मेरे अनुसार गलत या सही की कोई परिभाषा नहीं। हो सकता है जो बात मुझे सही लगती हो वह सामने वाले को गलत महसूस हो या जो सामने वाले को सही लगती हो वह बात मुझे गलत लगे। चलिये तार्किक धरातल पर इसे देखे।

मेरे अनुसार सेक्स संबंध प्राकृतिक है और स्त्री व पुरुष के बीच में जो संबंध आपसी सहमति से बने वही सही है। शादी इन सेक्स संबंधों का सामाजीकरण है। लेकिन अन्य संस्थाओं की तरह से मेरा मानना है कि इस विवाह संस्था में भी बहुत से गुण अथवा दोष हैं। दरअसल हमारा भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज है और यह विवाह संबंध उसी पुरुष प्रधान समाज की एक सोच जिसमें सारे अधिकार पुरुषों के द्वारा ही मान्य हैं और तय हैं। शायद तभी इन संबंधों में महिला की भूमिका नगण्य है और पुरुष हमेशा हावी है। 

वक्त के साथ हर क्षेत्र में बदलाव आया है और इससे हमारा समाज भी अछूता नहीं समाज की बनावट में भी काफी बदलाव आए और महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की पहल से भी उनकी स्थिति में काफी बदलाव हुए। 

बदलाव की लहर

इन्हीं बदलावों के फल स्वरुप स्त्री और पुरुषों का आपसी संबंधों के प्रति भी नजरिया बदला। लिव इन रिलेशन नामक नई संस्था ने अपना प्रारूप तैयार किया। जिसके फलस्वरूप इस रिश्ते में स्त्री और पुरुष की भूमिका बराबर है। लिव इन रिलेशन को लेकर हर किसी की अपनी सोच है कुछ इस रिलेशन के पक्ष में है तो कुछ विपक्ष में। लेकिन मैं इतना जरूर कहूंगी कि इन संबंधों को विवाह संबंध की तराजू से तोल कर ना देखें हां लेकिन कानूनी तौर पर कुछ अधिकार निश्चित तय किए जाएं। बहुत से केस में पुरुष हो या महिला या बच्चे उनके अधिकारों का हनन होते हुए देखा गया जो कि सही नहीं है।

बदलें अपनी सोच

भारतीय सोच के अनुसार अविवाहित पुरुष व स्त्री का एक साथ रहने का सीधा अर्थ है कि उनके बीच आवश्यक रूप से यौन संबंध है जोकि ग़लत है। परस्पर सहयोग व सुविधा को ध्यान में रखते हुये मित्र की भाँति भी साथ रहा जा सकता बिना शारीरिक संबंध बनाये हुये। विकसित देशों में तो यह आम बात है । आसान होता है नई चीजों के प्रति हेय भाव रखना। कठीन होता है उनके प्रति न्याय भाव रखना। मुझे दूसरा नज़रिया ज्यादा पसंद है।

एक नयी पहल है ये

हालांकि लिव इन रिलेशन को लेकर लोगों का नजरिया बदल रहा है। पहले इसे समाज में एक धब्बा माना जाता था लेकिन अब इसे नॉर्मलाइज किया जा रहा है। इसे केवल लड़का और लड़की का गैर संबंध नहीं बल्कि शादी से पहले उन्हें एक दूसरे को अच्छे से जानने का मौका मिल सके, यह समझा जाता है। यह सब लड़के और लड़की का फाइनेंशियल रूप से स्वतंत्र होना, प्रोफेशन और एजुकेशन का नतीजा है। यह जिम्मेदारियों से भागने की पहल नहीं बल्कि शादी के बाद जिम्मेदारियों को समझने की एक पहल है। इस रिलेशन में फैमिली ड्रामा से अलग दोनों का एक साथ रहना होता है और अगर उनका ब्रेक अप हो जाता है तो डाइवोर्स के लिए कोई लंबी चौड़ी प्रक्रिया का भी पालन नहीं करना होता है।

इंडियन लॉ के अनुसार 

सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशन को 5 तरीकों से परिभाषित किया है। 

  • पहला यह है कि यह एक एडल्ट और कुंवारे पुरुष और एडल्ट और कुंवारी महिला के बीच घरेलू रहन सहन होता है और वह लिव इन रिलेशन में अपनी मर्जी से रहते है। 

  • इसकी दूसरी परिभाषा है एक शादीशुदा एडल्ट व्यक्ति और शादीशुदा एडल्ट महिला का एक साथ घरेलू रूप से रहना है, अगर वह दोनों इससे सहमत होते हैं तो। कानून की नजर में दूसरा प्रकार गलत और दंडनीय अपराध माना जाता है।

  • अगर एक एडल्ट और कुंवारी महिला और शादी शुदा पुरुष का एक साथ रहना भी कानून की नजरों में अपराधनीय है।

  • अगर दो होमो सेक्सुअल पार्टनर एक दूसरे के साथ रहते हैं तो यह वैध है क्योंकि भारत में इसके विपरित कोई मैरिटल लॉ नहीं है।

लिव इन का लीगल स्टेटस

एपेक्स कोर्ट के मुताबिक अगर कुंवारा पुरुष और कुंवारी महिला एक साथ काफी लंबे समय से पति और पत्नी की तरह रहते हैं और अगर उनका बच्चा भी हो गया है तो वह शादी शुदा माने जायेंगे और उसी के अनुसार नियम भी लागू होंगे। एपेक्स कोर्ट के मुताबिक लिव इन में रहना एक जिंदगी का हक है और यह कोई दंडनीय अपराध नहीं है। (केवल कुंवारी महिला और कुंवारे पुरुष के केस में)

शादी और लिव इन रिलेशन के बीच क्या अंतर है?

शादी: शादी को सामाजिक और कानूनी रूप से स्वीकार किया जाता है और यह दोनों पार्टनर्स के बीच का एक कॉन्ट्रैक्ट होता है और इन दोनों पार्टनर की एक दूसरे की ओर कानूनी कर्तव्य बनते है। शादी के लिए अगर दोनों पार्टनर में झगड़े हो जाते हैं तो उन्हें निपटाने के लिए अलग अलग नियम बनाए जाते हैं। अगर वाइफ खुद को मेंटेन नहीं कर पाती है तो सेक्शन 125 में इसका एक नियम बना है जिसके अनुसार वह अतिरिक्त मेंटेनेंस प्राप्त कर सकती है।

लिव इन रिलेशन  : कोई ऐसा कानून नहीं है जो कुंवारे पार्टनर्स को एक दूसरे के साथ बांध सके इसलिए इस केस में पार्टनर एक दूसरे को जब चाहें तब छोड़ सकते हैं। इस रिश्ते की कोई कानूनी रूप से परिभाषा नहीं है इसलिए इस टाइप के रिलेशन का लीगल स्टेटस भी कन्फर्म नही है।

लिव इन रिलेशन के अंतर्गत महिला और बच्चे का शोषण से बचाव

महिला पार्टनर की मेंटेनेंस 

सभी पर्सनल लॉ  के तहत महिलाओं को राइट ऑफ मेंटेनेंस दिया जाता है हालांकि लिव इन रिलेशन किसी भी धर्म के द्वारा स्वीकृत नहीं है इसलिए इस रिलेशन में शामिल महिला को धर्म की ओर से कोई छूट प्राप्त नहीं होती। लेकिन कोर्ट ने महिला के लीगल राइट्स को बचाने के लिए उन्हें क्रिमिनल प्रोसीजर एक्ट के सेक्शन 125 के अधिकार दिए हैं ताकि वह खुद को हिंसा से बचा सके।

घरेलू हिंसा 

घरेलू हिंसा के लिए बनाया गया नियम महिलाओं को हिंसा से बचाता है फिर चाहे वह शादी शुदा हो या न।

बच्चों से संबंधित अधिकार

अगर पार्टनर्स एक दूसरे के साथ काफी समय से लिव इन में रह रहे हैं तो वह बच्चा पैदा कर सकते हैं लेकिन गोद नहीं ले सकते हैं।

बच्चे के इन्हेरिटेंस हक

लिव इन से होने वाले बच्चों को भी वही अधिकार मिलते हैं जो शादी के बाद होने वाले बच्चे को मिलते हैं और यह अधिकार हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 16 में मेंशन हैं।

बच्चे की कस्टडी

बच्चे की कस्टडी को लेकर अलग अलग धर्म के अलग अलग नियम हैं जैसे हिंदू में बच्चे का पिता उसे रखता है और मुस्लिम में पिता बच्चे की जिम्मेदारियों से मुक्त होता है।

क्या कहती है सुप्रीम कोर्ट

  • उच्च न्यायालय ने कहा कि चूंकि 29 वर्षीय महिला के साथ रहने वाला 31 वर्षीय व्यक्ति पहले से ही शादीशुदा था, ऐसे में “एक विवाहित और अविवाहित व्यक्ति के बीच लिव-इन-रिलेशनशिप की अनुमति नहीं है”।

  • हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि लिव इन रिलेशन को एक बार  फिर से सोचने और समझने की जरूरत है। खासकर कि जो क्राइटेरिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2010 में तय किया गया है। जो कहता है कि दंपति को खुद को पति-पत्नी के समान समाज के सामने रहना चाहिए।साथ ही दोनों की उम्र कानूनी विवाह में प्रवेश करने के योग्य हो।

  • केवल एक दूसरे के साथ रहने या रातभर किसी के साथ गुजारने से इसे घरेलू संबंध नहीं कहा जा सकता है।‌साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा था कि इस केस में महिला गुजारा भत्ता की हकदार नहीं है. गुजारा भत्ता पाने के लिए किसी महिला को कुछ शर्ते पूरी करनी होंगी। शर्तों के अनुसार, दंपति को अविवाहित होना चाहिए। वह भले ही अपनी मर्जी से एक दूसरे के साथ रह रहे हों लेकिन समाज के समक्ष खुद को पति पत्नी की तरह पेश करना होगा

  • इससे पहले मई में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सुरक्षा की मांग करने वाले एक प्रेमी जोड़े द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि लिव-इन-रिलेशनशिप नैतिक और सामाजिक रूप से अस्वीकार्य है. याचिकाकर्ता गुलजा कुमारी (19) और गुरविंदर सिंह (22) ने कहा था कि वे एक साथ रह रहे हैं और जल्द ही शादी करना चाहते हैं।

मन की बात

मैं बस इतना जानती हूँ कि रिश्ता कोई सा भी हो लेकिन उसके नाम पर आप बंद कर विश्वास ना करो।  बल्कि विश्वास खुद पर करो और हर निर्णय विचार करके लो। जिससे आपका आत्मसम्मान भी कभी कम न हो न ही कभी कोई धोखा हो। धोखा हमेशा दर्द देता है। चाहे उस धोखे का नाम बॉयफ्रेंड हो या पति । मेरे विचारो से किसी विशेष सोच या वर्ग को आपत्ति हो सकती है लेकिन मेरे लिखने का उद्देश्य किसी से विरोध करना नही केवल अपने विचार रखना हैं।बाकी हर इंसान अपने लिए निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

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