मैं हमेशा यह सोचकर आश्चर्यचकित हो जाता हूं कि आखिर मंदिर का खाना इतना स्वादिष्ट कैसे होता है? शायद इसलिए क्योंकि यह खाना पवित्र माहौल में बनाया जाता है। वैसे व्यक्तिगत रूप से मैं एक बात में विश्वास रखता हूं कि यदि खाना सकारात्मक उर्जा के साथ बनाया जाए तो हमेशा ही स्वादिष्ट बनता है और यह बात सभी घरों की रसोई और पवित्र स्थानों पर लागू होती हैं। आज जब मैं अपने बचपन के दिनों की याद करता हूं तो सोचता हूं कि हमारी मां, हमारे लिए रसोई में पूरे दिन कुछ ना कुछ बनाती रहती थी। मैं महसूस करता हूं कि उनके खाना बनाने में एक पवित्रता का भाव रहता था। मुझे ऐसा कोई दिन याद नहीं आता है जब उन्होंने हमारे खाने के लिए कुछ अच्छा ना पकाया हो।

वैसे यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जितनी बार भी हम अच्छे खाने की बात करते हैं तो हमेशा ही बचपन में अपनी मां की रसोई में बनने वाले खाने से जुड़ी यादे हमारे जेहन में उभर आती हैं। मेरे जेहन में भी बहुत सी ऐसी यादें आज भी तरोताजा हैं। जैसे मुझे याद है कि गुरुद्वारे में खाना बनाना कितना मजेदार होता था। वैसे मैं गुरुद्वारे की रसोई में खाना बनाने के लिए रोज नहीं जाया करता था लेकिन मेरा बड़ा भाई हमेशा वहां जाता था और गुरुद्वारे की सामुदायिक रसोई में खाना बनाने के कार्य में भागीदार बनता था। ऐसे पवित्र स्थानों पर बनाया गया खाना पहले कभी भी चखा नहीं जाता है, किसी भी मंदिर या गुरुद्वारे में सबसे पहले अराध्य देव की आराधना की जाती है, फिर बनाए गए खाने का भोग लगाया जाता है। उसके बाद ही प्रसाद स्वरूप वो खाना भक्तों में वितरित किया जाता है।

हममें से शायद ही कोई गुरुद्वारे के लंगर में बंटने वाला कढ़ा प्रसाद और दाल के लज़ीज स्वाद को भूलता हो। अधिकतर लोग इस प्रसाद को बड़ा ही आनंद लेकर खाते हैं। बचपन में हम हमेशा गुरुनानक गुरुपर्व पर नहा-धोकर, नए कपड़े पहनकर पूरे परिवार के संग गुरुद्वारा जाया करते थे और लंगर में मिलने वाली दाल, गोभी-आलू की सब्जी, रायता, जर्दा पुलाव और दिलखुश मिठाई के स्वाद का जमकर आनंद उठाते थे। उस समय कभी-कभी हमें खीर भी खाने को मिलती थी। इन सभी में सबसे स्वादिष्ट दिलखुश मिठाई और प्याज-टमाटर का सलाद हुआ करता था। अदरक वाली दाल का स्वाद हमेशा से हमारी जीभ पर रहता है, इसलिए लंगर के खाने को कभी भूला नहीं जा सकता है।

मंदिर और गुरुद्वारे जैसे पवित्र स्थानों पर बनने वाले खाने की सादगी हमेशा ही मुझे इस बात का एहसास कराती है कि कैसे एक साधारण से खाने की याद हमारे जेहन में बस सकती है। मैं अपने शो ‘टरबन तड़का’ में हमेशा इस बात का ध्यान रखता हूं कि किसी भी व्यंजन को बनाने में हर जटिलता को हटाकर साधारण तरीके का प्रयोग करूं। चाहे वो सादगी मसालों में हों या खाना पकाने में हो। मैं यह बात आपको जरूर बताना चाहूंगा कि साधारण खाने को स्वादिष्ट बनाना काफी मुश्किल भरा होता है। मैं हमेशा इस बात का ख्याल रखता हूं कि मैं जो भी पकाऊं, प्यार के साथ पकाऊं। खाने का स्वाद कैसा होगा यह बात मुझे बिलकुल भी परेशान नहीं करती हैं क्योंकि मुझे पाता होता है कि जो स्वाद मेरे दिमाग में है, अंत में उस खाने का स्वाद वैसा ही होगा। भारतीय घरों में रसोई को पूजा के स्थान की तरह पवित्र माना जाता है और यह बात शत प्रतिशत सच भी है।

इस माह मैं आपके साथ एक ऐसी रेसिपी साझा कर रहां हूं जिसके बारे में आप हमेशा ही सोचते हैं कि हम खाने में ऐसा स्वाद क्यों नहीं ला पाते जैसा गुरुद्वारे और अन्य पंजाबी जगहों पर मिलने वाले खाने में होता है। ऐसा स्वाद लाने के लिए आपको जानना जरूरी है कि आटे को भूरा होने तक भूना जाए, साथ ही चीनी, घी और गेंहू के आटे की मात्रा के मुकाबले पानी की मात्रा चार गुना होनी चाहिए। ऐसा करने पर आप घर पर वैसा ही कढ़ा प्रसाद बना सकते हैं। साथ ही जब आप अगली बार इसे घर पर बनाएं तो इसे पकाते समय प्रार्थना करना ना भूलें तब देखिएगा कि खाना आपसे बोल उठेगा। 

 

सामग्री : 

गेहूं का आटा 1 कप,

देसी घी 1 कप,

चीनी 1 कप,

पानी 4 कप।

विधि :

  1. सबसे पहले एक गहरे नॉनस्टिक पैन में 4 कप पानी उबाल लें।
  2. दूसरे नॉनस्टिक पैन में घी गर्म करें और उसमें आटा डालकर हल्की आंच पर भूरा होने तक भूनें।
  3. फिर इसमें चीनी डालें और उसे आटे में घुलने दें।
  4. पानी मिलाकर 7-8 मिनट तक पकने दें।
  5. जब इसका पानी सूख जाए तो गैस बंद कर दें।
  6. लीजिए तैयार है कढ़ा प्रसाद, इसे गरमा-गरम सर्व करें।