गुरु नानक देव

who started langar?

हम सभी जानते हैं कि किसी भूखे को भरपेट भोजन करवाना एक नेक कार्य है। इसी नेक कार्य को गुरू नानक देव ने 15वीं शताब्दी में आरंभ कर समाज को लंगर की परंपरा से जोड़ा। जो आज भी कायम हैं। अमीर गरीब, ऊंच-नीच और जातिवाद के भेद को भुलाकर एक पंक्ति में बैठकर लंगर करवाने की परंपरा को गुरू नानक देव ने आरंभ किया, जिसे गुरु अमरदास जी ने आगे बढ़ाया।

सिख समुदाय में अब भी ये परंपरा यूं ही कायम हैं। गुरूद्वारों में विशेषतौर पर मुख्य अवसरों पर लंगर का आयोजन किया जाता है। मगर बड़े गुरुद्वारे में दिनभर लंगर चलता है। जहां हर जाति, रंग और समाज से जुड़ा व्यक्ति लंगर को आनंद लेता है और ईश्वर का गुणगान करता है। इससे जुड़ी एक विशेष कथा है कि किस प्रकार से गुरु नानक देव जी ने इस प्रथा की शुरुआत की थी।

जब गुरु नानक जी 12 वर्ष के थे उनके पिता ने उन्हें 20 रुपए दिए और अपना एक व्यापार शुरू करने के लिए कहा पर गुरु नानक जी ने उस 20 रुपये को गरीब और संत व्यक्तियों को खाना खिलाने में खर्च कर दिया। जब उनके पिता ने उनसे पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया मैंने उन पैसों का सच्चा सौदा किया। जिस जगह पर गुरु नानक जी ने उन गरीब और संत व्यक्तियों को भोजन खिलाया था, वहां सच्चा सौदा नाम का गुरुद्वारा बनाया गया है।

गुरु जी ने इस प्रकार लंगर की परंपरा चलाई, जहां सभी जातियों के लोग एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते थे। आज भी सभी गुरुद्वारों में गुरु जी की शुरू की गई लंगर की प्रथा कायम है। लंगर में बिना किसी भेदभाव के संगत लंगर ग्रहण करती है। 

एक कथा के अनुसार, गुरु नानक देव जी एक गरीब बढ़ई के घर में ठहरे थे। उसी गांव में ऊंची जाति का एक धनवान व्यक्ति मलिक भागो रहता था। उसने अपने यहाँ दूर-दूर से साधु-संतों को बुलाकर एक भव्य भोज का आयोजन करवाया था। उन्होंने नानक को भोज में बुलाया किन्तु उन्होंने वहां जाने से इंकार कर दिया।

आखिर भागो ने उनसे अपने यहां न खाने का कारण जानना चाहा तो नानक ने कहा- मैं ऊँच-नीच में भेदभाव को नहीं मानता, लालो मेहनत से कमाता है जबकि तुम गरीबों और असहायों को सताकर दौलत कमाते हो। तभी नानक जी ने एक हाथ से लालो की सूखी रोटी और दूसरे हाथ से भागो के घर का पकवान को दोनों हाथों से निचोड़ा तो लालो की रोटी से दूध निकला, वहीं भागो की रोटी से खून निकला। यह देखकर भागो और अन्य लोग भौचक्के रह गए।

नानक ने अपनी यात्रा में मक्का और मदीना की भी यात्रा की। कहते हैं की एक बार भूलवश नानक जी जब लेटे थे, तो उनका पैर काबा की तरफ था। एक व्यक्ति ने उनसे कहा की वे अपने पैर काबा की तरफ करके क्यों लेटे हैं, तो नानक ने कहा की तुम मेरे पैर को उधर घूमा दो जहां काबा नहीं है। वह व्यक्ति जिधर पैर घूमाता, उधर काबा ही नजर आता है। अंत में उस व्यक्ति ने नानक जी से माफी मांगी।

अमृतसर के स्थित पावन स्थल स्वर्ण मंदिर यानी गोल्डन टेम्पल में रोजाना बड़े स्तर पर लंगर का आयोजन होता है और वहां दुनिया का सबसे बड़ा लंगर आयोजित होता है। यहां के रसोईघर में हर रोज हजारों की तादाद में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खाना बनता है। इस गुरूद्वारे में अमीर,गरीब, छोटे-बड़े और ऊंच-नीच का किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है। खास मौकों पर इस किचन में 2 लाख रोटियां तक बनती हैं। गुरू दर्शन के लिए आने वाले सभी श्रद्धालु एक पंक्ति में बैठकर ही लंगर का आनंद लेते हैं। गुरु नानक देव जी की चलाई गई इस परंपरा को आज भी पूर्ण रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। 

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