शादी किसी भी इंसान का पूरा जीवन बदल देती है, फिर चाहे बात पुरूष की हो या महिला की। आमतौर पर, यह माना जाता है कि लड़की अपना घर छोड़कर आती है तो उसके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आता है। लेकिन वहीं दूसरी ओर, पुरूष भी शादी के बाद स्त्री के साथ सामजस्य बिठाने की कोशिश करता है। वह अपने कमरे से लेकर जीवन तक में उसे बराबरी की हिस्सेदारी देता है। लेकिन अक्सर देखने में आता है कि जब दो अलग-अलग स्वभाव के लोग एक साथ रहना शुरू करते हैं, तो उनके बीच कई तरह की एडजस्टमेंट प्रॉब्लम होती हैं। कभी-कभी तो आपसी तालमेल में गड़बड़ी इस हद तक बढ़ जाती है कि उनका रिश्ता ही डगमगाने लगता है। इन्हीं सब समस्याओं से बचाती है प्री-मैरिटल काउंसिलिंग। वैसे शादी से पहले काउंसिलिंग का सिर्फ यही एक यही बेनिफिट नहीं है, बल्कि इससे आपको एक खुशहाल शादीशुदा जीवन बिताने में मदद मिलती है। तो चलिए आज इसे लेख में हम आपको बता रहे हैं कि प्री-मैरिटल काउंसिलिंग क्यों जरूरी है-

बेहतर कम्युनिकेशन स्किल

एक सफल शादी का सीक्रेट होता है कपल्स के बीच का कम्युनिकेशन। क्योंकि यही एक रास्ता होता है, जिससे आप एक-दूसरे को समझ सकते हैं। साथ ही अपनी बात अपने पार्टनर को समझा सकते हैं। इतना ही नहीं, अपने रिश्ते में आई किसी भी प्रॉब्लम को सुलझा सकते हैं। अक्सर कपल्स के बीच कम्युनिकेशन स्किल बेहतर नहीं होते और वह उसे डेवलप भी नहीं कर पाते, क्योंकि वह सिर्फ अपने पहलू के बारे में ही सोच रहे होते हैं। लेकिन जब आप प्री-मैरिटल काउंसिलिंग लेते हैं तो इससे आपको बेहतर संचार का बांध बना पाते हैं, क्योंकि आप दोनों के बीच और आप दोनों को एक दूसरे को समझने में मदद करने के लिए एक तटस्थ पार्टी होती है। इससे आप दोनों ही शादी से पहले अपने पार्टनर को यह समझा पाते हैं कि आप अपने रिश्ते से क्या उम्मीदें रखते हैं और साथ ही सामने वाले व्यक्ति की उम्मीदों पर कितना खरा उतर सकते हैं।

महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत संभव

यह एक प्री-मैरिटल काउंसिलिंग का शायद सबसे बड़ा लाभ है। शादी से पहले ऐसे कई मुद्दे होते हैं, जिन पर बात करना बेहद आवश्यक होता है, अन्यथा शादी के बाद समस्याएं पैदा होती हैं। मसलन, बच्चों, करियर व फाइनेंशियल प्लानिंग आदि। हालांकि, यह देखने में आता है कि कपल्स अक्सर शादी से पहले इन मुद्दों पर बात करने से बचते हैं। खासतौर से, भारतीय कल्चर में तो शायद ही शादी से पहले जोड़े इन मुद्दों पर बात करते हों। लेकिन अगर वह प्री-मैरिटल काउंसिलिंग लेते हैं तो वह अपने मन की सभी बातों पर खुलकर बात कर सकते हैं। जिससे उनका वैवाहिक जीवन अधिक सुखी बनता है।

नई बातें जानना

जब आप प्री-मैरिटल काउंसिलिंग लेते हैं तो आप अपने पार्टनर की उन बातों के बारे में भी जान पाते हैं, जिनके बारे में शायद आपको फर्स्ट मीटिंग में ना पता चल पाए। दरअसल, प्री-मैरिटल काउंसिलिंग के दौरान दोनों ही पार्टनर अपने दिल की बात को खुलकर रखते हैं, जिससे उन्हें अपने पार्टनर के बारे में कई नई बातों का पता चलता है। इतना ही नहीं, वह अपने पार्टनर के स्वभाव पसंद-नापसंद के बारे में भी जान पाते हैं।

डर का सामना

कुछ लोगों के मन में अपनी शादी को लेकर उत्साह कम और डर ज्यादा होता है। वह सिर्फ अपने पार्टनर ही नहीं, बल्कि उसके परिवार के सदस्यों को लेकर भी कई तरह की असमंजस की स्थिति में होते हैं। इतना ही नहीं, शादी को लेकर उनके मन में कई तरह के डर भी होते हैं। ऐसे में प्री-मैरिटल काउंसिलिंग यकीनन आपके डर को बाहर निकालने में मदद करती है। जब आप प्री-मैरिटल काउंसिलिंग लेते हैं तो अपने मन के भीतर छिपे सभी डर काउंसलर के सामने उजागर कर सकते हैं और फिर आप उन डर से बाहर आ सकते हैं, जिससे आपको शादी के बाद एक खुशहाल जीवन जीने में मदद मिलती है।

वेडिंग की तैयारी नहीं, शादी पर फोकस

जब शादी नजदीक होती है तो हम केवल शादी की तैयारियों पर फोकस करते हैं। मसलन, शादी के जोड़े से लेकर शादी का वेन्यू व गेस्ट लिस्ट आदि। लेकिन यहां आपको यह समझना चाहिए कि शादी उम्रभर का बंधन है और इसलिए वेडिंग की तैयारियों से ज्यादा जरूरी है शादी पर फोकस करना और ऐसा आप प्री-मैरिटल काउंसिलिंग के जरिए कर सकते हैं। जब आप प्री-मैरिटल काउंसिलिंग लेते हैं तो इससे आपको एक बेहतर जीवनसाथी मिलने और स्वयं एक बेहतर जीवनसाथी बनने की संभावना अधिक हो जाती है। वास्तव में यही एक चीज है, जिसकी तैयारी सबसे अधिक की जानी बेहद आवश्यक है।

विवाह में सीमाएं तय करना

यह सच है कि मैरिड कपल्स यकीनन एक-दूसरे से सबसे अच्छे दोस्त और वेलविशर होते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आप सामने वाले व्यक्ति पर मालिकाना हक जताने लग जाएं। विवाह में अपनी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के साथ-साथ सीमाएं तय करना भी बेहद जरूरी होता है और प्री-मैरिटल काउंसिलिंग आपको यही लाभ पहुंचाती है। जब आप कांउसिलिंग लेते हैं तो आपको यह पता चलता है कि आपकी सीमा कहां है और कहां से आपको अपने पार्टनर को स्वतंत्रता देनी चाहिए। यही सीमा और स्वतंत्रता का आपसी बैलेंस आपके वैवाहिक जीवन को खुशहाल बना सकता है।

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