कहते हैं जवानी का गुमान हमें मुगालतों की दुनिया में खींच ले जाता है। हम सपनों में उतरने लगते हैं। जमीनी हकीकतों से कतई अनजान, इन्हीं सपनों पर इतराने-इठलाने लगते हैं। सच्चाइयों से परे अपना बिल्कुल अलग ही संसार गढ़ लेते हैं और फिर भ्रम में जीते हुए पूरी तरह इसी में रम जाते हैं। आत्मग्लानि से भरे विनय को जवानी के सरूर में अपनी यही नादानियां आज बार-बार कचोट रही थी। दीपिका से मुलाकात और फिर घर तक बढ़ी नजदीकियाँ। उनकी ओर से पावन-पहल और अपनी बचकानी सोच पर वह शर्मसार था।

पहला बुलावा था वह दीपिका के घर से। जिस गति से ऑटो सड़क पर दौड़ रहा था, उससे कहीं तेज गति विनय के मन की थी। बगल में बैठी दीपिका लगातार कुछ बोले जा रही थी। ऑटो वाले को निर्देश दे रही थी और साथ ही सड़क की दुर्दशा के लिये विभाग को कोस रही थी। लेकिन विनय को तो इससे कुछ लेना-देना नहीं था। ऑटो किसी गड्ढे पर उछलता तो उसे लगता उसका मन उछल रहा हो। ऑटो अब गलियों से होकर निकल रहा था, पतली गलियों में जगह-जगह खड़े स्कूटर, साइकिल इत्यादि ऑटो की गति कम करते लेकिन इसका विनोद के मन की गति पर कोई असर न होता।

एक हल्के से झटके के साथ ऑटो रुका और साथ ही दीपिका की आवाज आई-’उतरो, हमारा घर आ गया।’

विनय ऑटो से उतर गया और दीपिका के साथ दरवाजे पर खड़ा हो गया। दरवाजा खुलने में थोड़ी देर हुई तो विनय का दिल धड़कने लगा। ऐसा लगा जैसे कोई इम्तिहान देने जा रहा हो और इम्तिहान भी ऐसा जिसमें पास होना जीवन-मरण का प्रश्न हो। विनय की धड़कन तेज हो गई। दीपिका से कुछ पूछना ही चाहता था कि तभी दरवाजा खुल गया, दीपिका की छोटी बहन ने दरवाजा खोला और विनय की ओर ध्यान से देखा।

लगता है यहाँ तो छोटे-बड़े सारे सदस्य उसकी परीक्षा लेने वाले हैं। विनय को बैठक में बिठाकर दोनों बहनें अन्दर चली गई। विनय ध्यान हटाने के लिए इधर-उधर देखने लगा। छोटी सी लेकिन सुरुचिपूर्ण ढंग से सजायी गयी बैठक, साधारण फर्नीचर, दीवारों पर कुछ पेटिंग्स जो शायद छोटी बहन मोनिका ने बनाई होंगी।

माँ, ये है विनय। तभी दीपिका माँ को लेकर कमरे में दाखिल हुई। विनय हाथ जोड़ कर उठ खड़ा हुआ। यही समय है अपनी छाप छोड़ने का। विनय ने मन ही मन सोचा।

आधा घण्टा वहाँ बैठकर विनय वापस चला आया। दीपिका की माँ ने उसे दोबारा आने को कहा तो उसका मन बल्लियों उछलने लगा। इसका मतलब वह उनको पसन्द आ गया है।

‘बहुत खुश नजर आ रहा है। आज कॉलेज के बाद कहाँ गायब हो गया था तू?’ हॉस्टल पहुंचते ही दीपक ने ताना मारा।

लेकिन विनय अपनी खुशी को अभी मन में ही रखना चाहता था, इसलिए टाल दिया।

अभी पिछले वर्ष ही बी.टेक. की परीक्षा उत्तीर्ण कर उसने इस कॉलेज में एम.टेक. में प्रवेश लिया था। यूं तो बी.टेक. करने के उपरान्त ही उसे नौकरी मिल रही थी लेकिन माता-पिता की इच्छा उसे उच्च शिक्षा दिलाने की थी।

‘नौकरी और पैसा कमाने के फेर में तुम आगे नहीं पढ़ पाओगे। उच्च शिक्षा का अलग ही महत्व होता है।’ पिता के इस कथन को स्वीकार कर विनय ने आगे पढ़ाई करना उचित समझा।

यहीं उसकी मुलाकात दीपिका से हुई जो बी.टेक. अन्तिम वर्ष की छात्रा थी। दोनों का एक ही विषय होने के कारण दीपिका कभी-कभी विनय से मार्गदर्शन ले लिया करती। लेकिन धीरे-धीरे विनय को लगने लगा था कि दीपिका सिर्फ पढ़ाई के कारण उससे मिलने नहीं आती। कभी-कभी वह ऐसे बेवकूफी भरे सवाल करती कि विनय को आश्चर्य होता कि ये एक मेधावी छात्रा द्वारा पूछा जा सकता है।

वहीं की निवासी होने के कारण दीपिका अपने घर से ही कॉलेज आती जाती थी, जबकि विनय हॉस्टल में रहता था, कॉलेज की लाइब्रेरी या लॉन में अक्सर मुलाकात होती और दीपिका कोई न कोई टॉपिक को पकड़ कर बहस आरम्भ कर देती। कई बार बात करते-करते विनय ने महसूस किया था कि दीपिका अपलक उसकी ओर ताक रही है और वह असहज हो उठता।

धीरे-धीरे दोनों की मुलाकतें बढ़ने लगीं, लेकिन चर्चा का विषय पढ़ाई की वर्तमान हालत और कॉलेज के वातावरण से आगे न जा पाता। दीपिका विद्रोही स्वभाव की थी और अनुचित बात से समझौता नहीं कर सकती। इसलिए अक्सर वर्तमान हालात को लेकर उनमें बहस हो जाती। विनय जहाँ परिस्थितियों से समझौता करने की सलाह देता तो दीपिका उससे भिड़ जाती।

उनकी इस दोस्ती की चर्चा धीरे-धीरे कॉलेज में होने लगी थी और दबी जुबान में साथ के लड़के विनय को चिढ़ाने भी लगे थे।

धीरे-धीरे विनय के मन में दीपिका के लिए कब कोमल भावनाओं ने जन्म ले लिया वह स्वयं भी नहीं समझ पाया। लेकिन दोनों में से किसी ने एक दूसरे से कभी इस सम्बन्ध में बात नहीं की। कभी-कभी तो विनय को लगता वह गलत तो नहीं समझ रहा। एक पल दीपिका बहुत प्यार से बात करती तो दूसरे ही पल बहस पर उतर आती।

‘माँ आपसे मिलना चाहती है। शाम को आप मेरे साथ घर चल रहे हैं।’

‘दो टूक शब्दों में दीपिका ने मानों अपना आदेश सुना दिया तो विनय को झुँझलाहट हुई।

‘कैसी लड़की है। घर ले जाना चाहती है, वह भी आदेश देकर? मन में भावनाएँ उपजने लगे उससे पहले ही अपनी लट्ठमार भाषा से उन्हें कुचल कर रख देती है ये तो। लेकिन इस स्वभाव के बावजूद भी दीपिका उसे अच्छी लगती थी। मन की साफ, बिना किसी लागलपेट के अपनी बात कह जाती। अभी तक तो विनय को भी पता नहीं था कि उसके घर में कौन-कौन है। इतना पूछने का अधिकार कभी दिया ही नहीं उसने, न ही विनय ने इस बारे में उससे कुछ पूछने की इच्छा रखी।

‘लेकिन क्यों?’

‘कह दिया ना, माँ मिलना चाहती है।’

विनय समझ गया दीपिका ने जरूर उसके बारे में कुछ कहा होगा और माँ ने उसे देखने के लिए बुलाया होगा। मन ही मन खुश हुआ विनय। लेकिन बाहर से शान्त रहा आखिर अपनी अहमियत दिखलाना भी जरूरी था।

‘अचानक ही! पहले मुझसे पूछ तो लिया होता कोई काम तो नहीं है मुझे शाम को।

‘काम है तो रहने दो, अगली बार आपसे समय लेकर माँ को बताऊँगी।’ दीपिका का मुँह फूल गया था और विनय उसको नाराज करने का जोखिम हरगिज नहीं उठा सकता था।’ सो वह क्लास समाप्त होने के बाद दीपिका के साथ चल दिया।

वहाँ पहुँचकर ही उसे पता चला कि दो वर्ष पहले दीपिका के पिता और भाई की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। माँ को पिताजी की मिलने वाली पेंशन से घर चलाने में मुश्किल हुई तो दीपिका ने अपनी पढ़ाई के बाद ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था। भाई जिन्दा होता तो इस समय लगभग विनय के ही बराबर होता। लेकिन तब से दीपिका ने घर-बाहर दोनों को ही इस तरह संभाला कि माँ को कोई कष्ट न हो। लेकिन फिर भी पति और जवान बेटे की मौत से हुए कष्ट को न तो दीपिका दूर कर सकती थी, न कोई और।

दीपिका का एक और रूप विनय के सामने था। इतनी जिम्मेदार तो वह उसे कदापि नहीं समझता था। अभी तक तो उसके मन में दीपिका की छवि एक विद्रोही स्वभाव वाली प्रतिभाशाली लड़की की थी।

धीरे-धीरे विनय का दीपिका के घर जाना बढ़ता गया। दीपिका अक्सर माँ का बहाना कर उसे घर ले जाती और माँ विनय पर इतना प्यार उड़ेलती कि विनय को अपनी माँ की याद आने लगती।

विनय अब एक ऐसे मौके की तलाश में था जब दीपिका से अपने मन की बात कह सके।

अगले वर्ष तक दीपिका अपना बी.टेक. पूरा कर लेगी और वह एम.टेक.। नौकरी लगने के बाद वह विवाह के बारे में सोच सकते हैं। इस बार घर जाएगा तो माता-पिता से भी इस सम्बन्ध में बात कर लेगा।

लेकिन इस बीच कुछ ऐसा घटित हो गया कि विनय दुविधा में पड़ गया।

‘कल माँ ने आपको बुलाया है।’

‘लेकिन क्यों?’

‘मुझे क्या पता! माँ से ही पूछ लेना।’

दीपिका का यह स्वभाव कभी-कभी विनय को आहत कर जाता। एक बार तो उसका मन हुआ न जाये, लेकिन मन के वशीभूत होकर अगले दिन शाम को वह दीपिका के घर पहुँच ही गया।

‘बहुत देर कर दी बेटा। मैं तो कब से तुम्हारा इन्तजार कर रही थी।’ माँ का स्नेही स्वर सुन उसका गुस्सा ठण्डा हो गया।

और उसके बाद जो कुछ घटा वह अप्रत्याशित विनय के लिये, थोड़ी ही देर में दीपिका और मोनिका पूजा की थाली लेकर उसके सामने बैठ गई। थाली में रोली-टीका के साथ-साथ राखी के धागे भी रखे थे।

विनय को लगा जैसे वह सपना देख रहा हो। ये कैसा खेल खेला जा रहा है उसके साथ। ‘क्या सोच रहे हो बेटा।’ उसके कानों में माँ की आवाज पड़ी।

‘दीपिका कहती थी बिल्कुल भैया की तरह है तो मुझे यकीन नहीं आता था, लेकिन बेटा तू पहली बार जिस दिन घर आया मुझे लगा मेरा किशन सामने बैठा है। वैसा ही चेहरा, वही आदतें।’ कहते-कहते उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

विनय तो जैसे समाधिस्थ हो गया था। सुनकर भी कुछ सुनने की स्थिति में नहीं था वह।

‘दीपिका को तू जानता है। कितनी अक्खड़ स्वभाव की है, लेकिन तुझे देखकर वो भी……।’

तो दीपिका इसलिए उसके नजदीक आई थी और वह बेवकूफ कुछ और ही समझ बैठा। अब क्या करे वह? क्या कह दे कि उसे किसी का भाई नहीं बनना। वह तो प्यार करता है दीपिका से! बहुत कुछ सोचा विनय ने लेकिन कह न पाया। मोनिका और दीपिका ने उसके हाथ में राखी बाँधी और उसका मुँह मीठा कराया। वह तो किसी वुत की तरह परिस्थितियों के वशीभूत होकर सब कुछ करता गया।

उसको ये क्यों नहीं याद था कि आज रक्षाबंधन है। शायद इसलिए भी कि उसकी कोई बहन नहीं थी। इसलिए इस त्यौहार की महत्ता को कभी नहीं समझा उसने।

माँ ने शाम को भोजन कर जाने का आग्रह किया तो चुपचाप मान लिया उसने। घर के सभी लोग बहुत खुश नजर आ रहे थे। विनय को चुप देख मोनिका ने दो बार उसकी उदासी का कारण पूछा भी, लेकिन विनय के पास कोई जवाब होता तो वह देता।

हॉस्टल वापस आया तो देखा दीपक कमरे में नहीं था। चुपचाप बत्ती बुझाकर लेट गया। क्या सोचा था उसने और क्या हो गया। अब क्या करे वह? क्या कल दीपिका का सामना कर पायेगा वह?

एक मन हुआ कि कल से दीपिका से मेलजोल कम कर दे। दीपिका ने उससे जो पवित्र रिश्ता बनाया है क्या उसकी गरिमा बनाये रख पायेगा वह? अगर इसके बाद किन्हीं कमजोर क्षणों में दीपिका के प्रति उसका मन भावनाओं में चला जाय तो अपने आप को कभी माफ नहीं कर पायेगा वह। वैसे भी कुछ महीने और हैं यहाँ पर, किसी तरह से काट लेगा और फिर कभी इस शहर में लौट कर नहीं आयेगा। हाँ यही ठीक रहेगा।

लेकिन दूसरे ही पल उसे दीपिका, मोनिका और उनकी माँ की आँखों में तैरता हुआ अगाध स्नेह याद आ गया।

‘किशन जिन्दा होता तो तेरे ही बराबर होता बेटा। तेरी बातें, तेरा चेहरा-मोहरा मेरे किशन से इतना मिलता है कि तुझे खुद भी यकीन नहीं होगा’-और माँ अन्दर से किशन का फोटो उठा लाई थी। उसने फोटो देखी तो माँ की बात उसे सच्च लगी, काफी कुछ समानता लगी उसे किशन के फोटो और अपने चेहरे में।

मां की आँखों से आँसू बह रहे थे और अपने आप को कभी कमजोर साबित न होने देने वाली दीपिका आँखों में छलक आये आंसुओं को छुपाने के लिये दौड़कर दूसरे कमरे में चली गई थी।

इतने प्यार भरे रिश्ते को क्या वह अपनी एक छोटी सी कमजोरी के कारण गँवा दे। आजकल के वातावरण में जहाँ अपने खून के रिश्ते ही दगा दे जाते हैं उस समय में ऐसा पवित्र रिश्ता बनना उसकी खुशकिस्मती होगी।

दोनों स्थितियों पर सोचते-सोचते विनय को न जाने कब नींद आ गई। सुबह उठा तो मन में दृढ़ संकल्प था। मन ही मन लिये गये निर्णय से वह स्वयं को हल्का महसूस कर रहा था।

आज रविवार होने के कारण छुट्टी का दिन था। सुबह जल्दी तैयार होकर बाजार से होते हुए विनय सीधे दीपिका के घर पहुँच गया। विनय को अचानक घर पर देख परिवार के सभी सदस्यों के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गयी।

‘कल तो मुझे पता ही नहीं था मेरी बहनें रक्षाबन्धन पर मुझे अपने प्यार का इतना खूबसूरत रिश्ता तोहफे में देने वाली हैं। मैं तो कल खाली हाथ ही चला आया था।’ और ये कहते हुए उसने अपने हाथ में रखे दोनों पैकेट मोनिका के हाथ में रख दिये।

‘इसकी जरूरत नहीं थी बेटा, रिश्तों की गहराई तोहफों से नहीं मापी जाती, ये तो मन की भावनाओं से प्रकट होती है।’

‘ठीक कह रही है माँ।’ आपको पहली बार देखा था तो भैया की बहुत याद आई थी। माँ से कहा तो उन्होंने आपसे मिलने की जिद की। ये रिश्ता हम आप पर थोपना नहीं चाहते थे, लेकिन….।’ ये दीपिका थी।

‘ऐसा मत कहो। मुझे तो दो बहनें मिल गई और साथ ही एक प्यारी माँ।’ विनय के शब्दों में दृढ़ता थी और साथ ही मन में बदलते हुए रिश्तों का अहसास। वह आत्मग्लानि से भरा था। उसका सारा गुमान चला गया। जवानी का जो नशा उस पर चढ़ा था, वो काफूर हो गया था।

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