प्यार और सेक्स
प्यार और सेक्स को लेकर आज भी लोगों में अलग-अलग मत एवं धारणाएं हैं। कुछ लोग इन्हें दो अलग-अलग चीज मानते हैं तो कुछ लोगों के लिए यह एक ही चीज है। लोग सोचते हैं प्यार जैसा पवित्र नाम सेक्स जैसे हीन कृत्य से कैसे मेल खा सकता है। लेकिन यह गलत है, जहां प्यार है वहां सेक्स भी है। तभी तो सदियों से समाज प्यार के खिलाफ रहा है। विवाह के नहीं। इंसान जानता है प्यार और सेक्स एक साथ संलग्न है और पूरक भी है, बस इसे खुले में स्वीकारता नहीं है। 
 
कहते हैं जहां आग होती है वहां पर रोशनी भी होती है, जहां फूल होते हैं वहां सुगंध भी होती है। दोनों एक दूसरे का हिस्सा है, जिसमें संभावनाएं छिपी होती हैं। ऐसे ही जहां प्यार है वहां सेक्स की भी संभावना होती है। सच तो यह है सेक्स की सिर्फ संभावना ही नहीं बल्कि प्यार के किसी मोड़ या तल पर प्यार सेक्स का रूप भी ले लेता है। और यदि यही सेक्स केवल हवस के लिए न किया जाए तो प्यार को और भी मजबूती प्रदान करता है। प्यार को खिलाहट है सेक्स और सेक्स की सुगंध है प्यार। दोनों एक-दूसरे से विपरीत होते हुए भी पूरक हैं। 
सेक्स जिस्म की भूख है तो प्यार मन की जरूरत, लेकिन दोनों की चीजें सही मायने में बिना किसी वासना के मिल जाएं तो आत्मा की तृप्ति बनकर उभरती है। प्रश्न उठता है कि क्या बिना सेक्स के प्यार अधूरा है? या प्यार के बिना सेक्स संभव है? दोनों ही जरूरी हैं, स्त्री-पुरूष का शारीरिक ढांचा हो या मनोविज्ञान दोनों ही यह बताते हैं कि एक-दूसरे का मिलना ही भावनाओं को और रिश्तों को पूर्ण करता है। 
 
प्यार और सेक्स एक सिक्के के दो पहलू
मनोवैज्ञानिक शोध के अनुसार स्त्री मानसिक एवं भावनात्मक लोक में जीती है तो पुरूष शारीरिक एवं वैज्ञानिक तल पर जीता है। स्त्री के लिए उसकी कल्पनाएं होती हैं तो पुरूष केलिए उसकी मेहनत या क्रियाएं। स्त्री का स्वाभाव देने का और उस पर राज करने का है। इसी कारण दोनों की जरूरत, इच्छाएं एवं प्राथमिकताएं आदि भी भिन्न हैं। बावजूद इसके दोनों के भीतर एक-दूसरे के लिए तभी तो विज्ञान कहता है। विपरीत सदा एक-दूसरे को आकर्षित करता है। 
सच तो यह है कि प्रकृति ने जो स्त्री को दिया है वह पुरूष को नहीं दिया और जो पुरूष को दिया है वह स्त्री को नहीं दिया, इसलिए आकर्षण भी स्वाभाविक है। इसलिए दोनों मिलते हैं और एक-दूसरे से मिलकर, एक-दूसरे का अधूरापन मिटाते हुए एक -दूसरे को तृप्त व पूर्ण करते हैं। 
यह मिलन या इस मिलन की कल्पना दोनों में ही इतनी मधुर होती है कि इंसान खुद-ब-खुद प्यार से भर जाता है। इसलिए सेक्स को पाने और प्रेम को उपलब्ध होने के लिए स्त्री-पुरूष भिन्न ढंग अपनाते हैं ।
 
स्त्री-पुरूष के मनोविज्ञान की बात करें तो पुरूष सेक्स करने के लिए प्यार करता है तो स्त्री प्यार पाने के लिए सेक्स के लिए राजी होती है। दोनों के पास एक-दूसरे को पूरा करने के बहाने व माध्यम हैं। पुरूष प्यार जताकर अपने हिस्से का सेक्स सुख हासिल कर लेता है तो स्त्री सेक्स को स्वीकार कर अपने हिस्से का प्यार पा लेती है। सच तो यह है प्यार और सेक्स के आदान-प्रदान से दोनों एक गहन तृप्ति का जन्म होता है जो प्रेम को और भी प्रगाढ़ रूप देता है। मगर यह सत्य है प्यार और सेक्स एक-दूसरे के पूरक है। 
 
प्यार की अभिव्यक्ति है सेक्स
अन्य अर्थों में देखें तो सेक्स प्रेम का एक मजबूत हिस्सा है, जिसके जरिए प्रेमी या साथी अपनी भावनाएं सेक्स के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। या कर सकता है। और सेक्स का मतलब संभोग से ही नहीं उन शारीरिक इशारों एवं अन्य क्रियाओं से भी है जिसके जरिए वह अपना प्यार जाहिर करता है। जिस बात को आपस की रोज-रोज की बातें नहीं कह पाती उसे खामोशी कह जाती है और खामोशी में वह छुअन या सेक्स इस बात को कहने और समझने का अवसर देती है कि आपका साथी आप से कितना प्यार करता है। 
 
इसमें कोई मत नहीं कि मन के रिश्तों के बिना तन के रिश्तों का कोई अर्थ नहीं, लेकिन यदि आपके बीच मानसिक रिश्ते अच्छे हैं तो उसको आपके साथी का छूना, चूमना या आलिंगन करना सब अच्छा लगेगा। सच तो यह है जब आपस में प्यार होता है तो उसे जाहिर करने के लिए इंसान इन चीजों का आसरा जरूर लेता है या यूं कह लीजिए यह चीजें अपने आप प्यार के बीच अपनी जगह कब बना लेती है खुद प्रेमी नहीं जान पाते।
 
यदि प्यार हो और सेक्स न हो तो?
आत्मा के तल पर ऐसा हो सकता है परंतु साधारण, भौतिक या सांसारिक तल पर ऐसा नहीं होता। स्त्री-पुरूष है तो आकर्षण है, आकर्षण है तो इच्छाएं हैं, इच्छाएं है तो उनकी तृप्ति है। अब, वो बात और है कि इंसान उस तृप्ति के लिए कौन-सा मार्ग चुनता है। क्योंकि बिना प्रेम के सेक्स करना एक तरह का बलात्कार होता है, लेकिन जो लोग अपने पे्रमी के साथ सेक्स नहीं करते ही हैं ।तन और मन उनकी उस इच्छा के लिए उसे उकसाते तो हैं ही।
यही कारण है जिन रिश्तों में आपसी प्यार होता है और शारीरिक संबंध ठीक से नहीं बन पाते तो साथी एक-दूसरे के प्रति अप्रत्यक्ष रूप से शिकायत से भी भर जाते हैं और आपसी प्रेम में खटास आने लगती है। सच तो यह है कुछ लोगों के लिए प्यार का मतलब ही सेक्स होता है, तभी तो वह सेक्स के लिए अपने साथी से संतुष्ट होने के बावजूद भी बाहर भटकते हैं और सेक्स के नाम पर प्यार करते हैं ।
 
यदि सेक्स हो प्यार न हो तो?
एक पहलू यह भी है, यदि सेक्स से ही किसी के दिल में प्यार पैदा किया जा सकता तो किसी से प्यार करने के लिए या प्यार पाने के लिए लोग इतने पापड़ नहीं बेलते, क्योंकि प्यार तन का नहीं मन का मामला है, जिसे पाने व बनाने में सालों लग जाते हैं। यही सेक्स कुछ पलों का सुकून है जिसके करने के बाद जब इंसान वापस पुनः पहले की स्थिति में लौटता है तो स्वयं को हताश पाता है। 
यही कारण है कि कई प्रेमियों के बीच सेक्स तो खूब हेाता है क्योंकि वह सोचते है कि आपस में प्यार को बनाए रखने के लिए जरूरी है और फिर भी रिश्ते टिक नहीं पाते, क्याेंकि सेक्स ही यदि प्यार होता तो इंसान पैसे लेकर कहीं से भी प्यार को पा लेता, परंतु ऐसा नहीं होता। सेक्स हो, और प्यार न हो तो स्थिति में यदि थोड़ा बहुत प्यार भी बीच में होता है तो उसे नष्ट होने में देर नहीं लगती।
 
दोनों पूरक भी हैं और जरूरी भी
सच तो यह है बिना सेक्स के न प्यार संभव है बिना प्यार के सेक्स। दोनों की अति भी संबधों को खराब करती है, तो दोनों की कमी भी संबधों में खटास पैदा करती है। सेक्स और प्यार जरूरी है। मगर दोनों में संतुलन भी उतना ही जरूरी है। बिना प्यार के सेक्स एक शारीरिक क्रिया है तो बिना सेक्स के प्यार एक अधूरापन। दोनों की जरूरत कब, कहां और कितनी है, यह तय खुद इंसान को ऐसे करना चाहिए कि आपसी संबंधों में विच्छेद संबंधों में विच्छेद नहीं मधुरता कायम हो। 
 
उम्र के अनुसार सोच व जरूरत
उम्र के अनुसार यदि इस विषय पर प्रकाश डाला जाए तो सेक्स के प्रति सोच और प्यार की जरूरत व दोनों की परिषाएं, दोनों बदलती हैं। जिसने युवाकाल में यानी 15-20 वर्ष की आयु में अभी कदम रखा रखा है। उसके लिए सेक्स पहले है और प्यार बाद में। 20-27 वर्ष की आयु वालों के लिए प्यार और सेक्स साथ-साथ है। 27-35 वर्ष की आयु वालों के लिए पहले प्यार फिर सेक्स है और 35-45 प्यार न केवल पहले जरूरी भी है। सेक्स केवल उनकी मात्र एक शारीरिक जरूरत है जो उनके मन मस्तिष्क पर हावी नहीं होता तथा 45 से 55 आपस में प्यार ही रह जाता है। 
लेकिन यह सच है इंसान अपने जीवन काल में प्यार और सेक्स दोनों को जरूरी पाता है। यह बात अलग है उसके प्रति उनकी सोच व जरूरत, उम्र, माहौल, संगत एवं हालात के अनुसार बदलती रहती है। युवा काल में इंसान को सेक्सी बातें करना, सुनना व देखना भाता है तो बुढ़ापे में वह प्यार-मोहब्बत आपसी सौहार्द की बातों में रूझान लेने लगता है। दोनों ही स्थितियां सही भी हैं और स्वाभाविक भी, जिससे हर कोई गुजरता है। 
 
प्यार का दम और सेक्स की भूख, दोनों झूठ
यदि एक ओर प्यार का दम भरने वाले लोग हैं तो दूसरी ओर सेक्स की भूख रखने वो लोग भी हैं। यानी कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते है हमें सिर्फ प्यार से मतलब है । हमें बस प्यार चाहिए सेक्स न भी हो तोभी हमारे प्यार में कोई कमी नहीं आती। तो कुछ लोगों को प्यार पर जरा भी भरोसा नहीं, इसे वह बेकार की चीज मानते हैं। उनका मानना है कि सेक्स में ही असली मजा है, प्यार तो झंझट है, वह तो बांधता है आदि-आदि। लेकिन सच तो यह है दोनों ही झूठे हैं। 
विशेषज्ञ कहते हैं ‘सेक्स’ इंसान की अतिरिक्त उर्जा की अभिव्यक्ति है। यदि इंसान कभी सेक्स न करे तो उसके भीतर कई विकार भी उत्पन्न हो सकते हैं । यदि आप शारीरिक यानी हार्मोनल एवं मानसिक रूप से स्वस्थ हैं तो सेक्स की जरूरत आपको होगी। अंदर की उर्जा बाहर निकलने का मार्ग तलाशती है जो सेक्स के द्वारा ही संभव है। इसलिए सेक्स की इच्छा न होना भी एक अस्वस्थता की निशानी है। इसलिए यदि कोई कहता है कि उसके लिए सिर्फ प्यार ही पर्याप्त है सेक्स नहंी वह झूठ बोलते हैं, क्योंकि सेक्स पर यकीन है वह झूठ बोलते हैं, क्योंकि यदि सेक्स यदि शरीर की भूख है तो प्यार मन की और इंसान अपने मन की भूख के बिना भी नहीं रह सकता है। हां, यह सोच कोई प्यार में धोखा खाने के बाद बना ले वह बात और है, लेकिन सच तो यह है कोई कितने ही टूटे दिल का हो वह भी चाहता है कि जिसके साथ वह सेक्स करे उससे उसका सिर्फ जिस्म का नहीं जान का भी नाता हो। जिसे वह छुए या जो उसे छुए उसमें सिर्फ एक वासना ही नहीं प्यार भी हो। 
सेक्स को सब कुछ मानने वाला भी अपने जीवन में एक ऐसे साथी की उम्मीद रखता है जिसके साथ वह घंटा-दो-घंटा बतिया ले। कोई दूसरा उसे समझे, स्वीकार करे, प्यार दे आदि। वह भी जानता है सेक्स पल भर का चैन तो देता है पर सुकून नहीं देता। इसलिए जो लोग कहते हें कि सेक्स ही सब कुछ है वह भी झूठ बोलते हैं ।
 
सेक्स को हीनता की नहीं प्यार की दृष्टि से देखें
प्यार और सेक्स एक-दूसरे के वास्तव में पूरक हैं, लेकिन हमारे समाज में प्यार को पवित्रता के तथा सेक्स को हीनता की दृष्टि से देखा जाता है। इसलिए लोग इस बात को या इस सच को स्वीकारते ही नहीं हैं कि प्यार और सेक्स एक दूसरे के पूरक हैं । सच  तो यह है जहां प्यार और सेक्स एक-दूसरे के पूरक हैं। सच तो यह है जहां प्यार में खुलापन होगा वहां सेक्स को भी पवित्र नजरों स्वीकार भाव होगा। प्यार के गहनतम क्षणों में सेक्स स्वतः ही अभिव्यक्त या घटित होने लगता है। 
 
जब तक इंसान सेक्स को घृणा की भावना से देखता रहेगा तब तक प्रेम एवं प्रेमियों का भी समाज हाथ खोलकर स्वागत नहीं करेगा। जबकि सच तो यह है जिन्होंने प्यार किया है या जिन्होंने सेक्स किया वह दोनाें ही जानते हैं कि दोनों जरूरी भी हैं और पूरक भी । वो बात अलग है कि इसे हम सरलता से स्वीकारते नहीं है कि प्यार और सेक्स एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, पूरक हैं। 
 
 
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