गृहलक्ष्मी नोवेल

…………………. ‘महाराज!’ प्रताप सिंह के मुंह से चीख निकल गई, मानो वास्तव में उसके गाल पर राजा विजयभान सिंह ने एक जोरदार थप्पड़ मार दिया हो, उसके होंठ भिंच गए और मुट्ठियां कस गयीं।

राजा विजयभान सिंह ने झट पलटकर उसका सामना किया। फिर गंभीर तथा सख्त मुद्रा में बोले‒ ‘आइंदा विचार रहे, गांव की हर लड़की के पास मां, बहन, भाई, बाप कोई-न-कोई ऐसा अवश्य होता है, जिसके दिल पर ऐसी ही चोट लगती है, जिसका दर्द तुमने अभी-अभी महसूस किया है।’

प्रताप सिंह की मुट्ठियां ढीली पड़ गईं, चेहरा लज्जित होकर झुक गया।

‘तुम जा सकते हो।’ उन्होंने कहा और फिर भारी पगों से चलकर सोफे में धंस गए।

कुछ दिन और बीत गए। राजमहल में मानो मातम छा गया, न कोई प्रकाश, न जश्न, न कहकहे। राजा विजयभान सिंह ने शराब पीना भी कम कर दिया, शराब केवल उसी समय पीते, जब दिल का दर्द बहुत अधिक बढ़ने लगता, ऐसा लगता था मानो राधा का गम उनके अंदर नासूर बनकर रह गया है। ऐसी टीस उठती कि वह कमरा बंद करके चुपचाप तड़प उठते, राधा की तस्वीर उनके दिल के अंदर पक्के रंग की समा गहरी होती चली गई थी।

राधा के विचार से वह जितना दूर रहना चाहते, वह उतना ही समीप प्रतीत होती। उसकी बड़ी-बड़ी काली पलकों में ठहरे हुए आंसू के पीछे उन्हें ऐसी तस्वीरें दिखाई देने लगतीं, जिनमें उनके जीवन के सारे पाप सम्मिलित होते और तब उन्हें समझ में नहीं आता कि वे क्या करें? फिर उनकी तन्हाई होती, खामोशी होती और खामोशी की इस आग को बुझाने के लिए उन्हें शराब के छींटों का सहारा लेना पड़ता। उनके अंदर की यह तबदीली गांव वालों के लिए आश्चर्यजनक बात थी। सिपाहियों में खुसर-फुसर आरम्भ हो गई थी कि महाराज पर किसी चुड़ैल का साया पड़ गया है।

एक दिन सुबह का समय था। धूप छिटक आई थी, बसंत ऋतु होने के कारण हवाएं अच्छी लग रही थीं। अपने रेशमी कुर्ते-पायजामे में वह लॉन में निकल आए, राजमहल का यह हरा-भरा लॉन बहुत सुगंधित था। चारदीवारी से कुछ हटकर मेहंदी की क्यारियां थीं, आगे-पीछे सभी जगह। इसके अंदर पौधों में रंगीन फलों पर तितलियां उड़ रही थीं। कुछेक छोटे पक्षी घास पर उतरकर कीड़े-मकोड़े चुग रहे थे। अशोक के वृक्ष की छांव में आरामकुर्सी रखी थी, वह इसी पर विराजमान हो गए।

एक सिपाही ने लपककर उनके कदमों तले तिपाई रख दी तो उन्होंने पैर फैला लिए, दूसरा नौकर अंदर से कुछ मैगजीन और ताजे समाचार-पत्र ले आया। एक बेंंत की मेज उनके समीप घसीटकर उन्हें उस पर रख दिया तो उन्होंने लापरवाही से गर्दन घुमाकर समाचार-पत्रों के बड़े-बड़े शब्द देखे। महात्मा गांधी की तस्वीर छपी थी, भारत अब स्वतंत्र होना ही चाहता था, परंतु उन्होंने अखबार नहीं उठाया। वह जानते थे हमारे देश के नेताओं की मेहनत बेकार नहीं जाएगी। अपने बाएं हाथ को गोद में रखकर वह दाहिने हाथ की अंगुलियों द्वारा चांदी की अंगूठी… फिर भी उनकी अंगुलियों में बाकी हीरे की अंगूठियों से अधिक मूल्य रखती थी। राधा के अंकित नाम को उन्होंने चूम लिया।

तभी प्रताप सिंह वहां आ पहुंचा। जब राजा विजयभान सिंह ने उसकी बहन की मांग करते हुए उसे चोट पहुंचाई थी, वह बहुत लज्जित था। उनसे आंखें मिलाकर बात करने में भी उसे संकोच होता था मानो उसने स्वयं ही अपनी बहन की भेंट देने का प्रयत्न किया था और वह इनकार कर गए हों। राजा विजयभान सिंह ने उसे कहा कि उसकी बहन उनकी बहन है, तो वह धरती में गड़ गया था। राजा विजयभान सिंह ने अपने कर्तव्य की पूर्ति हेतु इच्छा प्रकट करते हुए कहा कि अपनी बहन का विवाह इस इलाके में हम ऐसी शान से करेंगे कि संसार देखता रह जाएगा… लड़का जो भी हो, जैसा भी हो, परंतु चरित्र का अच्छा अवश्य होना चाहिए।

फिर वह अपनी दौलत के द्वारा उसकी तमाम कमियां पूरी कर देंगे। और तब प्रताप सिंह का दिल खुशी से झूम उठा था। मन चाहा था वह अपने राजा के पग चूम ले। रूपा!’ उसने अपनी बहन का नाम प्यार से लिया था, जिसका पूरा नाम रूपमती था। रूपा कितनी सौभाग्यवती है!’

‘महाराज!’ वह अदब से झुुककर बोला‒आप, कई दिन से राजमहल सूना पड़ा है। आपका मन भी ठीक नहीं रहता, इस बात से हमें ही नहीं सारी प्रजा को भी दुःख है।’

राज विजयभान सिंह ने अपनी दृष्टि ऊपर उठाई। उसकी चिंता की परवाह किए बिना उन्होंने पूछा‒ राधा का पता चला?’

‘जी हां, महाराज!’ प्रताप सिंह ने कहा‒’ सुना है कि कृष्णानगर के समीप वाले गांव में वह अपने बाबा के साथ एकांत में रह रही है।’

सुना है या देखा भी है?’

‘घबराइए नहीं महाराज! हम परसों स्वयं ही वहां जाकर इस बात का ठीक-ठीक पता लगाएंगे।’

‘परसों क्यों?’ राजा विजयभान सिंह ने उसे आश्चर्य से देखा, ‘आज क्यों नहीं… और अभी क्यों नहीं?’

‘कल बेलापुर के चौधरी कपाल सिंह अपने परिवार सहित यहां पधार रहे हैं। आखिर उनके स्वागत की तैयारियां भी तो करनी है।’

‘प्रताप सिंह!’ राजा विजयभान सिंह अचानक ही खड़े हो गए, इस प्रकार मानो उसने कोई गलत बात कह दी हो।

‘एक लड़की के गम में आप अपना कर्तव्य भूल गए!’ प्रताप सिंह ने कहा‒ ‘कल सोलह तारीख है और अभी कुछ दिन पहले आप ही ने बेलापुर जाकर चौधरी कृपाल सिंह को अपने महल में आने का निमंत्रण दिया था, ताकि मंगनी की रस्म पूरी करके आपके माता-पिता की आत्माओं की चिंता का बोझ हल्का कर सकें।

हां !’ राजा विजयभान सिंह बहुत गंभीर मुद्रा में बोले‒ ‘परंतु तुम यह भूल गए कि उसी यात्रा से लौटते समय हमने पहली बार राधा को देखा था और उसी के बाद मेरा संसार बदल गया। मेरे विचारों, मेरे इरादों में परिवर्तन आ गया।’

‘मैं समझा नहीं महाराज! आप कहना क्या चाहते हैं?’ प्रताप सिंह ने आश्चर्य से पूछा।

‘अब यह मंगनी नहीं होगी।’ राजा विजयभान सिंह ने निश्चित रूप से कहा। ……………..

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