीं चाहता था कि राधा इतनी जल्दी अपने बाबा को बुलाने चली जाए, परंतु उसे रोकना भी उसके बस की बात नहीं थी। वह कमरे से बाहर दूसरे दरवाजे से स्कूल के कम्पाउंड की ओर निकल गई, तो वह अपनी जगह से उठा। उसने पहले पालने से उठाकर बच्चे को चूमा। उसे ऊपर-नीचे उछाला, फिर उसके गाल पर अपना गाल सटाकर सिसक पड़ा, बहुत देर तक वह उसी प्रकार सिसकता रहा। फिर जब कदमों की चाप मिली तो बच्चे को पालने में लिटाकर उसने चश्मा आंखों से ऊपर करके अपने आंसू पोंछे और बहाने से कमरे में निगाह दौड़ाने लगा। पत्थर के चंद टुकड़े पड़े हुए थे‒कुछेक औजार इन्हें तोड़ने के लिए थे‒बस, और कुछ भी वहां नहीं था। आकर वह अपनी जगह पर पहले वाले कमरे में बैठ गया। तभी राधा ने अंदर प्रवेश किया। वह अकेली थी।

 ‘बाबा तो कहीं बाहर गए हैं।’ राधा ने अफसोस प्रकट किया।

 राजेश को जैसे मनचाही मुराद मिल गई। उसने अपने दिल की प्रसन्नता को छुपाकर कहा‒‘कोई बात नहीं, मैं उनकी प्रतीक्षा कर लूंगा।’

 राधा चुप रह गई।

 राजेश अपने चश्मे के अंदर से उसकी झुकी हुई दृष्टि देखता रहा। वह नंगे पैर थी, फर्श ईंट का था, फिर भी वह इसे पैर के अंगूठे द्वारा कुरेदने का प्रयत्न कर रही थी।

 ख़ामोशी‒बिलकुल ख़ामोशी थी और राधा सोच रही थी कि क्या बात करे? उसका बच्चा भी नहीं जाग रहा है, वरना उसे खिलाने के बहाने ही वहां से हट जाती। इतने बड़े आदमी के सामने कुर्सी पर बैठना भी तो अच्छी बात नहीं है।

 ‘पत्थर से कोई नारी बनी है?’

 आख़िर राजेश से ख़ामोशी सहन नहीं हो सकी तो उसने पूछ ही लिया।

 ‘जी!’ राधा अचानक चौंक पड़ी। चौंककर मानो उसने अपना ही दिल टटोलना चाहा।

 ‘मेरा मतलब कोई मूर्ति तैयार हुई?’

 ‘बाबा ने अब तक शुरू ही नहीं की।’ राधा की जान-में-जान आई।

 ‘क्यों?’………………………

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