नशेड़ी लोग कम से कम एक दिन में दस रुपये तो खर्च कर ही देते हैं। इससे ऊपर पचास, सौ, दो-चार-पांच सौ रुपये खर्च करने वालों की संख्या भी बहुत अधिक है। हजार-दो-चार-पांच-सात हजार नियमित खर्च करने वालों की भी कमी नहीं है। लाखों में कुछ ऐसे हैं जो रोज दस-बीस हजार रुपये तक उड़ाने से भी नहीं चूकते हैं। यदि सभी नशेड़ियों का प्रति व्यक्ति औसत खर्च 100 रुपया ही माना जाय तो भारत के 40 करोड़ नशेड़ी चालीस अरब रुपये प्रातिदिन नशे की गन्दी नाली में उड़ेल देते हैं। इतने खर्च से तो भारत की सम्पूर्ण सुरक्षा व्यवस्था चल रही है। फिर इससे उत्पन्न होने वाली बिमारियों, एक्सीडेंट, घरेलू कलह-क्लेश, अश्लीलता, प्रदूषण, गन्दगी आदि को ठीक करने में भी करीब इतना ही धन बह जाता है। नशेड़ी लोगों की मानसिक एकाग्रता डावांडोल होती ही होती है। फलस्वरूप वे दो घंटे के कार्य को चार घंटे में भी बहुत अच्छी तरह नहीं कर सकते हैं। इसके साथ ही बहानेबाजी, बीमारी, काम चोरी, काला बाजारी, आलस्य आदि में ऐसे लोग उससे भी ज्यादा देश को नुकसान पहुंंचाते हैं।

देश का बजट और नशेड़ियों की मजबूरी पर ध्यान केंद्रित कर उनको नशे की पराधीनता से मुक्त करने के लिए नई जागृति लाई जाय तो भारत, चीन-अमेरिका क्या पूरे विश्व का सिरमौर बन सकता है।

जैसे स्वतंत्रता संग्राम को भारत के सभी लोगों ने एकजुट होकर जीता, वैसे ही इस मानसिक पराधीनता वाली आदत को युद्ध-स्तर पर आध्यत्मिक आधार ले करके आसानी से जीता जा सकता है, तभी भारत प्रकाश स्तम्भ बन कर सारे संसार के लिए प्रकाश फैलाता रहेगा। अन्यथा बुरी आदतों के गुलाम लोग दुनिया के दु:खों की गुलामी को कैसे दूर कर सकेंगे?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल 30 से 40 लाख लोग नशीले पदार्थों के काल के गाल में समा जाते हैं। इससे दस गुना लोगों का पारिवारिक जीवन उजड़ जाने से वो मौत से भी बुरी जिंदगी जीते हैं। बहुत-सी गर्भवती महिलाओं के गर्भस्थ शिशुओं का विकास बाधित हो जाता है। बच्चों में विकलांगता-विमंदता का यह भी सबसे बड़ा कारण है। दुनिया की बहुसंख्यक बिमारियों की जननी मद्यपान को माना जाता है। संसार की सम्पूर्ण सेनाओं और हथियारों पर जितनी सम्पदा खर्च होती है उससे भी अधिक अनावश्यक खर्च मादक पदार्थों पर परवान चढ़ जाते हैं। इस गोरखधंधे में लगे लोग ही आतंकवाद, चोरी, डकैती, अपहरण, बलात्कार, चोरबाजारी जैसे कामों को बढ़ावा देने में मुख्य भूमिका निभाते हैं, जिसकी रोकथाम में देश के अनेकों जवान शहीद हो जाते हैं। सभी नशीले पदार्थ सर्व नाश के लिए ही बनते हैं, परंतु शराब का स्थान उनमें सर्वोच्च माना जाता है। 

विकसित देशों में नशीले पदार्थों के ऊपर कठोर प्रतिबंध लग जाने के कारण इनकी उत्पादक कंपनियां अपने माल की खपत के लिए अब विकासशील तथा अविकसित देशों को अपनी कमाई का निशाना बनाती जा रही हैं।

किसी देश को नष्टï करना या विनाश के कगार पर खड़ा करना हो तो उसकी युवा पीढ़ी में मादकता के अति सेवन की आदतें डाल दो। स्वत: ही वह विनष्टï होता जायेगा। प्राकृतिक पोषक पदार्थों को सड़ा-गला कर तैयार की जाने वाली शराब में अल्कोहल जैसा विषैला विष होने के कारण जीवन शक्ति को नष्टï करने वाला यह अपेय पदार्थ है। इसे पीने के कुछ ही देर बाद इसका अल्कोहल खून में मिलकर रक्त कोशिकाओं के माध्यम से सारे शरीर में फैल जाता है। इसके विजातीय विष को बाहर निकालने के लिए शरीर के सम्पूर्ण तंत्रिका-तंत्र को बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है। किडनी पर अतिरिक्त बोझ पड़ जाने से तीव्र गति से कार्य करते हुए उसे पेशाब के रूप में बाहर निकालना पड़ता है। सर्वाधिक संवेदनशील अंतड़ियों में पहुंचकर यह व्यक्ति को पेट का रोगी बना देती है। मस्तिष्क के कोशिकाओं को निष्क्रिय कर उन्हें नष्टï करती जाती है। मस्तिष्क के सूक्ष्म कोष एक बार क्षतिग्रस्त हो जाने पर कभी भी सुचारू रीति से काम नहीं कर पाते हैं। 

व्यक्ति रोग व शोक का उत्तराधिकारी बन जाता है। चाहे जीभ के स्वाद की चाह हो या इंद्रियों की वासना, इनकी जलन में न शान्ति है और न ही विश्राम। अन्तहीन सिलसिले वाली कामनायें जब उठती हैं तो आग में पेट्रोल डालने की तरह भड़कती जाती हैं। वे नष्टï-भ्रष्टï करके ही रुकती हैं।

लोग आधुनिक दिखने की चाहत में मादकता के चंगुल में फंसते जाते हैं। जीवन की परेशानियों, चिंताओं से मुक्ति पाने के लिए नशे में डूबे रहना चाहते हैं। किसी भी कारण से मद्यपान की आदत पड़ जाने के बाद बारम्बार खाने-पीने-पिलाने के लिए विवश हो जाते हैं। उनके स्नायु मंडल इतने कमजोर व शिथिल हो जाते हैं कि उन्हें वासनाओं के सामने घुटने टेकने ही पड़ते हैं। फिर तो गिरावट का सिलसिला बढ़ता ही जाता है। मदिरापान करते ही व्यक्ति मानसिक के साथ शारीरिक गतिविधियों पर संयम रख ही नहीं सकता है। फलस्वरूप वह उन्मत्त व्यवहार करता हुआ आत्म-नियंत्रणहीन हो गिर पड़ता है। स्मृति ह्रïास होने से उसमें निर्णय करने तथा परखने की शक्ति की कमी हो जाती है। कमजोरी और चिड़चिड़ेपन के कारण वह अपराधिक वृत्तियों की ओर उन्मुख होने लगता है। उसके रसाभिसरण व रक्त संचरण क्रियाओं में अस्त-व्यस्तता आ जाती है। ऐसी क्रियाओं का सीधा असर दिल व दिमाग पर पड़ता है जिससे रक्त अल्पता, रक्तचाप जैसी बिमारियां घेरने लगती हैं। मद्यपान की निरन्तरता पेट, यकृत, फेफड़े जैसे अति संवेदशील अंगों को बिगाड़ कर नपुंसकता की ओर ढकेलती जाती है। ऐसे खोखले व्यक्ति गृह-कलह, आर्थिक तंगी, बीमारी, संतानों में विकलांगता, पागलपने के शिकार होते ही रहते हैं। जाम के नशे में डूबा व्यक्ति किसी काम का नहीं बचता।

मादक पदार्थों के उत्पादन व्यापार और विज्ञापन में प्रशासन ने ही लाइसेंस देकर बढ़ावा दिया है। हर गांव, गली, मुहल्ले व सड़कों पर इनकी दुकानें धड़ल्ले से बढ़ती ही जा रही हैं। प्रजातान्त्रिक प्रणाली में सरकारें विकास को बढ़ावा देने के नाम पर चुनी जाती हैं। 

अब सोचना जरूरी हो गया है कि किस प्रकार का विकास करना चाह रहे हैं? यदि भारत का उत्थान चाहते हैं तो पूर्ण इच्छा शक्ति से मादक द्रव्यों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। जो उत्पाद सबके स्वास्थ्य, सम्पत्ति, संबंध और सौन्दर्य को नुकसान पहुंचाता है उसे बन्द करने के लिए मूलभूत अधिकारों की तरह देश भर में नियम लागू किया जाना चाहिए। शूगर फैक्ट्रीज से निकलने वाले लाखों लीटर एकोनोल को पेट्रोलियम में मिलाकर प्रयोग कर लेने से उत्पादकता में भी कमी नहीं आयेगी। विदेशी टूरिजम को बढ़ावा देने के लिए मात्र स्टार होटलों में ही ऐसे उत्पाद उपलब्ध कराए जाएं और कौन कितना सेवन करता है इसका रजिस्टर बनाया जाए। इससे हजारों स्टार होटलों का नया विस्तार होने से कई गुना यात्री आने लगेंगे। तम्बाकू, गुटखा, अफीम जैसे उत्पादों को सरकारी नियंत्रण की फैक्ट्रियों में ही प्रोसेसिंग करायी जाय। अन्यथा सर्वनाश की जड़ नशा दिनोंदिन और ही दु:खदायी स्वरूप धारण करते हुए देवभूमि कही जाने वाली भारत माता को आतंकी, अपाहिज, रोगालय बना देगी। 

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